100 Sala urs_e_AAla hazrat

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November 2018 100 sala उर्स ए आला हजरत बड़ी धूमधाम से मनाया गया देखने वालो की आंखें दंग रह गए दुनिया भर के लोग उर्स में शामिल हुए और अपनी दुआएं कुबूल करवा गए बरेली शरीफ में आला हजरत साहब का मजार है जो 14वीं सदी के Mujaddid हैं

Muhummad s.a.w paidaish|Rabi ul awal|Muhummad s.a.w ki shan

आला हजरत के बारे में

(احمد رضا خان).

आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान कादिरी 14 वीं शताब्दी के …Mujaddid hai उनकी एक और प्रमुख किताब फतावा रजविया इस सदी के …mujaddid उनका जन्म नाम मुहम्मद था।

विकल्पीय नाम: आला हजरत इमाम अहमद रज़ा खान और मुजद्दिदे आजम

जन्म – तिथि: 1856

जन्म – स्थान: बरेली जिला, उत्तर प्रदेश, भारत

मृत्यु – तिथि: 1921

मृत्यु – स्थान:मोहल्ला सौदागरान बरेलीउत्तर प्रदेश, भारतधर्म:इस्लामअहमद राजा ख़ान

 (احمد رضا خان).

कम खाये लेकिन अपने बच्चों को तालीम जरूरी दिलाएं: अहसन मियां

BAREILLY:

ऐसे हुआ urs_e_ alla hazrat का आगज़

उर्स- ए- आला हजरत का फ्राइडे को परचम कुशाई की रस्म के साथ शाम को आगाज हुआ। उर्स में ठिरिया निजावत खान से सबसे बड़ा चादरों का जुलूस दरगाह आला पहुंचा। जलसे का आगाज तिलावत- ए- क़ुरान से हाफिज फहीम रजा समदानी ने किया। दरगाह के सज्जादानशीन मुफ्ती अहसन रजा कादरी मुस्लेमीन कमेटी के सदर नसरत अली खान, वसीम खान, नदीम नूरी, जाहिद नूरी, निजाकत खान, अब्दुल करीम ने दस्तार बंदी कर गुल पोशी की। उर्स में जायरीन के लिए दरगाह तक पहुंचने और मथुरापुर सीबीगंज जाने के लिए मुफ्त बस, ऑटो और ई- रिक्शा लगाए गए हैं। पूरा ही उर्स सीसीटीवी की निगरानी में रखा गया। उर्स में शामिल होने के लिए देश- विदेश जायरीन पहुंच चुके है। शहर के अधिकांश होटल्स आदि फुल हो चुके हैं।

 

उर्स में म्यूजिक से करें परहेज

मुफ्ती अहसन रजा कादरी ने आह्वान किया कि 100 साला उर्स- ए- रजवी की मौके पर कहा कि हम सब अहद करे कि कम खाएंगे लेकिन अपने बच्चों को तालीम जरूर दिलाएंगे। दुनियावी तालीम भी हासिल करें। बच्चे उर्दू- अरबी के साथ इंग्लिश- हिंदी के भी जानकर बने तभी हम अपने मजहब की सही तस्वीर लोगों तक रख सकते है। वहीं अहसन मियां ने अपील की कि उर्स- ए- आला हजरत और आने वाले जुलूस- ए- मोहम्मदी में म्यूजिक वाली नातों से परहेज करें। कमेटी ने जुलूस में शामिल 100 लोगों को कुरा अंदाजी के जरिए कंजुल ईमान तोहफे बतौर दरगाह प्रमुख सुब्हानी मिया के हाथों बंटवाया गया।

जुलूस को हरी झंडी दिखाकर किया रवाना

फातिहा दुआ के बाद मुफ्ती अहसन मियां ने हरी झंडी दिखाकर जुलूस को रवाना किया। जुलूस कैंट, चौकी चौराहा, नॉवेल्टी, करोलान होता हुआ दरगाह पहुंचा। 100 फूलों की डालिया झंडे लेकर लोग जुलूस में चले। इसके अलावा न्यू रजा कटघर से जोहेब रजा, फरमान रजा, बिलाल कुरैशी, आमिर अमान व स्वाले नगर मुजाहिद बेग राशिद रजा सबलू रजा के नेतृत्व में जसोली, जखीरा, बानखाना, पुराना शहर आदि से भी लोग जुलूस लेकर आए। ठिरिया में टीटीएस के मौलाना जिकरुल्लाह मक्कीशाहिद खान नूरी, और शाबान रजा आदि की भी दस्तार बंदी की गई।

 

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आला हजरत के 100वें उर्स-ए-पाक पर अदा हुई कुल  की रस्म, बंटा लंगर

