सूरए अअराफ़|| सूरए अअराफ़ 24 रूकू ||सूरए अअराफ़ हिंदी तर्जुमा और Tafseer

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सूरए अअराफ़|| सूरए अअराफ़ 24 रूकू ||सूरए अअराफ़ हिंदी तर्जुमा और Tafseer
सूरए अअराफ़|| सूरए अअराफ़ 24 रूकू ||सूरए अअराफ़ हिंदी तर्जुमा और Tafseer

सूरए अअराफ़|| सूरए अअराफ़ 24 रूकू ||सूरए अअराफ़ हिंदी तर्जुमा  औरसूरए अअराफ़ Tafseer

 

 

सूरए अअराफ़|| सूरए अअराफ़ 24 रूकू ||सूरए अअराफ़ हिंदी तर्जुमा और Tafseer
सूरए अअराफ़|| सूरए अअराफ़ 24 रूकू ||

सूरए अअराफ़

सूरए अअराफ़|| सूरए अअराफ़ 24 रूकू ||सूरए अअराफ़ हिंदी तर्जुमा और Tafseer मुकर्रमा में उतरी सूरए अअराफ़ दो सौ छ आयतें, चौबीस रूकू, तीन हज़ार तीन सौ पच्चीस कलिमे और चौदह हज़ार दस हुरूफ़ हैं.

सूरए अअराफ़|| सूरए अअराफ़ 24 रूकू ||सूरए अअराफ़ हिंदी तर्जुमा और Tafseer

 

Sura 4 of the Quran النسآء An-Nisāʼ Women||sura an nisa|| transliteration arabic to english||Holy  Quran

 

सूरए अअराफ़ – पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
अलिफ़-लाम-मीम-सॉद, {1} ऐ मेहबूब! एक किताब तुम्हारी तरफ़ उतारी गई तो तुम्हारा जी उससे न रूके (2)
इसलिये कि तुम उससे डर सुनाओ और मुसलमानों को नसीहत {2} ऐ लोगो उसपर चलो जो तुम्हारी तरफ़ तुम्हारे रब के पास से उतरा(3)
और उसे छोड़कर और हाकिमों के पीछे न जाओ बहुत ही कम समझते हो {3} और कितनी ही बस्तियां हमने हलाक कीं (4)
तो उनपर हमारा अज़ाब रात में आया या जब वो दोपहर को सोते थे (5){4}
तो उनके मुंह से कुछ न निकला जब हमारा अज़ाब उनपर आया मगर यही बोले कि हम ज़ालिम थे (6){5}
तो बेशक ज़रूर हमें पूछना है जिनके पास रसूल गए (7)
और बेशक हमें पूछना है रसूलों से (8){6}
तो ज़रूर हम उनको बता देंगे(9)
अपने इल्म से और हम कुछ ग़ायब न थे {7} और उस दिन तौल ज़रूर होनी है(10)
तो जिनके पल्ले भारी हुए(11)
वही मुराद को पहुंचे {8} और जिनके पल्ले हलके हुए (12)
तो वही हैं जिन्होंने अपनी जान घाटे में डाली उन ज़ियादतियों का बदला जो हमारी आयतों पर करते थे (13) {9} और बेशक हमने तुम्हें ज़मीन में जमाव बनाए (14)
बहुत ही कम शुक्र करते हो (15) {10}

तफ़सीर सूरए-अअराफ़

(1) यह सूरत मक्कए मुकर्रमा में उतरी. एक रिवायत में है कि यह सूरत मक्की है, सिवाय पाँच आयतों के, जिनमें से पहली “व असअलुहुम अनिल क़रय़तिल्लती” है. इस सूरत में दो सौ छ आयतें, चौबीस रूकू, तीन हज़ार तीन सौ पच्चीस कलिमे और चौदह हज़ार दस हुरूफ़ हैं.

(2) इस ख़याल से कि शायद लोग न मानें और इससे अलग रहें और इसे झुटलाने पर तुले हों.

(3) यानी क़ुरआन शरीफ़, जिसमें हिदायत व नूर का बयान है. ज़ुजाज ने कहा कि अनुकरण करो क़ुरआन का और उस चीज़ का जो नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम लाए, क्योंकि यह सब अल्लाह का उतारा हुआ है, जैसा कि क़ुरआन शरीफ़ में फ़रमाया “मा आताकुमुर्रसूलो फ़ख़ज़ूहो. “ यानी जो कुछ रसूल तुम्हारे पास लाएं उसे अपना लो और जिससे मना फ़रमाएं उससे बाज़ रहो.

(4) अब अल्लाह के हुक्म का अनुकरण छोड़ने और उससे आँख फेरने के नतीजे पिछली क़ौमों के हालात में दिखाए जाते हैं.

(5) मानी ये हैं कि हमारा अज़ाब ऐसे वक़्त आया जबकि उन्हें ख़याल भी न था. या तो रात का वक़्त था, और वो आराम की नींद सोते थे, या दिन में क़ैलूले का वक़्त था, और वो राहत में मसरूफ़ थे. न अज़ाब उतरने की कोई निशानी थी, न क़रीना, कि पहले से अगाह होते. अचानक आ गया. इससे काफ़िरों को चेतावनी दी जाती है कि वो अम्न और राहत के साधनों पर घमण्ड न करें. अल्लाह का अज़ाब जब आता है तो अचानक आता है.

(6) अज़ाब आने पर उन्होंने अपने जुर्म का ऐतिराफ़ किया और उस वक़्त का ऐतिराफ़ भी कोई फ़ायदा नहीं देता.

(7) कि उन्होंने रसूलों की दअवत का क्या जवाब दिया और उनके हुक्म की क्या तामील अर्थात अनुकरण किया.

(8) कि उन्होंने अपनी उम्मतों को हमारे संदेश पहुंचाए और उन उम्मतों ने उन्हें क्या जवाब दिया.

(9) रसूलों को भी और उनकी उम्मतों को भी कि उन्होंने दुनिया में क्या किया.

(10) इस तरह कि अल्लाह तआला एक तराज़ू क़ायम फ़रमाएगा जिसका हर पलड़ा इतना विस्तृत होगा जितना पूर्व और पश्चिम के बीच विस्तार है. इब्ने जौज़ी ने कहा कि हदीस में आया है कि हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने तराज़ू (मीज़ान) देखने की दरख़्वास्त की. जब मीज़ान दिखाई गई और आपने उसके पलड़ों का विस्तार देखा तो अर्ज़ किया यारब, किसकी ताक़त है कि इनको नेकियों से भर सके. इरशाद हुआ कि ऐ दाऊद, मैं जब अपने बन्दों से राज़ी होता हूँ तो एक खजूर से इसको भर देता हूँ. यानी थोड़ी सी नेकी भी क़ुबूल हो जाए तो अल्लाह के फ़ज़्ल से इतनी बढ़ जाती है कि मीज़ान को भर दे.

(11) नेकियाँ ज़्यादा हुई.

(12) और उनमें कोई नेकी न हुई. यह काफ़िरों का हाल होगा जो ईमान से मेहरूम है और इस वजह से उनका कोई अमल मक़बूल नहीं.

(13) कि उनको छोड़ते थे, झुटलाते थे, उनकी इताअत से मुंह मोड़ते थे.

(14) और अपनी मेहरबानी से तुम्हें राहतें दीं, इसके बावुजूद तुम…

(15) शुक्र की हक़ीक़त, नेअमत का तसव्वुर और उसका इज़हार है और नाशुक्री, नेअमत को भूल जाना और उसको छुपाना.

 

सूरए अअराफ़ – दूसरा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और बेशक हमने तुम्हें पैदा किया फिर तुम्हारे नक़्शे बनाए फिर हमने फ़रिश्तों से फ़रमाया कि आदम को सज्दा करो तो वो सब सज्दे में गिरे मगर इब्लीस, यह सज्दे वालों में न हुआ{11} फ़रमाया किस चीज़ ने तुझे रोका कि तूने सज्दा न किया जब मैंने हुक्म दिया था (1)
बोला मैं उससे बेहतर हूँ तूने मुझे आग से बनाया और उसे मिट्टी से बनाया (2){12}
फ़रमाया तू यहाँ से उतर जा तुझे नहीं पहुंचता कि यहां रहकर घमण्ड करे निकल (3)
तू है ज़िल्लत वालों में (4){13}
बोला मुझे फ़ुरसत दे उस दिन तक कि लोग उठाए जाएं {14} फ़रमाया तुझे मोहलत है (5){15}
बोला तो क़सम इसकी कि तूने मुझे गुमराह किया मैं ज़रूर तेरे सीधे रास्ते पर उनकी ताक में बैठूंगा (6){16}
फिर ज़रूर मैं उनके पास आऊंगा उनके आगे और उनके पीछे और उनके दाऐं और उनके बाएं से(7)
और तू उनमें से अक्सर को शुक्रगुज़ार न पाएगा (8){17}
फ़रमाया यहाँ से निकल जा रद किया गया, रोंदा हुआ, ज़रूर जो उनमें से तेरे कहे पर चला मैं तुम सबसे जहन्नम भर दूंगा (9){18}
और ऐ आदम तू और तेरा जोड़ा (10)
जन्नत में रहो तो उससे जहां चाहो खाओ और उस पेड़ के पास न जाना कि हद से बढ़ने वालों में होगे {19} फिर शैतान ने उनके जी में ख़तरा डाला कि उनपर खोलदे उनकी शर्म की चीज़े (11)
जो उनसे छुपी थीं (12)
और बोला तुम्हें तुम्हारे रब ने इस पेड़ से इसलिये मना फ़रमाया है कि कहीं तुम दो फ़रिश्ते हो जाओ या हमेशा जीने वाले (13) {20}
और उनसे क़सम खाई कि मैं तुम दोनो का भला चाहने वाला हूँ {21} तो उतार लाया उन्हें धोखे से (14)
फिर जब उन्होंने वह पेड़ चखा उनपर उनकी शर्म की चीज़ें खुल गईं (15)
और अपने बदन पर जन्नत के पत्ते चिपटाने लगे, और उन्हें उनके रब ने फ़रमाया क्या मैं ने तुम्हें इस पेड़ से मना न किया और न फ़रमाया था कि शैतान तुम्हारा खुला दुश्मन है {22} दोनों ने अर्ज़ की ऐ रब हमारे हमने अपना आप बुरा किया तो अगर तू हमें बख़्शे और हमपर रहम न करें तो हम ज़रूर नुक़सान वालों में हुए {23} फ़रमाया उतरो (16)
तुम में एक दूसरे का दुश्मन है और तुम्हें ज़मीन में एक वक़्त तक ठहरना और बरतना है {24} फ़रमाया उसी में जियोगे और उसी में उठाए जाओगे (17){25}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – दूसरा रूकू

(1) इससे साबित होता है कि हुक्म अनिवार्यता के लिये होता है और सज्दा न करने का कारण दरियाफ़्त फ़रमाना तौबीख़ के लिये है, और इसलिये कि शैतान की दुश्मनी और उसका कुफ़्र और घमण्ड और अपनी अस्ल पर गर्व करना और हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के अस्ल का निरादर करना ज़ाहिर हो जाए.