आला हजरत इमाम अहमद रजा खां अलैहिर्रहमां’ का 100वां उर्स-ए-पाक सोमवार को नूरी मस्जिद तुर्कमानपुर, अहमदी सुन्नी जामा मस्जिद सौदागार मोहल्ला बसंतपुर, नार्मल स्थित दरगाह हजरत मुबारक खां शहीद मस्जिद में अकीदत के साथ मना। सुबह फज्र की नमाज के बाद कुरआन ख्वानी हुई। दोपहर की नमाज के बाद कुल शरीफ की रस्म अदा की गई। सलातो सलाम पढ़कर दुआ मांगी गई। उसके बाद अकीदतमंदों में लंगर बंटा।

 

अहमदी सुन्नी जामा मस्जिद सौदागार मोहल्ला बसंतपुर में मौलाना मोहम्मद अहमद और कारी मोहसिन रजा ने कहा कि आला हजरत द्वारा किया गया उर्दू जुबान में कुरआन का तर्जुमा ‘कंजुल ईमान’ विश्वविख्यात है। उन्होंने तेरह साल की उम्र से ही फतवा लिखना और लोगों को इस्लाम का सही पैगाम पहुंचाना शुरू किया। पूरी उम्र दीन की खिदमत में गुजारी। पैगंबर-ए-इस्लाम से सच्ची मुहब्बत और गहरा इश्क आपका सबसे अजीम सरमाया है।

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उधर नूरी मस्जिद तुर्कमानपुर में कुल शरीफ से पहले तकरीरी प्रोग्राम हुआ। मस्जिद के इमाम मौलाना असलम रज़वी ने कहा कि आला हजरत इमाम अहमद रजा खां दीन-ए-इस्लाम के बड़े आलिम रहे। उन्होंने कहा कि आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खां 14वीँ सदी हिजरीं के नवजीवनदाता (मुजद्दिद) हैं। जिन्हें उस समय के प्रसिद्ध अरब विद्वानों ने यह उपाधि दी। मुफ्ती मो. अजहर शम्सी ने कहा कि आला हजरत इस्लाम, विज्ञान, अर्थव्यवस्था, गणित, जीव विज्ञान, भूगोल, दर्शनशास्त्र, शायरी, चिकित्सा, रासायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, भूगर्भ विज्ञान सहित 55 से ज्यादा विषयों के विशेषज्ञ थे।

 

विभिन्न विषयों पर एक हजार से ज्यादा किताबें लिखीं। नार्मल स्थित दरगाह हजरत मुबारक खां शहीद मस्जिद में मौलाना मकसूद आलम मिस्बाही व कारी शराफत हुसैन कादरी ने कहा कि आला हजरत ने पूरी जिंदगी इस्लाम के लिए वक्फ कर दी। आज पूरी दुनिया में उनका चर्चा है। इस दौरान शाबान अहमद, अलाउद्दीन निजामी, गुलाम वारिस, मनौव्वर अहमद, शरीफ अहमद, शाकिर अली सलमानी, नबी अहमद, कारी जमील, उमर कादरी, हाजी साबिर अली खान सहित तमाम अकीदतमंद शामिल हुए।

 

आला हजरत साहब का नाम शायद ही कोई है जो नहीं जानता होगा दुनिया का हर कोई शख्स आला हजरत को अच्छी तरह जानता है और उनके नाम से वाकिफ है आला हजरत को पर्दा फरमाए पूरे 100 साल हो चुके हैं हर साल उन की चमक और रोशनी और ज्यादा फैलती जा रही है जितने मुरीद और लोग पहले उरस मे आया करते थे उससे कई गुना ज्यादा इस 100 साला उरस में तशरीफ़ लाएं और शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने आला हजरत की न्यaz ना की होगी.

 

Mujaddido deen_e_millat sarkar alla hazrat ki badi nirali shan hai मैं इस काबिल नहीं के उनके बारे में कुछ लिख सकूं मुझे इतना ही नहीं कि वह क्या थे बस इतना जानती हूं कि वह जो भी थे वैसा दूसरा कोई नहीं अल्लाह ताला की बाहर गांव में वह एक मकबूल बंधे थे उनकी जिंदगी सिर्फ राहे खुदा मेरी गुजरी उनके 100 साला कुल के मौके पर लोगों ने दिल खोलकर लंगर किया और बरेली को सजा दिया हर आने वाले मुसाफिर को पेट भर खाना खिलाया और रहने को जगा दे दे काफी लोगों ने अपने होटल हॉल खाली कर दिए और फ्री में मुसाफिरों को रहने को जगह दी कोई ऐसी गली कोई ऐसा पूछा ना था जहां लंगर ना होता है आला हजरत के नाम पर लुटाने वालों की तादाद बेशुमार थी मुसलमानों का एक ऐसा सैलाब इस्लामिया ग्राउंड से लेकर पूरे शहर में फैला हुआ था लोगों की भीड़ को देख कर मुझे kaba tullah का मंजर याद आ गया जैसा मैंने टीवी में देखा है काबली सिर्फ सर ही सर देखते हैं टोपियां ही नजर आती है कुछ ऐसा ही मंजर यहां मैंने देखा के लोग बस चले जा रहे हैं चले जा रहे हैं चले जा रहे हैं दीवाने अपने पीर की गुलामी में हाजिर थे भीड़ का एक सैलाब था जो बस मोहब्बत ए आला हजरत में दौड़ा चला जा रहा था

 

Kull शरीफ की जगह

Bareilly k Islamia Inter College ground मैं जश्न ए आला हजरत 100 साला मनाया गया दूर-दूर से मौलाना बड़े-बड़े हाफिज कारी नात ख्वान हाय और अपने अपने कलाम पेश किए अल्लाह ताला का बड़ा फसलों करम है के बरेली शहर में आला हजरत साहब है मैं फक्र से कहती हूं कि मैं बरेली हूं और मुझे सारी दुनिया जानती है घर में कह दूं कि मैं बरेली हूं तो कोई भी मुझे पहचान लेगा यह सिर्फ आला हजरत साहब की निस्बत है सभी उलमा इकराम बड़ी खुशी के साथ हाजिर हुए और 3 दिन तक जश्ने आला हजरत चलता रहा सभी ने अपने कलाम और मन कबत और तकरीर है पेश की 3 तारीख की रात को अचानक सर्दी बढ़ गई थी फिर भी इस्लामिया ग्राउन में भीड़ की कमी ना हुई लोग लाखों की तादात में वहां जमी रहे और फैजान ए आला हजरत उठाते रहे।

• इस्लामिया ग्राउंड का मेला

इस्लामिया ग्राउंड में बहुत धूमधाम से मेला लगाया गया और लोगों ने दूर दूर से आकर अपनी दुकानें लगाएं जिसमें हर तरीके का सामान मौजूद था दीनी किताबों से लेकर बच्चों के खिलौने कपड़े बर्तन शो पीस कालीन टोपियां जनमानस और काफी ऐसी चीजें जो दुनिया में काम में आती है सभी मौजूद थे.

 

लोगों ने अपने बच्चों को खिलौने दिलाएं और खुद अपने लिए कुरान किताबें दीनी किताबें सभी कुछ खरीदे काफी लोगों ने अपनी जान इससे दीनी किताबें मुफ्त में बाटी पर दिन को फैलाया हर कोई अपने जाने से बेहतर से बेहतर करने में लगा हुआ था .

 

बाजार और गलियां सजे हुए थे सभी होटल सजाए गए थे लेकिन हर साल की तरह इस साल होटल का बिजनेस ज्यादा नहीं चला क्योंकि हर नुक्कड़ पर आला हजरत के चाहने वालों ने लंगर कर रखा था और हर कोई लंगर से खाना खा रहा था।
इस्लामिया ग्राउंड में कोई बिरयानी बेच रहा था।तो कोई मिठाईयां बेच रहा था सभी अपने अपने कामों में मशरूफ थे.

 

और अपनी कमाई में लगे हुए थे आला हजरत के 100 सालाना उर्स की बरकत से लोगों की खूब कमाए सभी लोग पूरे साल उसका इंतजार करते हैं क्योंकि उसमें दूर दूर से लोग आते हैं और खरीदारी करते हैं इस्लामिया ग्राउंड में बहुत भारी मेला लगता है जिसमें हलवा पराठा बड़ी ज़ोर शोर से बिकता है

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100 Sala urs_e_AAla hazra
100 Sala urs_e_AAla hazra

 

Urs me shamil hue lakho log

आला हजरत के बारे में

आला हजरत 14वीं सदी के Mujaddid hai वह दीन की शायरी करते थे उन्होंने कुरान का उर्दू तर्जुमा बड़ी ही खूबी से किया जिसका नाम कंझुल इमान रखा सभी सुन्नी कnjul ईमान ही पढ़ते हैं

उपाधि

आला हज़रत,

Imaam-e-AhleSunnat

जन्म14 जून 1856[1]

बरेली, North-Western Provinces, British

Indian Empireमृत्यु28 अक्टूबर 1921(उम्र 65)