(2) इससे उसकी मुराद यह थी कि आग मिट्टी से उत्तम और महान है तो जिसकी अस्ल आग होगी वह उससे उत्तम होगा जिसकी अस्ल मिट्टी हो. और उस ख़बीस का यह ख़याल ग़लत और बातिल है, क्योंकि अफ़ज़ल वह है जिसे मालिक व मौला फ़ज़ीलत दे. फ़ज़ीलत का आधार अस्ल व जौहर पर नहीं. बल्कि मालिक की फ़रमाँबरदारी पर है. और आग का मिट्टी से उत्तम होना, यह भी सही नहीं है, क्योंकि आग में क्रोध और तेज़ी और ऊंचाई छूने की हविस है. यह कारण घमण्ड का होता है. और मिट्टी से इल्म, हया और सब्र का आदर प्राप्त होता है. मिट्टी से मुल्क आबाद होते हैं, आग से नष्ट, मिट्टी अमानतदार है, जो चीज़ उसमें रखी जाए, उसको मेहफूज़ रखे और बढ़ाए. आग फ़ना कर देती है. इसके बावुजूद लुत्फ़ यह है कि मिट्टी आग को बुझा देती है और आग मिट्टी को फ़ना नहीं कर सकती. इसके अलावा इब्लीस की मूर्खता और कटुता यह कि उसने खुले प्रमाण के होते हुए उसके मुक़ाबले में अपने अन्दाज़े से काम लेना चाहा और जो अन्दाज़ा खुले हुक्म और प्रमाण के खिलाफ़ हो वह ज़रूर मरदूद हैं.

(3) जन्नत से, कि यह जगह फ़रमाँबरदारी और विनम्रता वालों के लिये है, इन्कार और सरकशी करने वालों की नहीं.

(4) कि इन्सान तेरा त्रस्कार करेगा और हर ज़बान तुझपर लअनत करेगी और यही घमण्ड वाले का अंजाम है.

(5) और इस मुद्दत की मोहलत सूरए हिज्र मे बयान फ़रमाई गई “इन्नका मिनल मुन्ज़रीना इला यौमिल वक़्तिल मअलूम” तू उनमें है जिनको उस मअलूम वक़्त के दिन तक मोहलत है. (सूरए हिज्र, आयत 37). और यह वक़्त पहली बार के सूर फूंके जाने का है, जब सब लोग मर जाएंगे. शैतान ने मुर्दों के ज़िन्दा होने के वक़्त तक की मोहलत चाही थी और इससे उसका मतलब यह था कि मौत की सख़्ती से बच जाए. यह क़ुबूल न हुआ और पहले सूर तक की मोहलत दी गई.

(6) कि बनी आदम के दिल में वसवसे डालूं और उन्हें बातिल की तरफ़ माइल करूं, गुनाहों की रूचि दिलाऊं, तेरी इताअत और इबादत से रोकूं, और गुमराही में डालूं.

(7) यानी चारों तरफ़ से उन्हें घेर कर सीधी राह से रोकूंगा.

(8) चूंकि शैतान बनी आदम को गुमराह करने और वासनाओं तथा बुराइयों में गिरफ़्तार करने में अपनी अत्यन्त कोशिश ख़र्च करने का इरादा कर चुका था, इसलिये उसे गुमान था कि वह बनी आदम को बहका लेगा, उन्हें धोखा देकर अल्लाह की नेअमतों के शुक्र और उसकी फ़रमाँबरदारी से रोक देगा.

(9) तूझको भी और तेरी सन्तान को भी, और तेरा अनुकरण करने वाले आदमियों को भी, सबको जहन्नम में दाख़िल किया जाएगा. शैतान को जन्नत से निकाल देने के बाद हज़रत आदम को ख़िताब फ़रमाया जो आगे आता है.

(10) यानी हज़रत हव्वा.

(11) यानी ऐसा वसवसा डाला कि जिसका नतीजा यह हो कि वो दोनों आपस में एक दूसरे के सामने नंगे हो जाएं. इस आयत से यह मसअला साबित हुआ कि वह जिस्म जिसको औरत कहते हैं उसका छुपाना ज़रूरी और खोलना मना है. और यह भी साबित हुआ कि उसका खोलना हमेशा से अक़्ल के नज़दीक ख़राब और तबीअत के नागवार रहा है.

(12) इससे मालूम हुआ कि इन दोनों साहिबों ने अबतक एक दूसरे का मुंह न देखा था.

(13) कि जन्नत में रहो और कभी न मरो.

(14) मानी ये हैं कि इब्लीस मलऊन ने झूठी क़सम खाकर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को धोखा दिया और पहला झूठी क़सम खाने वाला इब्लीस ही है. हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को गुमान भी न था कि कोई अल्लाह की क़सम खाकर झूठ बोल सकता है.

(15) और जन्नती लिबास जिस्म से अलग हो गए और उनमें एक दूसरे से अपना बदन छुपा न सका. उस वक़्त तक उनमें से किसी ने ख़ुद भी अपना छुपा हुआ बदन न देखा था और न उस वक़्त तक इसकी ज़रूरत ही पेश आई थी.

(16) ऐ आदम और हव्वा, अपनी सन्तान समेत जो तुम में है.

(17) क़यामत के दिन हिसाब के लिये.

सूरए अअराफ़ – तीसरा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

ऐ आदम की औलाद बेशक हमने तुम्हारी तरफ़ एक लिबास वह उतारा कि तुम्हारी शर्म की चीज़ें छुपाए और एक वह कि तुम्हारी आरायश (सजावट) हो(1)
और परहेज़गारी का लिबास वह सबसे भला (2)
यह अल्लाह की निशानीयों में से है कि कहीं वो नसीहत मानें {26} ऐ आदम की औलाद(3)
ख़बरदार तुम्हें शैतान फ़ितने (मुसीबत) में न डाले जैसा तुम्हारे मां बाप को बहिश्त (स्वर्ग) से निकाला उतरवा दिये उनके लिबास कि उनकी शर्म की चीज़ें उन्हें नज़र पड़ीं, बेशक वह और उसका कुम्बा तुम्हें वहां से देखते हैं कि तुम उन्हें नहीं देखते(4)
बेशक हमने शैतानों को उनका दोस्त किया है जो ईमान नहीं लाते {27} और जब कोई बेहयाई करें(5)
तो कहते हैं हमने इसपर अपने बाप दादा को पाया और अल्लाह ने हमें इसका हुक्म दिया(6)
तो फ़रमाओ बेशक अल्लाह बेहयाई का हुक्म नहीं देता, क्या अल्लाह पर वह बात लगाते हो जिसकी तुम्हें ख़बर नहीं {28} तुम फ़रमाओ मेरे रब ने इन्साफ़ का हुक्म दिया है और अपने मुंह सीधे करो हर नमाज़ के वक़्त और उसकी इबादत करो निरे उसके वैसे होकर जैसे उसने तुम्हारा आगाज़ (आरम्भ) किया वैसे ही पलटोगे (7){29}
एक फ़िरके (समुदाय)को राह दिखाई (8)
और एक फ़िरके की गुमराही साबित हुई (9)
उन्होंने अल्लाह को छोड़कर शैतान को वाली (सरपरस्त) बनाया (10)
और समझते यह हैं कि वो राह पर हैं {30} ऐ आदम की औलाद, अपनी ज़ीनत (सजावट) लो जब मस्जिद में आओ (11)
और खाओ पियो (12)
और हद से न बढ़ो, बेशक हद से बढने वाले उसे पसन्द नहीं {31}

सूरए अअराफ़ – तीसरा रूकू

(1) यानी एक लिबास तो वह है जिससे बदन छुपाया जाए और गुप्तांग ढके जाएं और एक लिबास वह है जिससे ज़ीनत और श्रंगार हो और यह भी उचित कारण है.

(2) परहेज़गारी का लिबास ईमान, शर्म, नेक आदतें, अच्छे कर्म हैं. यह बेशक ज़ाहिरी श्रंगार के लिबास से बेहतर हैं.
(3) शैतान की हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के साथ दुश्मनी का बयान फ़रमाकर बनी आदम को चेतावनी दी जा रही है और होशियार किया जा रहा है कि वह शैतान के वसवसे और उसके छलकपट और बहकावे से बचते रहें. जो हज़रत आदम के साथ ऐसा धोखा कर चुका है वह उनकी औलाद के साथ कब चूकने वाला है.

(4) अल्लाह तआला ने जिन्नों को ऐसी समझ दी है कि वो इन्सानों को देखते हैं और इन्सानों को ऐसी दृष्टि नहीं मिली कि वो जिन्नों को देख सकें. हदीस शरीफ़ में है कि शैतान इन्सान के जिस्म में ख़ून की राहों में पैर जाता है. हज़रत ज़ुन्नून मिस्त्री रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि अगर शैतान ऐसा है कि वह तुम्हें देखता है तुम उसे नहीं देख सकते, तो तुम ऐसे से मदद चाहो जो उसको देखता है और वह उसे न देख सके यानी अल्लाह करीम, सत्तार, रहीम, ग़फ़्फ़ार से मदद चाहो.

(5) और कोई बुरा काम या गुनाह उनसे हो, जैसा कि जिहालत के दौर में लोग, मर्द और औरत, नंगे होकर काबे का तवाफ़ करते थे. अता का कौल है कि बेहयाई शिर्क है और हकीक़त यह है कि हर बुरा काम और तमाम गुनाह छोटे बड़े इसमें दाख़िल हैं. अगरचे यह आयत ख़ास नंगे होकर तवाफ़ करने के बारे में आई हो. जब काफ़िरों की ऐसी बेहयाई के कामों पर उनकी कटु आलोचना की गई तो इस पर उन्होंने जो कहा वह आगे आता है.

(6) काफ़िरों ने अपने बुरे कामों के दो बहाने बयान किये, एक तो यह कि उन्होंने अपने बाप दादा को यही काम करते पाया, लिहाज़ा उनके अनुकरण में ये भी करते हैं. यह तो जाहिल बदकार का अनुकरण हुआ और यह किसी समझ वाले के नज़दीक जायज़ नहीं. अनुकरण किया जाता है इल्म और तक़वा वालों का, न कि जाहिल गुमराह का. दूसरा बहाना उनका यह था कि अल्लाह ने उन्हें इन कामों का हुक्म दिया है. यह केवल झूठ और बोहतान था. चुनांचे अल्लाह तआला रद फ़रमाता है.