बरेली, UP, ब्रिटिश राजराष्ट्रीयताभारतयुगनया

दौरक्षेत्रदक्षिण

भारतधर्मइस्लामन्यायशास्रहनफ़ी

2पंथसुन्नी

2मुख्य

रूचिअक़ीदह, फ़िक़्ह, तसव्वुफ़

इमाम ए अहले सुन्नत अल – हाफिज, अल- कारी अहमद रज़ा खान फाज़िले बरेलवी का जन्म १० शव्वाल १६७२ हिजरी मुताबिक १४ जून १८५६ को बरेली में हुआ। आपके पूर्वज सईद उल्लाह खान कंधार के पठान थे जो मुग़लों के समय में हिंदुस्तान आये थें। इमाम अहमद रज़ा खान फाज़िले बरेलवी के मानने वाले उन्हें आलाहजरत के नाम से याद करते हैं।

 

आला हज़रत बहुत बड़े मुफ्ती, आलिम, हाफिज़, लेखक, शायर, धर्मगुरु, भाषाविद, युगपरिवर्तक, तथा समाज सुधारक थे। आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान कादिरी 14 वीं शताब्दी के नवजीवनदाता मुजद्दिद थे। जिन्हें उस समय के प्रसिद्ध अरब विद्वानों ने यह उपाधि दी।

 

उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों के दिलों में अल्लाह तआला व मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम वसल्लम के प्रति प्रेम भर कर हज़रत मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तआला की सुन्नतों को जीवित कर के इस्लाम की सही रूह को पेश किया, आपके वालिद साहब ने 13 वर्ष की छोटी सी आयु में अहमद रज़ा को मुफ्ती घोषित कर दिया। उन्होंने 55 से अधिक विभिन्न विषयों पर 1000 से अधिक किताबें लिखीं जिन में तफ्सीर हदीस उनकी एक प्रमुख पुस्तक जिस का नाम “अद्दौलतुल मक्किया ” है .

 

जिस को उन्होंने केवल 8 घंटों में बिना किसी संदर्भ ग्रंथों के मदद से हरम शरीफ़ में लिखा। उनकी एक और प्रमुख किताब फतावा रजविया इस सदी के इस्लामी कानून का अच्छा उदाहरण है जो 13 विभागों में वितरित है। इमाम अहमद रज़ा खान ने कुरान ए करीम का उर्दू अनुवाद भी किया जिसे कंजुल ईमान नाम से जाना जाता है,

 

आज उनका तर्जुमा इंग्लिश, हिंदी, तमिल, तेलुगू, फारसी, फ्रेंच, डच, स्पैनिश, अफ्रीकी भाषा में अनुवाद किया जा रहा है, आला हज़रत ने पैगम्बर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान को घटाने वालो को क़ुरआन और हदीस की मदद से मुंह तोड़ जवाब दिया! आपके ही जरिए से मुफ्ती ए आज़म हिन्द मुस्तफा रज़ा खान, हुज्जतुल इस्लाम हामिद रज़ा खान, अख़्तर रज़ा खान

 

अज़हरी मियाँ, जैसे बुजुर्ग इस दुनिया में आए, जिन्होंने इल्म की शमा को पूरी दुनिया में रोशन कर दिया, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का दीदार अपनी खुली आँखों से किया :- जब आला हजरत हज के लिए गए हुए थे तब उन्हें हुज़ूर का दीदार करने की तलब हुए तो उन्होंने इस तलब में एक शायर पढा “ऐ सूए न लाज़र फिरते है मेरे जैसे अनेक ओ कार फिरते है” और फिर उन्हें कुछ पलों के बाद हुज़ूर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का दीदार हुआ.

 

अहमद रजा खान बरलेवी के पिता, नाकी अली खान, रजा अली खान के पुत्र थे। अहमद रजा खान बरलेवी पुष्तुन के बरेच जनजाति से संबंधित थे। बारेच ने उत्तरी भारत के रोहिल्ला पुष्टनों के बीच एक जनजातीय समूह बनाया जिसने रोहिलखंड राज्य की स्थापना की। मुगल शासन के दौरान खान के पूर्वजों कंधार से चले गए और लाहौर में बस गए।

Ahmad raza खान का जन्म 14 जून 1856 को मोहाल्ला जसोली, उत्तर-पश्चिमी प्रांतों बरेली शरीफ में हुआ था। उनका जन्म नाम मुहम्मद था।पत्राचार में अपना नाम हस्ताक्षर करने से पहलेahmad raza khan ने अपील “अब्दुल मुस्तफा” (“चुने हुए का नौकर”) का इस्तेमाल किया था।

Ahmad raza khan ने ब्रिटिश भारत में मुसलमानों के बौद्धिक और नैतिक गिरावट देखी। उनका आंदोलन एक लोकप्रिय आंदोलन था, जो लोकप्रिय सूफीवाद का बचाव करता था, जो दक्षिण एशिया में देवबंदी आंदोलन और कहीं और वहाबी आंदोलन के प्रभाव के जवाब में बढ़ गया था।

आज आंदोलन पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश, तुर्की, अफगानिस्तान, इराक, श्रीलंका, दक्षिण अफ्रीका, संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन के अन्य देशों के अनुयायियों के साथ दुनिया भर में फैल गया है। आंदोलन में अब 200 मिलियन से अधिक अनुयायियों हैं।आंदोलन शुरू होने पर काफी हद तक एक ग्रामीण घटना थी, लेकिन वर्तमान में शहरी, शिक्षित पाकिस्तानी और भारतीयों के साथ-साथ दुनिया भर में दक्षिण एशियाई डायस्पोरा के बीच लोकप्रिय है।

 

कई धार्मिक स्कूल, संगठन और शोध संस्थानAhmad raza khan के विचारों को पढ़ते हैं,जो सूफी प्रथाओं और पैगंबर मुहम्मद सोऊंगा हो ताला अलेही वसल्लम को व्यक्तिगत भक्ति के अनुपालन पर इस्लामी कानून की प्राथमिकता पर जोर देते हैं।

 

आपका विसाल

अहमद रज़ा साहिब( aalahazrat) ki मृत्यु शुक्रवार 28 अक्टूबर 1921 सीई (25 सफ़र, 1340 हिजरी) 65 वर्ष की उम्र में बरेली में उनके घर में हुई थी। उन्हें दरगाह-ए-अला हजरत में दफनाया गया था जो वार्षिक उर्स-ए-रजावी के लिए साइट को चिह्नित करता है।

 

Ahmad raza khan ने अरबी, फारसी और उर्दू में किताबें लिखीं, जिनमें तीस मात्रा के फतवा संकलन फतवा रजाविया, और कन्ज़ुल इमान (पवित्र कुरान का अनुवाद और स्पष्टीकरण) शामिल था। उनकी कई पुस्तकों का अनुवाद यूरोपीय और दक्षिण एशियाई भाषाओं में किया गया है।

 

कनज़लुल ईमान (कुरान का अनुवाद)संपादित करें

कन्ज़ुल इमान (उर्दू और अरबी : کنزالایمان) ahmad raza khan द्वारा कुरान का 1910 उर्दू पैराफ्रेज अनुवाद है। यह सुन्नी इस्लाम के भीतर हानाफी न्यायशास्र से जुड़ा हुआ है, और भारतीय उपमहाद्वीप में अनुवाद का व्यापक रूप से पढ़ा गया संस्करण है। बाद में इसका अनुवाद अंग्रेजी, हिंदी, बंगाली, डच, तुर्की, सिंधी, गुजराती और पश्तो में किया गया है।

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हुसामुल हरमैन संपादित करें

हुसमुल हरमैन या हुसम अल हरमैन आला मुनीर कुफ्र वाल मायवन (अविश्वास और झूठ के गले में हरमैन की तलवार) 1906, एक ऐसा ग्रंथ है जिसने देवबंदी, अहले हदीस और अहमदीय आंदोलनों के संस्थापकों को इस आधार पर घोषित किया कि उन्होंने किया पैगंबर मुहम्मद की उचित पूजा और उनके लेखन में भविष्यवाणी की अंतिमता नहीं है।अपने फैसले की रक्षा में उन्होंने दक्षिण एशिया में 268 पारंपरिक सुन्नी विद्वानों से पुष्टित्मक हस्ताक्षर प्राप्त किए, और कुछ मक्का और मदीना में विद्वानों से। यह ग्रंथ अरबी, उर्दू, अंग्रेजी, तुर्की और हिंदी में प्रकाशित है।

 

फतवा रजावियाह

फतवा-ए-रज्विया या फतवा-ए-राडवियाह मुख्य आंदोलन (विभिन्न मुद्दों पर इस्लामी फैसले) उनके आंदोलन की पुस्तक है। यह 30 खंडों में और लगभग में प्रकाशित किया गया है। 22,000 पेज इसमें धर्म से व्यापार और युद्ध से शादी तक दैनिक समस्याओं का समाधान शामिल है।

 

हदाइक़ इ बकशिष

उन्होंने पैगंबर मुहम्मद की प्रशंसा में भक्ति कविता लिखी और हमेशा वर्तमान काल में उन पर चर्चा की

कविता का उनका मुख्य पुस्तक हिदाके बखिशिश है

उनकी कविताओं, जो पैगंबर के गुणों के साथ सबसे अधिक भाग के लिए सौदा करती हैं, अक्सर एक सादगी और प्रत्यक्षता होती है।