(7)यानी जैसे उसने तुम्हें शून्य से अस्तित्व दिया ऐसे ही मौत के बाद ज़िन्दा फ़रमाएगा. ये आख़िरत की ज़िन्दगी का इन्कार करने वालों पर तर्क है और इससे यह भी मालूम होता है कि जब उसीकी तरफ़ पलटना है और वह कर्मों को बदला देगा तो फ़रमाँबरदारी और इबादतों को उसके लिये विशेष करना ज़रूरी है.

(8) ईमान और अल्लाह की पहचान की और उन्हें फ़रमाँबरदारी और इबादत की तौफ़ीक़ दी.

(9) वो काफ़िर है.

(10) उनकी फ़रमाँबरदारी की, उनके कहे पर चले, उनके हुक्म से कुफ़्र और गुनाहों का रास्ता अपनाया.

(11) यानी सजधज और श्रंगार का लिबास. और एक कथन यह है कि कंघी करना, खुश्बू लगाना श्रंगार में दाख़िल है. और सुन्नत यह है कि आदमी अच्छी सूरत के साथ नमाज़ के लिये हाज़िर हो क्योंकि नमाज़ में रब से मांगना होता है, तो इसके लिये श्रंगार करना, इत्र लगाना मुस्तहब, जैसा कि गुप्तांग ढाँपना और पाकी वाजिब है. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है, जाहिलियत के दौर में दिन में मर्द और औरतें नंगे होकर तवाफ़ करते थे. इस आयत में गुप्तांग छुपाने और कपड़े पहनने का हुक्म दिया गया और इसमें दलील है कि गुप्तांग का ढाँपना नमाज़ व तवाफ़ और हर हाल में वाजिब है.

(12) कल्बी का क़ौल है कि बनी आमिर हज के ज़माने में अपनी ख़ुराक बहुत ही कम कर देते थे और गोश्त व चिकनाई तो बिल्कुल ही न छुते थे और इसको हज का आदर जानते थे. मुसलमानों ने उन्हें देखकर अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह, हमें ऐसा करने का ज़्यादा हक़ है. इस पर उतरा कि खाओ और पियो, गोश्त हो या सिर्फ़ चिकनाई. और फ़ुज़ूल ख़र्ची न करो और वह यह है कि पेट भर जाने के बाद भी खाते रहो या हराम की पर्वाह न करो और यह भी फ़ुज़ूल ख़र्ची है कि जो चीज़ अल्लाह तआला ने हराम नहीं की, उसको हराम कर लो. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अनहुमा ने फ़रमाया जो चाहे खा और जो चाहे पहन, फ़ुज़ूल ख़र्ची और घमण्ड से बचता रह. इस आयत में दलील है कि खाने पीने की तमाम चीज़ें हलाल हैं, सिवाय उनके जिनपर शरीअत में हुरमत की दलील क़ायम हो क्योंकि यह क़ायदा निश्चत और सर्वमान्य है कि अस्ल तमाम चीज़ों में अबाहत है मगर जिसपर शरीअत ने पाबन्दी लगाई हो और उसकी हुरमत दलीले मुस्तक़िल से साबित हो.

सूरए अअराफ़ – चौथा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

तुम फ़रमाओ, किस ने हराम की अल्लाह की वह ज़ीनत जो उसने अपने बन्दों के लिये निकाली(1)
और पाक रिज़्क़(रोज़ी) (2)
तुम फ़रमाओ कि वह ईमान वालों के लिये है दुनिया में और क़यामत में तो ख़ास उन्हीं की है हम यूंही मुफ़स्सल(विस्तार से) आयतें बयान करते हैं (3)
इल्म वालो के लिये(4) {32}
तुम फ़रमाओ, मेरे रब ने तो बेहयाइयां हराम फ़रमाई हैं (5)
जो उनमें खुली हैं और जो छुपी और गुनाह और नाहक़ ज़ियादती और यह (6)
कि अल्लाह का शरीक करो जिसकी उसने सनद न उतारी और यह(7)
कि अल्लाह पर यह बात कहो जिसका इल्म नहीं रखते {33} और हर गिरोह का एक वादा है (8)
तो जब उनका वादा आएगा एक घड़ी न पीछे हो न आगे {34} ऐ आदम की औलाद अगर तुम्हारे पास तुम में के रसूल आएं (9)
मेरी आयतें पढ़ते तो जो परहेज़गारी करे (10)
और संवरे (11)
तो उसपर न कुछ डर और न कुछ ग़म{35} और जिन्होंने हमारी आयतें झुटलाई और उनके मुक़ाबले घमण्ड किया वो दोज़ख़ी हैं, उन्हें उसमें हमेशा रहना {36} तो उससे बढ़कर ज़ालिम कौन जिसने अल्लाह पर झूट बांधा या उसकी आयतें झुटलाई उन्हें उनके नसीब का लिखा पहुंचेगा (12)
यहां तक कि जब उनके पास हमारे भेजे हुए (13)
उनकी जान निकालने आएं तो उनसे कहते हैं कहां है वो जिनको तुम अल्लाह के सिवा पूजते थे, कहते हैं वो हम से गुम गए (14)
और अपनी जानों पर आप गवाही देते हैं कि वो काफ़िर थे {37} अल्लाह उनसे (15)
फ़रमाता है कि तुमसे पहले जो और जमाअतें (दल) थीं जिन्न और आदमियों की आग में गई उन्हीं में जाओ जब एक दल(16)
दाख़िल होता है दूसरे पर लअनत करता है (17)
यहां तक कि जब सब उसमें जा पड़े तो पिछले पहलों को कहेंगे (18)
ऐ रब हमारे, इन्होंने हमको बहकाया था तो उन्हें आग का दूना अज़ाब दे, फ़रमाएगा सबको दूना है(19)
मगर तुम्हें ख़बर नहीं(20) {38}
और पहले पिछलों से कहेंगे, तो तुम कुछ हमसे अच्छे न रहे (21)
तो चखो अज़ाब, बदला अपने किये का(22){39}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – चौथा रूकू

(1) चाहे लिबास हो या और ज़ीनत व श्रंगार का सामान.

(2) और खाने पीने की मज़ेदार चीज़ें. आयत में आम बयान है. हर खाने की चीज़ इसमें दाख़िल है कि जिसके हराम होने पर कोई खुला हुक्म न आया हो (ख़ाज़िन). तो जो लोग तोशा ग्यारहवीं, मीलाद शरीफ़, बुज़ुर्गों की फ़ातिहा, उर्स, शहादत की मजलिसों वग़ैरह की शीरीनी, सबील के शरबत को वर्जित कहते हैं, वो इस आयत का ख़िलाफ़ करके गुनाहगार होते हैं और इसको अवैध कहना अपनी राय को दीन में दाख़िल करना है और यही बिदअत और गुमराही है.

(3) जिनसे हालात और हराम के अहकाम मालूम हों.

(4) जो ये जानते हैं कि अल्लाह एक है, उसका कोई शरीक नहीं है, वह जो हराम करे वही हराम है.

(5) यह सम्बोधन मुश्रिकों से है जो नंगे होकर काबे का तवाफ़ करते थे और अल्लाह तआला की हलाल की हुई पाक चीज़ों को हराम कर लेते थे. उनसे फ़रमाया जाता है कि अल्लाह तआला ने ये चीज़ें हराम नहीं की और उनसे अपने बन्दों को नहीं रोका. जिन चीज़ों को उसने हराम फ़रमाया वो ये हैं जो अल्लाह तआला बयान फ़रमाता है. इनमें से बेहयाइयाँ है जो खुली हुई हों या छुपी हुई. यानी जिनका सम्बन्ध बातों से है या कर्मों से.

(6) हराम किया.

(7) हराम किया.

(8) निशिचित समय, जिसपर मोहलत ख़त्म हो जाती है.

(9) मुफ़स्सिरों के इसमें दो क़ौल हैं. एक तो यह कि “रूसुल” से तमाम रसूल मुराद हैं. दूसरा यह कि ख़ास सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मुराद हैं जो तमाम सृष्टि की तरफ़ रसूल बनाए गए और बहुवचन सम्मान के लिये है.

(10) मना की हुई चीज़ों से बचे.

(11) आज्ञा का पालन करे और इबादते पूरी करे.

(12) यानी जितनी उम्र और रोज़ी अल्लाह ने उनके लिये लिख दी है, उनको पहुंचेगी.

(13) मौत का फ़रिश्ता और उसके सहायक, इन लोगों की उम्रें और रोज़ियाँ पूरी होने के बाद.

(14) उनका कहीं नाम निशान ही नहीं.

(15) उन काफ़िरों से क़यामत के दिन.

(16) दोज़ख़ में.

(17) जो उसके दीन पर था तो मुश्रिकों पर लानत करेंगे और यहूदी यहूदीयों पर और ईसाई ईसाइयों पर.

(18) यानी पहलों की निस्बत अल्लाह तआला से कहेंगे.

(19) क्योंकि पहले ख़ुद भी गुमराह हुए और उन्होंने दूसरों को भी गुमराह किया और पिछले भी ऐसे ही हैं कि ख़ुद गुमराह हुए और गुमराहों का ही अनुकरण करते रहे.

(20) कि तुम में से हर पक्ष के लिये कैसा अज़ाब है.

(21) कुफ्र और गुमराही में दोनों बराबर है.

(22) कुफ़्र का और बुरे कर्मों का.