उन्होंने लेखन के लिए एक अनुकूल वातावरण बनाया

उनके उर्दू दोपहर, मुस्तफा जाने रहमत पे लखहो सलाम (मुस्तफा पर लाखों नमस्कार, दया के पैरागोन) के हकदार हैं, आंदोलन मस्जिदों में पढ़े जाते हैं। उनमें पैगंबर, उनकी शारीरिक उपस्थिति उनके जीवन और समय, उनके परिवार और साथी की प्रशंसा, औलिया और सालिहीं (संतों और पवित्र) की प्रशंसा शामिल हैं।

अन्यसंपादित करें

उनके अन्य कार्यों में शामिल हैं:

अर्ज़ दौलतत मक्कीया बिला मदतुल गहिबिया

अल मुट्टामदुल मुस्तानाद

अल अमन ओ वा उला

अलकॉकबटुस सहाबिया

अल इस्तिमदाद

अल फुयूज़ल मक्किया

अल मीलादुन नाबावियाह

फौज मुबेन दार हरकत ज़मीन

सुबानस सुबूह

सलुस कहें हिंदी हिंदी

अहकाम-ए-शरीयत

आज जुबतदुज़ ज़ककिया

अब्ना उल मुस्तफ़ा

तमहीद-ए-इमान

अंगोठे चुमने का मस्ला

Ahmad raza khan ने तवासुल, मालीद, भविष्यवक्ता मुहम्मद की सभी चीजों के बारे में जागरूकता का समर्थन किया, और अन्य सूफी प्रथाओं का समर्थन किया जो वहाबिस और देवबंदिस द्वारा विरोध किए गए थे।

इस संदर्भ में उन्होंने निम्नलिखित मान्यताओं का समर्थन किया:

मुहम्मद, हालांकि इन्सान-ए-कामिल (एकदम सही इंसान) है, जिसमें एक नूर (प्रकाश) है जो सृजन की भविष्यवाणी करता है। यह देवबंदी के विचार से विरोधाभास करता है कि मुहम्मद, केवल एक इंसान-ए-कामिल था, जो कि अन्य मनुष्यों की तरह एक सम्मानित लेकिन शारीरिक रूप से सामान्य मनुष्य था।

मुहम्मद हाजीर नाज़ीर (एक ही समय में कई जगहों को देख सकते हैं और भगवान द्वारा दी गई शक्ति से वांछित स्थान पर पहुंच सकते हैं:

हम यह नहीं मानते कि कोई भी अल्लाह के उच्चतम ज्ञान के बराबर हो सकता है, या इसे स्वतंत्र रूप से प्राप्त कर सकता है, और न ही हम यह कहते हैं कि अल्लाह ने पैगंबर को ज्ञान दिया है (अल्लाह उसे आशीर्वाद देता है और उसे शांति देता है) कुछ भी नहीं है। लेकिन एक भाग [पैगंबर] और दूसरे [किसी और के]] के बीच पेटेंट और जबरदस्त अंतर क्या है: आकाश और पृथ्वी के बीच का अंतर, या यहां तक ​​कि अधिक से अधिक विशाल।

वह अपनी पुस्तक फतवा-ए-रज़विया में कुछ प्रथाओं और विश्वास के संबंध में निर्णय तक पहुंचे, जिनमें शामिल हैं:

इस्लामी कानून शरीयत परम कानून है और यह सभी मुस्लिमों के लिए अनिवार्य है;

बिदाह से बचना आवश्यक है;

ज्ञान के बिना एक सूफी या शैख के बिना शैख शैतान के हाथों में एक उपकरण है;

गुफराइड [और विधर्मी] के साथ मिलकर और अपने त्यौहारों में भाग लेने के लिए कफार की नकल करना अनिवार्य है ।

मुद्रा नोटों की अनुमतिसंपादित करें

1905 में, Ahmad raza khan ने हिजाज के समकालीन लोगों के अनुरोध पर, पेपर का उपयोग मुद्रा के रूप में उपयोग करने की अनुमति पर एक फैसले लिखा, जिसका शीर्षक किफ्ल-उल-फैक्हेहिल फेहिम फे अहकम-ए-किर्तस दहरिम था।

अहमदीयाहसंपादित करें

कदियन के मिर्जा गुलाम अहमद ने मुसलमानों के लिए एक अधीनस्थ पैगंबर मुहम्मद के लिए एक अधीनस्थ भविष्यद्वक्ता उम्माती नबी के रूप में वादा किए गए मसीहा और महदी के रूप में दावा किया था, जो मुहम्मद और शुरुआती सहबा के अभ्यास के रूप में इस्लाम को प्राचीन रूप में बहाल करने आए थे। खान ने मिर्जा गुलाम अहमद को एक विद्रोही और धर्मत्यागी घोषित कर दिया और उन्हें और उनके अनुयायियों को अविश्वासियों या कफार के रूप में बुलाया।