सूरए अअराफ़ – पाँचवां रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

वो जिन्होंने हमारी आयतें झुटलाई और उनके मुक़ाबले में घमण्ड किया उनके लिये आसमान के दर्वाज़े न खोले जाएंगे (1)
और न वो जन्नत में दाख़िल हों जब तक सुई के नाके ऊंट दाख़िल न हो(2)
और मुजरिमों को हम ऐसा ही बदला देते हैं (3){40}
उन्हें आग ही बिछौना और आग ही ओढ़ना (4)
और ज़ालिमों को हम ऐसा ही बदला देते हैं{41} और वो जो ईमान लाए और ताक़त भर अच्छे काम किये हम किसी पर ताक़त से ज़्यादा बोझ नहीं रखते, वो जन्नत वाले हैं उन्हें हमेशा उसी मे रहना{42} और हमने उनके सीनों मे से कीने (द्वेष) खींच लिये (5)
उनके नीचे नेहरें बहेंगी और कहेंगे (6)
सब ख़ूबियां अल्लाह को जिसने हमें इसकी राह दिखाई (7)
और हम राह न पाते अगर अल्लाह हमें राह न दिखाता बेशक हमारे रब के रसूल हक़ लाए (8)
और निदा (पुकार) हुई कि यह जन्नत तुम्हें मीरास मिली (9)
सिला (इनाम) तुम्हारे कर्मों का {43} और जन्नत वालों ने दोज़ख़ वालों को पुकारा कि हमें तो मिल गया जो सच्चा वादा हमसे हमारे रब ने किया था (10)
तो क्या तुमने भी पाया जो तुम्हारे रब ने (11)
सच्चा वादा तुम्हें दिया था, बोले हां और बीच में मनादी (उदघोषक) ने पुकार दिया कि अल्लाह की लअनत ज़ालिमों पर {44} जो अल्लाह की राह से रोकते हैं (12) 
और उससे कजी (टेढ़ापन) चाहते हैं (13)
और आख़िरत का इन्कार रखते हैं {45} और जन्नत व दोज़ख़ के बीच में एक पर्दा हैं (14)
और अअराफ़ (ऊंचाइयों) पर कुछ मर्द होंगे (15)
कि दोनों फ़रीक़ (पक्षों) को उनकी परेशानियों से पहचानेंगे (16)
और वो जन्नतियों को पुकारेंगे कि सलाम तुमपर ये (17)
जन्नत में न गए और इसका लालच रखते हैं {46} और जब उनकी (18)
आंखें दोज़ख़ियों की  तरफ़ फिरेंगी कहेंगे ऐ रब हमारे हमें ज़ालिमों के साथ न कर {47}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – पाँचवां रूकू

(1) न उनके कर्मों के लिये, न उनकी आत्माओं के लिये, क्योंकि उनके कर्म और आत्माएं दोनों ख़बीस हैं. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि काफ़िरों की आत्माओं के लिये आसमान के दरवाज़े नहीं खोले जाते और ईमान वालों की आत्माओं के लिये खोले जाते हैं. इब्ने जरीह ने कहा कि आसमान के दरवाज़े न काफ़िरों के अमल के लिये खोले जाएं न आत्माओं के लिये यानी न ज़िन्दगी में उनका अमल ही आसमान पर जा सकता है, न मौत के बाद आत्मा. इस आयत की तफ़सीर में एक क़ौल यह भी है कि आसमान के दरवाज़े न खोले जाने के ये मानी हैं कि वह ख़ैर व बरकत और रहमत उतरने से मेहरूम रहते हैं.

(2) और यह असम्भव, तो काफ़िरों का जन्नत में दाख़िल होना असम्भव, क्योंकि असम्भव पर जो निर्भर हो वह असम्भव होता है. इससे साबित हुआ कि काफ़िरों का जन्नत से मेहरूम रहना यक़ीनी बात है.

(3) मुजरिमीन से यहाँ काफ़िर मुराद हैं क्योंकि ऊपर उनकी सिफ़त में अल्लाह की निशानियों को झुटलाने और उनसे घमण्ड करने का बयान हो चुका है.

(4) यानी ऊपर नीचे हर तरफ़ से आग उन्हें घेरे हुए है.

(5) जो दुनिया में उनके बीच थे और तबीअतें साफ़ कर दी गई और उनमें आपस में न बाक़ी रही मगर महब्बत और भाई चारगी. हज़रत अली मुरतज़ा रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि यह हम बद्र वालों के बारे में उतरा. और यह भी आप से रिवायत है कि आप ने फ़रमाया, मुझे उम्मीद है कि मैं और उस्मान और तलहा और ज़ुबैर उनमें से हों जिनके बारे में अल्लाह तआला ने “व नज़अना माफ़ी सुदूरिहिम मिन ग़िल्लिन” (और हमने उनके सीनों में से कीने खींच लिये) फ़रमाया. हज़रत अली मुरतज़ा के इस इरशाद ने राफ़ज़ियत की बुनियाद ही काटकर रख दी.

(6) ईमान वाले, जन्नत में दाख़िल होते वक़्त.

(7) और हमें ऐसे अमल की तोफ़ीक़ दी जिसका यह इनाम और सवाब है, और हम पर मेहरबानी और रहमत फ़रमाई और अपने करम से जहन्नम के अज़ाब से मेहफूज़ किया.

(8) और जो उन्होंने हमें दुनिया में सवाब की ख़बरें दीं वो सब हमने ज़ाहिर देख लीं. उनकी हिदायत हमारे लिये अत्यन्त लुत्फ़ और करम की बात थी.

(9) मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है, जब जन्नत में दाख़िल होंगे, एक पुकारने वाला पुकारेगा, तुम्हारे लिये ज़िन्दगानी है, कभी न मरोगे, तुम्हारे लिये तन्दुरूस्ती है, कभी बीमार न होगे, तुम्हारे लिये राहत है, कभी तंग हाल न होगे, जन्नत को मीरास फ़रमाया गया, इसमें इशारा है कि वह सिर्फ़ अल्लाह के करम से हासिल हुई.

(10) और रसूलों ने फ़रमाया था कि ईमान और फ़रमाँबरदारी पर इनाम और सवाब पाओगे.

(11) कुफ़्र और नाफ़रमानी पर अज़ाब का.

(12) और लोगों को इस्लाम में दाख़िल होने से मना करते हैं.

(13) यानी यह चाहते हैं कि अल्लाह के दीन को बदल दें और जो तरीक़ा अल्लाह तआला ने अपने बन्दों के लिये मुक़र्रर फ़रमाया है, उसमें परिवर्तन कर दें. (ख़ाज़िन)

(14) जिसको अअराफ़ कहते हैं.

(15) ये किस तबक़े के होंगे, इसमें विभिन्न कथन हैं. एक क़ौल तो यह है कि ये वो लोग होंगे जिनकी नेकियाँ और बुराइयाँ बराबर हों, वो आराम पर ठहरे रहेंगे. जब जन्नत वालों की तरफ़ देखेंगे तो उन्हें सलाम करेंगे और दोज़ख़ वालों की तरफ़ देखेंगे तो कहेंगे, यारब हमें ज़ालिम क़ौम के साथ न कर. आख़िरकार जन्नत में दाख़िल किये जाएंगे. एक क़ौल यह है कि जो लोग जिहाद में शहीद हुए मगर उनके माँ बाप उनसे नाराज़ थे, वो अअराफ़ में ठहराए जाएंगे. एक क़ौल यह है कि जो लोग ऐसे हैं कि उनके माँ बाप में से एक उनसे राज़ी हो, एक नाराज़, वो अअराफ़ में रखे जाएंगे. इन कथनों से मालूम होता है कि अअराफ़ वालों का दर्जा जन्नत वालों से कम है. मुजाहिद का क़ौल है कि अअराफ़ में नेक लोग, फ़कीर और उलमा होंगे और उनका वहाँ ठहरना इसलिये होगा कि दूसरे उनके दर्जें और बुज़ुर्गी को देखें. और एक क़ौल यह है कि अअराफ़ में नबी होंगे और वो उस ऊंचे मकाम में सारे क़यामत वालों पर विशिष्ट किये जाएंगे और उनकी फ़ज़ीलत और महानता का इज़हार किया जाएगा ताकि जन्नती और दोज़ख़ी उनको देखें और वो उन सबके अहवाल और सवाब व अज़ाब की मात्रा का अवलोकन करें. इन क़ौलों पर अअराफ़ वाले जन्नतियों से अफ़ज़ल लोग होंगे क्योंकि वो बाक़ियों से दर्जें में महान हैं. इन तमाम कथनों में कोई टकराव नहीं है. इसलिये कि हो सकता है कि हर तबक़े के लोग अअराफ़ में ठहराए जाएं और हर एक के ठहराए जाने की हिकमत अलग है.

(16) दोनों पक्षों से जन्नती और दोज़ख़ी मुराद हैं. जन्नतियों के चेहरे सफ़ेद और ताज़ा होंगे और दोज़ख़ियों के चेहरे काले और आँख़ें नीली, यही उनकी निशानियां हैं.

(17) अअराफ़ वाले अभी तक.

(18) अअराफ़ वालों की.

सूरए अअराफ़ – छटा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और अअराफ़ वाले कुछ मर्दों को (1)
पुकारेंगे जिन्हें उनकी पेशानी से पहचानते हैं कहेंगे तुम्हें क्या काम आया तुम्हारा जत्था और वह जो तुम घमण्ड करते थे(2){48}
क्या ये हैं वो लोग (3)
जिनपर तुम क़समें खाते थे कि अल्लाह इनपर अपनी रहमत कुछ न करेगा (4)
इनसे तो कहा गया कि जन्नत में जाओ न तुम को डर न कुछ ग़म {49} और दोज़ख़ वाले जन्नत वालों को पुकारेंगे कि हमें अपने पानी का कुछ फ़ैज़ (लाभ) दो या उस खाने का जो अल्लाह ने तुम्हें दिया (5)
कहेंगे बेशक अल्लाह ने इन दोनों को काफ़िरों पर हराम किया है {50} जिन्होंने अपने दीन को खेल तमाशा बना लिया (6)
और दुनिया की ज़िन्दगी में उन्हें धोखा दिया(7)
तो आज हम उन्हें छोड़ देंगे जैसा हमारी आयतों से इन्कार करते थे {51} और बेशक हम उनके पास एक किताब लाए (8)
जिसे हमने एक बड़े इल्म से मुफ़स्सल (विस्तृत) किया हिदायत व रहमत ईमान वालों के लिये {52} काहे की राह देखते हैं मगर इसकी कि इस किताब का कहा हुआ अनजाम सामने आए जिस दिन इसका बताया हुआ अंजाम वाक़े होगा(9)
बोल उठेंगे वो जो इसे पहले से भुलाए बैठे थे (10)
कि बेशक हमारे रब के रसूल हक़ लाए थे तो हैं कोई हमारे सिफ़ारिशी जो हमारी शफ़ाअत (सिफ़ारिश) करेंगे या हम वापस भेजे जाएं कि पहले कामों के ख़िलाफ़ करें (11)
बेशक उन्होंने अपनी जानें नुक़सान में डालीं और उनसे खोए गए जो बोहतान (लांछन) उठाते थे(12){43}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – छटा रूकू

(1) काफ़िरों में से.

(2) और अअराफ़ वाले ग़रीब मुसलमानों की तरफ़ इशारा करके काफ़िरों से कहेंगे.

(3) जिनको तुम दुनिया में हक़ीर या तुच्छ समझते थे, और………

(4) अब देख लो कि जन्नत के हमेशा के ऐश और राहत में किस इज़्ज़त और सम्मान के साथ हैं.

(5) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि जब अअराफ़ वाले जन्नत में चले जाएंगे तो दोज़ख़ियों को भी लालच आएगा और वो अर्ज़ करेंगे, यारब जन्नत में हमारे रिश्तेदार हैं इजाज़त अता फ़रमा कि हम उन्हें देख़ें, उनसे बात करें. इजाज़त दी जाएगी तो वो अपने रिश्तेदारों को जन्नत की नेअमतों में देखेंगे और पहचानेंगे. लेकिन जन्नत वाले उन दोज़ख़ी रिश्तेदारों को न पहचानेंगे क्योंकि दोज़ख़ियों के मुंह काले होंगे, सूरतें बिगडी हुई होंगी. तो वो जन्नतियों का नाम ले लेकर पुकारेंगे. कोई अपने बाप को पुकारेगा, कोई भाई को, और कोई कहेगा, मैं जल गया मुझपर पानी डालो और तुम्हें अल्लाह ने दिया है, खाने को दो, इस पर जन्नत वाले.