देवबंदिस

जब इमाम अहमद रजा खान ने 1905 में तीर्थयात्रा के लिए मक्का और मदीना का दौरा किया, तो उन्होंने अल मोटामद अल मुस्तानाद (“विश्वसनीय प्रूफ”) नामक एक मसौदा दस्तावेज तैयार किया। इस काम में, अहमद रजा ने अशरफ अली थानवी, रशीद अहमद गंगोही, और मुहम्मद कासिम नानोत्वी जैसे देवबंदी नेताओं और कफार के रूप में उनके पीछे आने वाले देवबंदी नेताओं को ब्रांडेड किया।

 

खान ने हेजाज में विद्वानों की राय एकत्र की और उन्हें हुसम अल हरमन (“दो अभयारण्यों का तलवार”) शीर्षक के साथ एक अरबी भाषा परिशिष्ट में संकलित किया, जिसमें 33 उलमा (20 मक्का और 13 मदीनी) से 34 कार्यवाही शामिल हैं। इस काम ने वर्तमान में बने बरेलविस और देवबंदिस के बीच फतवा की एक पारस्परिक श्रृंखला शुरू की।

Shiya

खान ने शिया मुस्लिमों के विश्वासों और विश्वास के खिलाफ विभिन्न किताबें लिखीं और शिया के विभिन्न अभ्यासों को कुफर घोषित किया। [49] उसके दिन के अधिकांश शिया धर्म थे, क्योंकि उनका मानना ​​था कि उन्होंने धर्म की ज़रूरतों को अस्वीकार कर दिया था।

मुहम्मद इब्न अल-वहाबसंपादित करें

खान ने वहाबीस को कफार घोषित कर दिया और मुहम्मद इब्न अब्द अल-वहाब द्वारा स्थापित वहाबी आंदोलन के खिलाफ विभिन्न विद्वानों के कई फतवा एकत्र किए, जो अरब प्रायद्वीप में प्रमुख थे, जैसा कि उन्होंने अहमदीस और देवबंदिस के साथ किया था।

उस समय क्षेत्र के अन्य मुस्लिम नेताओं के विपरीत, खान और उनके आंदोलन ने महात्मा गांधी के तहत अपने नेतृत्व के कारण भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का विरोध किया, जो मुस्लिम नहीं थे।

खान ने घोषणा की कि भारत दार अल-इस्लाम था और मुसलमानों ने धार्मिक स्वतंत्रता का आनंद लिया। उनके अनुसार, इसके विपरीत बहस करने वाले लोग केवल वाणिज्यिक लेनदेन से ब्याज एकत्र करने के लिए गैर-मुस्लिम शासन के तहत रहने वाले मुसलमानों को अनुमति देने वाले प्रावधानों का लाभ उठाना चाहते थे और जिहाद से लड़ने या हिजरा करने की कोई इच्छा नहीं थी।  इसलिए, उन्होंने ब्रिटिश भारत को दार अल-हरब (“युद्ध की भूमि”) के रूप में लेबल करने का विरोध किया, जिसका मतलब था कि भारत के खिलाफ पवित्र युद्ध और भारत से प्रवास करने के कारण वे समुदाय के लिए आपदा कर सकते थे। खान का यह विचार अन्य सुधारकों सैयद अहमद खान और उबायदुल्ला उबादी सुहरवर्दी के समान था।

 

मुस्लिम लीग ने मुस्लिम जनता को पाकिस्तान के लिए प्रचार करने के लिए संगठित किया, [56] और खान के कई अनुयायियों ने शैक्षिक और राजनीतिक मोर्चों पर पाकिस्तान आंदोलन में महत्वपूर्ण और सक्रिय भूमिका निभाई। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने अहमद रजा खान समेत कई न्यायविदों के साथ एक निजी बैठक की, पाकिस्तान आंदोलन में उनका समर्थन मांगा। जिन्ना को खान से पाकिस्तान आंदोलन में पूर्ण समर्थन मिला और उन्होंने राजनीतिक सलाह भी दी। (1921 में अहमद रजा खान के रूप में गलत था लेकिन 1933 के बाद पाकिस्तान आंदोलन शुरू हुआ)

विरासतसंपादित करें

 

इमाम अहमद रजा के नाम पर भारत में एक सड़क। (मार्ग का मतलब हिंदी या पंजाबी में सड़क है)