(6) कि हलाल और हराम में अपनी नफ़्सानियत के ग़ुलाम हुए, जब ईमान की तरफ़ उन्हें दअवत दी गई तो हंसी उड़ाने लगे.

(7) इसकी लज़्ज़तों में आख़िरत को भूल गए.

(8) क़ुरआन शरीफ़.

(9) और वह क़यामत का दिन है.

(10) न उसपर ईमान लाते थे न उसके अनुसार अमल करते थे.

(11) यानी बजाय कुफ़्र के ईमान लाएं और बजाय बुराई और नाफ़रमानी के ताअत और फ़रमाँबरदारी इख़्तियार करें. मगर न उन्हें शफ़ाअत मिलेगी न दुनिया में वापस भेजे जाएंगे.

(12) और झूठ बकते थे कि बुत ख़ुदा के शरीक हैं और अपने पुजारियों की शफ़ाअत करेंगे. अब आख़िरत में उन्हें मालूम हो गया कि उनके ये दावे झूठे थे.

सूरए अअराफ़ – सातवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

बेशक तुम्हारा रब अल्लाह है जिसने आसमान और ज़मीन (1)
छ दिन में बनाए (2)
फिर अर्श पर इस्तिवा फ़रमाया जेसा उसकी शान के लायक़ है (3)
रात दिन को एक दूसरे से ढांकता है कि जल्द उसके पीछे लगा आता है और सूरज और चांद और तारों को बनाया सब उसके हुक्म के दबे हुए, सुन लो उसी के हाथ है पैदा करना और हुक्म देना बड़ी बरकत वाला है अल्लाह रब सारे जगत का {54} अपने रब से दुआ करो गिड़गिड़ाते और आहिस्ता बेशक हद से बढ़ने वाले उसे पसन्द नहीं (4){55}
और ज़मीन में फ़साद न फैलाओ (5)
उसके संवरने के बाद(6)
और उससे दुआ करो डरते और तमा(लालच) करते, बेशक अल्लाह की रहमत नेकों से क़रीब है {56} और वही है कि हवाएं भेजता है उसकी रहमत के आगे ख़ुशख़बरी सुनाती(7)
यहां तक कि जब उठा लाएं भारी बादल हमने उसे किसी मुर्दा शहर की तरफ़ चलाया(8)
फिर उससे पानी उतारा फिर उससे तरह तरह के फल निकाले, इसी तरह हम मुर्दों को निकालेंगे(9)
कहीं तुम नसीहत मानो {57} और जो अच्छी ज़मीन है उसका सब्ज़ा अल्लाह के हुक्म से निकलता है (10)
और जो ख़राब है उसमें नहीं निकलता मगर थोड़ा मुश्किल(11)
से हम यूंही तरह तरह से आयतें बयान करते हैं(12)
उनके लिये जो एहसान मानें {58}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – सातवाँ रूकू

(1) उन तमाम चीज़ों समेत जो उनके बीच है, जैसा कि दूसरी आयत में आया “वलक़द ख़लक़नस समावाते वल अर्दा वमा बैनहुमा फ़ी सित्तते अय्यामिन” (बेशक हमने आसमानों और ज़मीन को और जो कुछ उनके बीच है छ: दिन में बनाया – सूरए क़ाफ़, आयत 38)

(2) छ: दिन से दुनिया के छ: दिनों की मिक़दार मुराद है क्योंकि ये दिन तो उस वक़्त थे नहीं. सूरज ही न था, जिससे दिन होता और अल्लाह तआला क़ादिर था कि एक क्षण में या उससे कम में पैदा फ़रमाता. लेकिन इतने अर्से में उनकी पैदाइश फ़रमाना उसकी हिकमत का तक़ाज़ा है और इससे बन्दों को अपने काम एक के बाद एक करने का सबक़ मिलता है.

(3) यह इस्तिवा मुतशाबिहात में से है, यानी क़ुरआन के वो राज़ जिनका इल्म सिर्फ़ अल्लाह तआला को और उसके बताए से किसी और को है. हम इसपर ईमान लाते हैं कि अल्लाह तआला की इस “इस्तिवा” से जो मुराद है, वह हक़ है. हज़रत इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया कि इस्तिवा मालूम है और उसकी कैफ़ियत मजहूल और उस पर ईमान लाना वाजिब. आला हज़रत रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया इसके मानी ये हैं कि आफ़रीनश का ख़ात्मा अर्श पर जा ठहरा. अपने कलाम के राज़ अल्लाह ही बेहतर जाने.

(4) दुआ अल्लाह तआला से भलाई तलब करने को कहते हैं और यह इबादत में दाख़िल है, क्योंकि यह दुआ करने वाला अपने आपको आजिज़ व मोहताज और अपने परवर्दिगार को हक़ीक़ी क़ुदरत वाला और हाजत पूरी करने वाला मानता है, इसीलिये हदीस शरीफ़ में आया “अद दुआओ मुख़्खुल इबादते” यानी दुआ इबादत का गूदा है. गिड़गिड़ाने से अपनी आजिज़ी और फ़रियाद मुराद है और दुआ का अदब यह है कि आहिस्ता दुआ करना, खुलेआम दुआ करने से सत्तर दर्जा ज़्यादा अफ़ज़ल है. इसमें उलमा का इख़्तिलाफ़ है कि इबादतों में इज़हार अफ़ज़ल है, या इख़फ़ा. कुछ कहते है कि इख़्फ़ा यानी छुपाना अफ़ज़ल है क्योंकि वह रिया यानी दिखावे से बहुत दूर है. कुछ कहते है कि इज़हार यानी ज़ाहिर करना, खोलना अफ़ज़ल है इसलिये कि इससे दूसरों को इबादत की रूचि पैदा होती है. तिरमिज़ी ने कहा कि अगर आदमी अपने नफ़्स पर रिया का अन्देशा रखता हो तो उसके लिये इख़्फ़ा यानी छुपाना अफ़ज़ल है. और अगर दिल साफ़ हो, रिया का अन्देशा न हो तो इज़हार अफ़ज़ल है. कुछ हज़रात ये फ़रमाते हैं कि फ़र्ज़ इबादतों में इज़हार अफ़ज़ल है. फ़र्ज़ नमाज़ मस्जिद ही में बेहतर है और ज़कात का इज़हार करके देना ही अफ़ज़ल और नफ़्ल इबादतों में, चाहे वह नमाज़ हो या सदक़ा वग़ैरह, इनमें इख़्फ़ा बेहतर है. दुआ में हद से बढ़ना कई तरह होता है, इसमें से एक यह भी है कि बहुत बलन्द आवाज़ से चीख़े.

(5) कुफ़्र और बुराई और ज़ुल्म करके.

(6) नबियों के तशरीफ़ लाने, हक़ की दअवत फ़रमाने, अहकाम बयान करने, इन्साफ़ क़ायम फ़रमाने के बाद.

(7) बारिश और रहमत से यहाँ मेंह मुराद है.

(8) जहाँ बारिश न हुई थी, सब्जा न जमा था.

(9) यानी जिस तरह मुर्दा ज़मीन को वीरानी के बाद ज़िन्दगी अता फ़रमाता और उसको हराभरा और तरो ताज़ा करता है और उसमें खेती, दरख़्त, फल फूल पैदा करता है, ऐसे ही मुर्दों को क़ब्रों से ज़िन्दा करके उठाएगा, क्योंकि जो ख़ुश्क लकड़ी से तरो ताज़ा फल पैदा करने पर क़ादिर है उसे मुर्दों का ज़िन्दा करना क्या मुश्किल है. क़ुदरत की निशानी देख लेने के बाद अक़्ल वाले और सही समझ वाले को मुर्दों के ज़िन्दा किये जाने में कोई शक बाक़ी नहीं रहता.

(10) यह ईमान वाले की मिसाल है. जिस तरह उमदा ज़मीन पानी से नफ़ा पाती है और उसमें फूल फल पैदा होते है उसी तरह जब मूमिन के दिल पर क़ुरआनी नूर की बारिश होती है तो वह उससे नफ़ा पाता है, ईमान लाता है, ताअतों और इबादतों से फलता फूलता है.

(11) यह काफ़िर की मिसाल है, जैसे ख़राब ज़मीन बारिश से नफ़ा नहीं पाती, ऐसे ही काफ़िर क़ुरआने पाक से फ़ायदा नहीं उठा पाता.

(12) जो तौहीद और ईमान पर तर्क और प्रमाण हैं.

सूरए अअराफ़ – आठवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

बेशक हमने नूह को उसकी क़ौम की तरफ़ भेजा (1)
तो उसने कहा ऐ मेरी क़ौम अल्लाह को पूजो (2)
उसके सिवा तुम्हारा कोई मअबूद (आराध्य) नहीं (3)
बेशक मुझे तुम पर बड़े दिन के अज़ाब का डर है (4){59}
उसकी क़ौम से सरदार बोले बेशक हम तुम्हें खुली गुमराही में देखते हैं {60} कहा ऐ मेरी क़ौम मुझमें गुमराही नहीं, मैं तो सारे जगत के रब का रसूल हूँ {61} तुम्हें अपने रब की रिसालतें (संदेश) पहुंचाता और तुम्हारा भला चाहता और मैं अल्लाह की तरफ़ से वह इल्म रखता हूँ जो तुम नहीं रखते {62} और क्या तुम्हें इसका अचंभा हुआ कि तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से एक नसीहत आई तुम में के एक मर्द की मारिफ़त (द्वारा) (5)
कि वह तुम्हें डराए और तुम डरो और कहीं तुमपर रहम हो {63} तो उन्होंने उसे (6)
झुटलाया तो हमने उसे और जो (7)
उसके साथ किश्ती में थे निजात दी और अपनी आयतें झुटलाने वालों को डुबो दिया, बेशक वह अंधा गिरोह था (8){64}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – आठवाँ रूकू

(1) हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के वालिद का नाम लमक है. वह मतूशल्ख़ के, वह अख़नूख़ अलैहिस्सलाम के फ़रज़न्द हैं. अख़नूख़ हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम का नाम है. हज़रत नूह अलैहिस्सलाम चालीस या पचास साल की उम्र में नबुव्वत से सम्मानित किये गए. ऊपर की आयतों में अल्लाह तआला ने अपनी क़ुदरत की दलीलें और अपनी सनअत के चमत्कार बयान फ़रमाए जिनसे उसके एक होने और मअबूद होने का सुबूत मिलता है. और मरने के बाद उठने और ज़िन्दा होने की सेहत पर खुली दलीलें क़ायम कीं. इसके बाद नबियों का ज़िक्र फ़रमाता है और उनके उन मामलों का, जो उन्हें उम्मतों के साथ पेश आए. इसमें नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली है कि केवल आप ही की क़ौम ने हक़ क़ुबूल करने से इन्कार नहीं किया, बल्कि पहली उम्मतें भी इन्कार करती रहीं और नबियों को झुटलाने वालों का अंजाम दुनिया में हलाकत और आख़िरत में भारी अज़ाब है. इससे ज़ाहिर है कि नबियों को झुटलाने वाले अल्लाह के ग़ज़ब और प्रकोप के हक़दार होते हैं. जो व्यक्ति सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को झुटलाएगा, उसका भी यही अंजाम होगा. नबियों के इन तज़किरों में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत की ज़बरदस्त दलील है, क्योंकि हुज़ूर उम्मी थे यानी ज़ाहिर में पढ़े लिखे न थे. फिर आपका इन घटनाओ को तफ़सील से बयान करना, ख़ास तौर से ऐसे मुल्क में, जहाँ किताब वालों के उलमा काफ़ी मौजूद थे, और सख़्त विरोधी भी थे, ज़रासी बात पाते तो बहुत शोर मचाते, वहाँ हुज़ूर का इन घटनाओ को बयान करना और किताब वालों का ख़ामोश और स्तब्ध तथा आश्चर्य चकित रह जाना, खुली दलील है कि आप सच्चे नबी हैं और अल्लाह तआला ने आप पर उलूम के दर्वाज़े खोल दिये हैं.

(2) वही इबादत के लायक़ है.

(3) तो उसके सिवा किसी को न पूजों.

(4) क़यामत के दिन का या तूफ़ान के दिन का, अगर तुम मेरी नसीहत क़ुबूल न करो और सीधी राह पर न आओ.

(5) जिसको तुम ख़ूब जानते हो और उसके नसब को पहचानते हो.

(6) यानी हज़रत नूह अलैहिस्सलाम को.

(7) उनपर ईमान लाए और.

(8) जिसे सत्य नज़र न आता था. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि उनके दिल अन्धे थे, मअरिफ़त यानी रब को पहचानने के नूर से उनको फ़ायदा न था.

 

 

सूरए अअराफ़ – नवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और आद की तरफ़ (1)
उनकी बिरादरी से हूद को भेजा (2)
कहा ऐ मेरी क़ौम अल्लाह की बन्दगी करो उसके सिवा तुम्हारा कोई मअबूद नहीं तो क्या तुम्हें डर नहीं (3){65}
उसकी क़ौम के सरदार बोले बेशक हम तुम्हें बेवक़ूफ़ समझते हैं और बेशक हम तुम्हें झूटों में गुमान करते हैं (4){66}
कहा ऐ मेरी क़ौम मुझे बेवक़ूफ़ी से क्या सम्बन्ध मैं तो परवर्दिगारे आलम का रसूल हूँ {67} तुम्हें अपने रब की रिसालतें (संदेश) पहुंचाता हूँ और तुम्हारा मोअतमिद (विशवास पात्र) और भला चाहने वाला हूँ (5){68}
और क्या तुम्हें इसका अचंभा हुआ कि तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से एक नसीहत आई तुम में से एक मर्द की मअरिफ़त कि वह तुम्हें डराए और याद करो जब उसने तुम्हें नूह की क़ौम का जानशीन (उत्तराधिकारी) किया (6)
और तुम्हारे बदन का फैलाव बढ़ाया (7)
तो अल्लाह की नेमअतें याद करो (8)
कि कहीं तुम्हारा भला हो {69} बोले क्या तुम हमारे पास इसलिये आए हो (9)
कि हम एक अल्लाह को पूजें और जो (10)
हमारे बाप दादा पूजते थे उन्हें छोड़दें तो लाओ (11)
जिसका हमें वादा दे रहे हो अगर सच्चे हो {70} कहा (12)
ज़रूर तुमपर तुम्हारे रब का अज़ाब और ग़ज़ब (क्रोध) पड़ गया (13)
क्या मुझसे ख़ाली इन नामों में झगड़ रहे हो जो तुमने अपने और तुम्हारे बाप दादा ने रख लिये (14)
अल्लाह ने उनकी कोई सनद न उतारी, तो रास्ता देखो(15)
मैं भी तुम्हारे साथ देखता हूँ {71} तो हमने उसे और उसके साथ वालों को (16)
अपनी एक बड़ी रहमत फ़रमाकर निजात दी (17)
और जो हमारी आयतें झुटलाते (18)
थे उनकी जड़ काट दी (19) और वो ईमान वाले न थे {72}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – नवाँ रूकू

(1) यहाँ आद प्रथम मुराद है. यह हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की क़ौम है, और आद द्वितीय हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम की क़ौम है, उसी को समूद कहते हैं. इन दोनों के बीच सौ बरस का फ़ासला है. (जुमल)

(2) हूद अलैहिस्सलाम ने.

(3) अल्लाह के अज़ाब का.

(4) यानी रिसालत के दावे में सच्चा नहीं जानते.

(5) काफ़िरों का हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की शान में यह निरादर और अपमान का कलाम, कि तुम्हें बेवकूफ़ समझते हैं, झूटा ख़याल करते हैं, अत्यन्त दर्जें की बेअदबी और कमीनगी थी. और वो हक़दार इस बात के थे कि उन्हें सख़्त से सख़्त जवाब दिया जाता, मगर आपने अपने अख़लाक़ और अदब और विनम्रता की शान से जो जवाब दिया, उसमें मुक़ाबले की शान ही न पैदा होने दी और उनकी जिहालत से चश्मपोशी फ़रमाई. इससे दुनिया का सबक़ मिलता है कि गिरे हुए और ख़राब ख़सलत वाले लोगों से इस तरह सम्बोधन करना चाहिये. इसके साथ ही आपने अपनी रिसालत और ख़ैरख्वाही और अमानत का ज़िक्र फ़रमाया. इससे यह मसअला मालूम हुआ कि इल्म और कमाल वाले को ज़रूरत के वक़्त अपने मन्सब और कमाल का ज़ाहिर करना जायज़ है.

(6) यह उसका कितना बड़ा एहसान है.

(7) और बहुत ज़्यादा क़ुव्वत और लंबा क़द प्रदान किया.

(8) और ऐसे नेअमत देने वाले पर ईमान लाओ और फ़रमाँबरदारी और इबादतें बजा लाकर उसके एहसान का शुक्र अदा करों.

(9) यानी अपने इबादत ख़ाने से. हज़रत हूद अलैहिस्सलाम अपनी क़ौम की बस्ती से अलग एक एकान्त जगह में इबादत किया करते थे. जब जब आपके पास वही आती तो क़ौम के पास आकर सुना देते.

(10) बुत.

(11) वह अज़ाब.

(12) हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने.

(13) और तुम्हारी सरकशी से तुमपर अज़ाब आना वाजिब और लाज़िम होगा.

(14) और उन्हें पूजने लगे और मअबूद मानने लगे जबकि उनकी कुछ हक़ीकत ही नहीं है और उलूहियत के मानी से बिल्कुल ख़ाली और अनजान है.

(15) अल्लाह के अज़ाब का.

(16) जो उनके अनुयायी थे और उनपर ईमान लाए थे.

(17) उस अज़ाब से जो हूद क़ौम पर उतरा.

(18) और हज़रत हूद अलैहिस्सलाम को झुटलाते.

(19) और इस तरह हलाक कर दिया कि उनमें से एक भी न बचा. संक्षिप्त घटना यह है कि आद क़ौम अहक़ाफ़ में रहती थी जो अम्मान और हज़रमौत के बीच यमन इलाक़े में एक रेगिस्तान है. उन्होंने ज़मीन को फ़िस्क़ (व्यभिचार) से भर दिया था, और दुनिया की क़ौमों को, अपनी जफ़ा-कारियों से, अपने ज़ोर और शक्ति के घमण्ड में कुचल डाला था. ये लोग बुत परस्त थे. उनके एक बुत का नाम सदा, एक का समूद, एक का हबा था. अल्लाह तआला ने उनमें हज़रत हूद अलैहिस्सलाम को भेजा. आपने उन्हें तौहीद का हुक्म दिया, शिर्क और बुत परस्ती और ज़ुल्म और जफ़ाकारी से मना किया. इस पर वो लोग इन्कारी हुए, आपको झुटलाने लगे और कहने लगे हम से ज़्यादा बलवान कौन है. कुछ आदमी उनमें से हज़रत हूद अलैहिस्सलाम पर ईमान लाए, वो थोड़े थे और अपना ईमान छुपाए रहते थे. उन ईमान लाने वालों में से एक शख़्स का नाम मुर्सिद बिन सअद बिन अदीर था, वह अपना ईमान छुपाए रखते थे. क़ौम ने सरकशी की और अपने नबी हज़रत हूद अलैहिस्सलाम को झुटलाया और ज़मीन में फ़साद किया और सितमगारियों में ज़ियादती की और बड़ी मज़बूत इमारतें बनाई. मालूम होता था कि उनहें गुमान है कि वो दुनिया में हमेशा ही रहेंगे. जब उनकी नौबत यहाँ तक पहुंची तो अल्लाह तआला ने बारिश रोक दी. तीन साल बारिश न हुई. अब वो बहुत मुसीबत में पड़े. उस ज़माने में दस्तूर यह था कि जब कोई बला या मुसीबत उतरती थी, तो लोग बैतुल्लाहिल हराम में हाज़िर होकर अल्लाह तआला से उसके दूर होने की दुआ करते थे. इसीलिये उन लोगों ने एक प्रतिनिधि मण्डल बैतुल्लाह को रवाना किया. इस प्रतिनिधि मण्डल में क़ील बिन अन्ज़ा और नईम बिन हज़ाल और मुर्सिद बिन सअद थे. ये वही साहिब हैं जो हज़रत हूद अलैहिस्सलाम पर ईमान लाए थे और अपना ईमान छुपाए रखते थे. उस ज़माने में मक्कए मुकर्रमा में अमालीक़ की सुकूनत थी और उन लोगों का सरदार मुआविया बिन बक्र था. इस शख़्स का ननिहाल आद क़ौम में था. इसी नाते से यह प्रतिनिधि मण्डल मक्कए मुकर्रमा के हवाली में मुआविया बिन बक्र के यहाँ मुक़ीम हुआ. उसने उन लोगों का बहुत सम्मान किया, अच्छी आओ भगत की. ये लोग वहाँ शराब पीते और बांदियों का नाच देखते थे. इस तरह उन्होंने ऐशो आराम में एक महीना बसर किया. मुआविया को ख़याल आया कि ये लोग तो राहत में पड़ गए और क़ौम की मुसीबत को भूल गए, जो वहाँ बला में फंसी हुई है. मगर मुआविया बिन बक्र को यह ख़याल भी था कि अगर वह इन लोगों से कहे तो शायद वो ये ख़याल करें कि अब इसको मेज़बानी भारी पड़ने लगी है. इसलिये उसने गाने वाली बांदी को ऐसे शेर दिये जिनमें आद क़ौम की हाजत का बयान था. जब बांदी ने वह नज़्म गाई तो उन लोगों को याद आया कि हम उस क़ौम की मुसीबत की फ़रियाद करने के लिये मक्कए मुकर्रमा भेजे गए हैं. अब उन्हें ख़याल हुआ कि हरम शरीफ़ में दाख़िल होकर क़ौम के लिये पानी बरसने की दुआ करें. उस वक़्त मुर्सिद बिन सअद ने कहा कि अल्लाह की क़सम तुम्हारी दुआ से पानी न बरसेगा लेकिन अगर तुम अपने नबी की फ़रमाँबरदारी करो और अल्लाह तआला से तौबह करो तो बारिश होगी. उस वक़्त मुर्सिद ने अपने इस्लाम का इज़हार कर दिया. उन लोगों ने मुर्सिद को छोड़ दिया और ख़ुद मक्कए मुकर्रमा जाकर दुआ की. अल्लाह तआला ने तीन बादल भेजे, एक सफ़ेद, एक सुर्ख़, एक सियाह, और आसमान से पुकार हुई कि ऐ क़ील, अपने और अपनी क़ौम के लिये इनमें से एक बादल इख़्तियार कर. उसने काला बादल चुना, इस ख़याल से कि इससे बहुत सा पानी बरसेगा. चुनांचे वह अब्र आद क़ौम की तरफ़ चला और वो लोग उसको देखकर बहुत ख़ुश हुए. मगर उसमें से एक हवा चली. वह इस शिद्दत की थी कि ऊंटों और आदमियों को उड़ा उड़ा कर कहीं से कहीं ले जाती थी. यह देखकर वो लोग घरों में घुस गए और अपने दरवाज़ें बन्द कर लिये. मगर हवा की तेज़ी से बच न सके. उसने दरवाज़ें भी उखेड़ दिये और उन लोगों को हलाक भी कर दिया. और अल्लाह की क़ुदरत से काली चिड़ियाँ आई, जिन्होंने उनकी लाशों को उठाकर समन्दर में फेंक दिया. हज़रत हूद ईमान वालों को लेकर क़ौम से अलग हो गए थे. इसलिये वो सलामत रहे. क़ौम के हलाक होने के बाद ईमानदारों को साथ लेकर मक्कए मुकर्रमा तशरीफ़ लाए और आख़िर उम्र शरीफ़ तक वहीं अल्लाह तआला की इबादत करते रहे.