पहचानसंपादित करें

21 जून 2010 को, सीरिया के एक क्लर्क और सूफी मोहम्मद अल-याकौबी ने तबीबीर टीवी के कार्यक्रम सुन्नी टॉक पर घोषित किया कि भारतीय उपमहाद्वीप के मुजद्दीद अहमद रजा खान बरलेवी थे और कहा कि अहलुस सुन्नत वाल जमैह के अनुयायी खान के अपने प्यार से पहचाना जाए, और उन लोगों के बाहर जो अहलुस सुन्नत के बाहर हैं, उनके पर उनके हमलों से पहचाना जाता है।

 

मोहम्मद इकबाल (1877-1938), एक कवि और दार्शनिक ने कहा: “मैंने इमाम अहमद रजा के नियमों का सावधानी से अध्ययन किया है और इस प्रकार इस राय का गठन किया है; और उनके फतवा ने अपने कौशल, बौद्धिक क्षमता, उनकी रचनात्मक सोच की गुणवत्ता की गवाही दी है, उनके उत्कृष्ट क्षेत्राधिकार और उनके महासागर की तरह इस्लामी ज्ञान।

 

एक बार इमाम अहमद रजा एक राय बनाते हैं, वह इस पर दृढ़ता से रहता है; वह एक शांत प्रतिबिंब के बाद अपनी राय व्यक्त करता है। इसलिए, किसी भी धार्मिक नियम और निर्णय को वापस लेने की आवश्यकता कभी नहीं उठती है। इस सब के साथ, प्रकृति से वह गर्म स्वभावपूर्ण था, और यदि यह रास्ते में नहीं था, तो शाह अहमद रजा उनकी उम्र के इमाम अबू हनीफा थे। ” एक और जगह में वह कहता है, “इस तरह के एक प्रतिभाशाली और बुद्धिमान न्यायवादी उभरा नहीं।”

मक्का के मुफ्ती अली बिन हसन मलिकी ने खान को सभी धार्मिक विज्ञानों का विश्वकोष कहा।

सामाजिक प्रभाव

 

आला हजरत एक्सप्रेस भारतीय रेलवे से संबंधित एक एक्सप्रेस ट्रेन है जो भारत में बरेली और भुज के बीच चलती है।

31 दिसंबर 1995 को भारत सरकार ने अहमद रजा खान के सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया।

आध्यात्मिक उत्तराधिकारीसंपादित करें

इमाम अहमद रिजा खान, रहमतुली अलाईई के दो बेटे और पांच बेटियां थीं। उनके पुत्र मवलाना हामिद रिज़ा खान, रहमतुली अलाईई (डी .1362 / 1934) और मवलाना मुस्तफा रिजा खान, रहमतुली अलाईई (डी 1402/1981) इस्लाम के savants मनाए जाते हैं।

उनके कई अनुयायियों और उत्तराधिकारी थे, जिनमें भारतीय उपमहाद्वीप में 30 और 35 अन्य जगह शामिल थे।

दरगाह-ए-आला हज़रत

दावत-ए-इस्लामी

हामिद रज़ा ख़ान

अख्तर रज़ा ख़ान

मोहम्मद अब्दुल गफूर हजारवी

मुस्तफा रज़ा ख़ान

कमरज़मान आज़मी

रज़ा अकैडमी

सय्यद वहीद अशरफ़

अहमद रजा खान (अरबी : أحمد رضا خان, फारसी : احمد رضا خان, उर्दू : احمد رضا خان, हिंदी : अहमद रजा खान), जिसे आमतौर पर अहमद रजा खान बरेलवी, अरबी में अहमद रिडा खान, या बस ” अला ” के नाम से जाना जाता है -हाज़्रत “(14 जून 1856 सीई या 10 शावाल 1272 एएच – 28 अक्टूबर 1921 सीई या 25 सफार 1340 एएच ), एक इस्लामी विद्वान, न्यायवादी, धर्मविज्ञानी, तपस्वी, सूफी और ब्रिटिश भारत में सुधारक थे,  और संस्थापक बरलेवी आंदोलन का। रजा खान ने कानून, धर्म, दर्शन और विज्ञान सहित कई विषयों पर लिखा था।

इमाम अहमद रजा खान कादिरी बरकाती
اعلیٰ حضرت امام احمد رضا خان قادری

(मुस्तफा जाने रहमत पे लाखों सलाम शमये बजमे हिदायत पे लाखों सलाम
समय बज्मे हिदायत पर लाखों सलाम)

बड़ी धूमधाम से मनाया गया देखने वालो की आंखें दंग रह गए दुनिया भर के लोग उर्स में शामिल हुए और अपनी दुआएं कुबूल करवा गए बरेली शरीफ में आला हजरत साहब का मजार है जो 15 वीं सदी के Mujaddid हैं.

 

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