 

सूरए अअराफ़ – दसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और समूद की तरफ़ (1)
उनकी बिरादरी से सालेह को भेजा, कहा ऐ मेरी क़ौम अल्लाह को पूजो उसके सिवा तुम्हारा कोई मअबूद नहीं बेशक तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से (2)
रौशन दलील आई  (3)
यह अल्लाह का नाक़ा (ऊंटनी) है (4)
तुम्हारे लिये निशानी तो इसे छोड़ दो कि अल्लाह की ज़मीन में खाए और इसे बुराई से हाथ न लगाओ (5)
कि तुम्हें दर्दनाक अज़ाब आएगा {73} और याद करो (6)
जब तुमको आद का जानशीन किया और मुल्क में जगह दी कि नर्म ज़मीन मे महल बनाते हो (7)
और पहाड़ों में मकान तराशते हो(8)
तो अल्लाह की नेअमतें याद करो(9)
और ज़मीन में फ़साद मचाते न फिरो{74} उसकी क़ौम के घमण्डी कमज़ोर मुसलमानों से बोले क्या तुम जानते हो कि सालेह अपने रब के रसूल हैं बोले वह जो कुछ लेकर भेजे गए हम उसपर ईमान रखते हैं (10){75}
घमण्डी बोले जिसपर तुम ईमान लाए हमें उससे इन्कार है {76} फिर (11)
नाक़े की कूंचें काट दीं और अपने रब के हुक्म से सरकशी की और बोले ऐ सालेह हमपर ले आओ (12)
जिसका तुम वादा कर रहे हो अगर तुम रसूल हो {77} तो उन्हें ज़लज़ले ने आलिया तो सुबह को अपने घरो में औंधे पड़े रह गए {78} तो सालेह ने उनसे मुंह फेरा (13) 
और कहा ऐ मेरी क़ौम बेशक मैं ने तुम्हें अपने रब की रिसालत (संदेश) पहुंचा दी और तुम्हारा भला चाहा मगर तुम भला चाहने चाहने वालों के ग़र्ज़ी (पसन्द करने वाले) ही नहीं {79} और लूत को भेजा(14)
जब उसने अपनी क़ौम से क्या यह वह बेहयाई करते हो जो तुम से पहले जगत में किसी ने न की {80} तो मर्दों  के पास शहवत (वासना) से जाते हो (15)
औरतें छोड़कर बल्कि तुम लोग हद से गुज़र गए (16){81}
और उसकी क़ौम का कुछ जवाब न था मगर यही कहना कि उन (17)
को अपनी बस्ती से निकाल दो ये लोग तो पाकीज़गी (पवित्रता) चाहते हैं (18){82}
तो हमने उसे (19)
और उसके घरवालों को छुटकारा दिया मगर उसकी औरत वह रह जाने वालों में हुई (20){83}

सूरए अअराफ़ – दसवाँ रूकू

(1)  जो हिजाज़ और शाम के बीच सरज़मीने हजर में रहते थे.

(2) मेरी नबुव्वत की सच्चाई पर.

(3) जिसका बयान यह है कि…….

(4) जो न किसी पीठ में रही न किसी पेट में. न किसी नर से पैदा हुई, न मादा से, न गर्भ में रही न उसकी उत्पत्ति दर्जा ब दर्जा पूरी हुई, बल्कि आद के तरीक़े के ख़िलाफ़ वह पहाड़ के एक पत्थर से यकायक पैदा हुई. उसकी यह पैदायश चमत्कार है. वह एक दिन पानी पीती है और तमाम समूद सम्प्रदाय एक दिन. यह भी एक चमत्कार है कि एक ऊंटनी एक क़बीले के बराबर पी जाए. इसके अलावा उसके पीने के रोज़ उसका दूध दोहा जाता था और वह इतना होता था कि सारे क़बीले को काफ़ी हो और पानी की जगह ले ले. यह भी चमत्कार. और तमाम वहशी जानवर और हैवानत उसकी बारी के रोज़ पानी पीने से रूके रहते थे. यह भी चमत्कार. इतने चमत्कार हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम के सच्चे नबी होने की खुली दलीलें हैं.

(5) न मारो, न हंकाओ, अगर ऐसा किया तो यही नतीजा होगा.

(6) ऐ समूद क़ौम.

(7) गर्मी के मौसम में आराम करने के लिये.

(8) सर्दी के मौसम के लिये.

(9) और उसका शुक्र बजा लाओ.

(10) उनके दीन को क़ूबूल करते हैं, उनकी रिसालत को मानते हैं.

(11) समूद क़ौम ने.

(12) वह अज़ाब.

(13) जब कि उन्होंने सरकशी की. नक़ल है कि इन लोगों ने बुध को ऊंटनी की कूँचें काटी थीं तो हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि तुम इसके बाद तीन दिन ज़िन्दा रहोगे. पहले रोज़ तुम्हारे सब के चेहरे पीले हो जाएंगे, दूसरे रोज़ लाल और तीसरे रोज़ काले. चौथे दिन अज़ाब आएगा. चुनांचे ऐसा ही हुआ, और इतवार को दोपहर के क़रीब आसमान से एक भयानक आवाज़ आई जिससे उन लोगों के दिल फट गए और सब हलाक हो गए.

(14) जो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के भतीजे हैं, आप सदूम वालों की तरफ़ भेजे गए और जब आपके चाचा हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने शाम की तरफ़ हिजरत की तो हज़रत इब्राहीम ने सरज़मीने फ़लस्तीन में नुज़ूल फ़रमाया और हज़रत लूत अलैहिस्सलाम उरदुन में उतरे. अल्लाह तआला ने आपको समूद निवासियों की तरफ़ भेजा. आप उन लोगों को सच्चे दीन की तरफ़ बुलाते थे और बुरे काम से रोकते थे, जैसा कि आयत में ज़िक्र आता है.

(15) यानी उनके साथ बुरा काम करते हो.

(16) कि हलाल को छोड़कर हराम में पड़ गए और ऐसे ख़बीस और बुरे काम को अपनाया. इन्सान को जिन्सी जोश या काम वासना नस्ल मेहफूज़ रखने और दुनिया की आबादी के लिये दी गई है और औरतों को इसका साधन बनाया गया है कि उनसे जाने पहचाने तरीक़े से शरीअत की सीमाओं में रहकर औलाद हासिल की जाए. जब आदमियों ने औरतों को छोड़कर उनका काम मर्दों से लेना चाहा तो वह हद से गुज़र गए और उन्होंने इस क़ुव्वत के सही उद्देश्य को ख़त्म कर दिया. मर्द को न गर्भ रहता है न वह बच्चा जनता है, तो उसके साथ हमबिस्तरी करना शैतानी काम के सिवा और क्या है. उलमा का बयान है कि लूत क़ौम की बस्तियाँ बहुत ही हरी भरी और तरो ताज़ा थीं और वहाँ ग़ल्ले और फल कसरत से पैदा होते थे. दुनिया का दूसरा क्षेत्र इसके बराबर न था. इसलिये जगह जगह से लोग यहाँ आते थे और उन्हें परेशान करते थे. ऐसे वक़्त में इब्लीस लईन एक बूढे की सूरत में ज़ाहिर हुआ और उनसे कहने लगा कि अगर तुम मेहमानों की इस बहुतात से छुटकारा चाहते हो तो जब वो लोग आएं तो उनके साथ बुरा काम करो. इस तरह यह बुरा काम उन्होंने शैतानों से सीखा और उनके यहाँ इसका चलन हुआ.

(17) यानी हज़रत लूत और उनके मानने वाले.

(18) और पाकीज़गी ही अच्छी होती है. वही सराहनीय है. लेकिन इस क़ौम का स्तर इतना गिर गया था कि उन्होंने पाकीज़गी जैसी सराहनीय विशेषता को ऐब क़रार दिया.

(19) यानी हज़रत लूत अलैहिस्सलाम को.

(20) वह काफ़िरा थी और उसी क़ौम से महब्बत रखती थी.

(21) अजीब तरह का, जिसमें ऐसे पत्थर बरसे कि गन्धक और आग से बने थे. एक क़ौल यह है कि बस्ती में रहने वाले, जो वहाँ ठहरे हुए थे, वो तो ज़मीन में धंसा दिये गए और जो सफ़र में थे वो इस बारिश से हलाक कर दिये गए.

(22) मुजाहिद ने कहा कि हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम उतरे और उन्होंने अपना बाज़ू लूत क़ौम की बस्तियों के नीचे डाल कर उस टुकड़े को उखाड़ लिया और आसमान के क़रीब पहुंचकर उसको औंधा करके गिरा दिया. इसके बाद पत्थरों की बारिश की गई.

 

सूरए अअराफ़ – ग्यारहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और मदयन की तरफ़ उनकी बिरादरी से शुऐब को भेजा (1)
कहा ऐ मेरी क़ौम अल्लाह की इबादत करो उसके सिवा तुम्हारा कोई मअबूद नहीं, बेशक तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से रौशन दलील आई (2)
तो नाप और तौल पूरी करो और लोगों की चीज़ें घटाकर न दो (3)
और ज़मीन में इन्तिज़ाम के बाद फ़साद न फ़ैलाओ यह तुम्हारा भला है अगर ईमान लाओ {85} और हर रास्ते पर यूं न बैठों की राहगीरों को डराओ और अल्लाह की राह से उन्हें रोको (4)
जो उसपर ईमान लाए और उसमें कजी (टेढ़ापन) चाहो, और याद करो जब तुम थोड़े थे उसने तुम्हें बढ़ा दिया (5)
और देखो (6)
फ़सादियों का कैसा अंजाम हुआ {86} और अगर तुम में एक गिरोह उसपर ईमान लाया जो मैं लेकर भेजा गया और एक गिरोह ने न माना  (7)
तो ठहरे रहो यहाँ तक कि अल्लाह हम में फ़ैसला करे, (8)
और अल्लाह का फ़ैसला सब से बेहतर (9){87}
नवां पारा – क़ालल- मलउ
(सूरए अअराफ़ जारी)
ग्यारहवाँ रूकू (जारी)
उसकी क़ौम के घमण्डी सरदार बोले ऐ शुऐब क़सम है कि हम तुम्हें और तुम्हारे साथ वाले मुसलमानों को अपनी बस्ती से निकाल देंगे या तुम हमारे दीन में आजाओ, कहा (10)
क्या अगरचे हम बेज़ार हों (11){88}
ज़रूर हम अल्लाह पर झूठ बांधेंगे अगर तुम्हारे दीन में आजाएं बाद इसके कि अल्लाह ने हमें इससे बचाया है(12)
और हम मुसलमानों में किसी का काम नहीं कि तुम्हारे दीन में आए मगर यह कि अल्लाह चाहे (13)
जो हमारा रब है, हमारे रब का इल्म हर चीज़ को घेरे है, अल्लाह ही पर भरोसा किया (14)
ऐ हमारे रब हम में और हमारी क़ौम में हक़ (सच्चा) फ़ैसला कर (15)
और तेरा फ़ैसला सबसे बेहतर है{89} और उसकी क़ौम के काफ़िर सरदार बोले कि अगर तुम शुऐब के ताबे(अधीन) हुए तो ज़रूर तुम नुक़सान में रहोगे {90} तो उन्हें ज़लज़ले ने आ लिया तो सुबह अपने घरो में औंधे पड़े रह गए(16){91}
शुऐब को झुटलाने वाले मानो उन घरों में कभी रहे ही न थे शुऐब को झुटलाने वाले ही तबाही में पड़े {92} तो शुऐब ने उनसे मुंह फेरा (17)
और कहा ऐ मेरी क़ौम मैं तुम्हें अपने रब की रिसालत (संदेश) पहुंचा चुका और तुम्हारे भले को नसीहत की (18)
तो कैसे ग़म करू काफ़िरों का {93}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – ग्यारहवाँ रूकू

(1)  हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने.

(2) जिससे मेरी नबुव्वत व रिसालत यक़ीनी तौर पर साबित होती है. इस दलील से चमत्कार मुराद है.

(3) उनके हक़ ईमानदारी के साथ पूरे पूरे अदा करो.

(4) और दीन का अनुकरण करने में लोगों के रास्ते में अड़चन न बनो.

(5) तुम्हारी संख़्या ज़्यादा कर दी तो उसकी नेअमत का शुक्र करो और ईमान लाओ.

(6) सबक़ सीखने के उद्देशय से पिछली उम्मतों के हालात और गुज़रे हुए ज़मानों में सरकशी करने वालों के अंजाम देखो और सोचो.

(7) यानी अगर तुम मेरी रिसालत में विरोध करके दो सम्प्रदाय हो गए, एक सम्प्रदाए ने माना और एक इन्कारी हुआ.

(8) कि तस्दीक़ करने वाले ईमानदारों को इज़्ज़त दे और उनकी मदद फ़रमाए और झुटलाने वालों और इन्कार करने वालों को हलाक करे और उन्हें अज़ाब दे.

(9) क्योंकि वह सच्चा हाकिम है.

(10) शुऐब अलैहिस्सलाम ने.

(11) मतलब यह है कि हम तुम्हारा दीन न क़ुबूल करेंगे और अगर तुमने हमपर ज़बरदस्ती की, जब भी न मानेंगे क्योंकि……..

(12) और तुम्हारे झूटे दीन के दोषों और ग़लत होने का इल्म दिया है.

(13) और उसको हलाक करना मंज़ूर हो और ऐसा ही लिखा हो.

(14) अपने सारे कामों में वही हमें ईमान पर क़ायम रखेगा, वही अक़ीदे और विश्वास को ज़्यादा और मज़बूत करेगा.

(15) ज़ुजाज ने कहा कि इसके ये मानी हो सकते हैं कि ऐ रब हमारे काम को ज़ाहिर फ़रमादे. मुराद इससे यह है कि इन पर ऐसा अज़ाब उतार जिससे इनका झूटा और ग़लती पर होना और हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम और उनके अनुयाइयों का सच्चाई पर होना ज़ाहिर हो.

(16) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने इस क़ौम पर जहन्नम का दरवाज़ा खोला और उनपर दोज़ख़ की शदीद गर्मी भेजी जिससे साँस बन्द हो गए. अब न उन्हें साया काम देता था, न पानी. इस हालत में वो तहख़ाने में दाख़िल हुए ताकि वहाँ कुछ अम्न मिले लेकिन वहाँ बाहर से ज़्यादा गर्मी थी. वहाँ से निकल कर जंगल की तरफ़ भागे. अल्लाह तआला ने एक बादल भेजा जिसमें बहुत ठण्डी और अच्छी लगने वाली हवा थी. उसके साए में आए और एक ने दूसरे को पुकार कर जमा कर लिया. मर्द औरतें बच्चे सब इकट्ठा हो गए, तो वह अल्लाह के हुक्म से आग बनकर भड़क उठा और वो उसमें इस तरह जल गए जैसे भाड़ में कोई चीज़ भुन जाती है. क़तादा का क़ौल है कि अल्लाह तआला ने हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम को ऐका वालों की तरफ़ भी भेजा था और मदयन वालों की तरफ़ भी. ऐका वाले तो बादल से हलाक किए गए और मदयन वाले ज़लज़ले में गिरफ़तार हुए और एक भयानक आवाज़ से हलाक हो गए.

(17) जब उनपर अज़ाब आया.

(18) मगर तुम किसी तरह ईमान न लाए.

 

 

सूरए अअराफ़ – बारहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और न भेजा हमने किसी बस्ती में कोई नबी(1)
मगर यह कि उसके लोगों ने सख़्ती और तक़लीफ़ मे पकड़ा(2)
कि वो किसी तरह ज़ारी करें (3)
(रोएं){94} फिर हमने बुराई की जगह भलाई बदल दी(4)
यहाँ तक कि वो बहुत हो गए (5)
और बोले बेशक हमारे बाप दादा को रंज और राहत पहुंचे थे(6)
तो हमने उन्हें अचानक उनकी ग़फ़लत मे पकड़ लिया (7){95}
और अगर बस्तियों वाले ईमान लाते और डरते (8)
तो ज़रूर हम उनपर आसमान और ज़मीन से बरकतें खोल देते(9)
मगर उन्होंने तो झुटलाया (10)
तो हमने उन्हें उनके किये पर गिरफ़्तार किया(11){96}
क्या बस्तियों वाले (12)
नहीं डरते कि उनपर हमारा अज़ाब रात को आए जब वो सोते हों {97} या बस्तियों वाले नहीं डरते कि उनपर हमारा अज़ाब दिन चढ़े आए जब वो खेल रहे हों (13){98}
क्या अल्लाह की छुपवाँ तदबीर (युक्ति) से बेख़बर हैं (14)
तो अल्लाह की छुपी तदबीर से निडर नहीं होते मगर तबाही वाले (15){99}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – बारहवाँ रूकू

(1) जिसको उसकी क़ौम ने न झुटलाया हो.

(2) दरिद्रता और तंगदस्ती और बीमारी में गिरफ़्तार किया.

(3) घमण्ड छोड़ें, तौबा करें, अल्लाह के आदेशों का पालन करें.

(4) कि सख़्ती और तकलीफ़ के बाद राहत और आसायश पहुंचना और बदनी व माली नेअमतें मिलना इताअत व शुक्रगुज़ारी चाहता है.

(5) उनकी तादाद भी ज़्यादा हुई और माल भी बढ़े.

(6) यानी ज़माने का दस्तूर ही यह है कि कभी तकलीफ़ होती है, कभी राहत. हमारे बाप दादा पर भी ऐसे हालात गुज़र चुके हैं. इससे उनका मक़सद यह था कि पिछला ज़माना जो सख़्तियों में गुज़रा है, वह अल्लाह तआला की तरफ़ से कुछ फिटकार और सज़ा न थी. तो अपना दीन नहीं छोड़ना चाहिये. न उन लोगों ने सख़्ती और तकलीफ़ से कोई नसीहत हासिल की, न राहत और आराम से उनमें कोई शुक्र और फ़रमाँबरदारी की भावना पैदा हुई, वो ग़फ़लत में डूबे रहे.

(7) जब कि उन्हें अज़ाब का ख़याल भी न था. इन घटनाओं से सबक़ हासिल करना चाहिये. और बन्दों को गुनाह व सरकशी छोड़ कर, अपने मालिक की ख़ुशी और रज़ा चाहने वाला होना चाहिये.

(8) और ख़ुदा व रसूल की इताअत इख़्तियार करते और जिस चीज़ को अल्लाह और रसूल ने मना फ़रमाया, उससे रूके रहते.

(9) हर तरफ़ से उन्हें अच्छाई पहुंचती, वक़्त पर नफ़ा देने वाली बारिशे होतीं, ज़मीन से खेती फल कसरत से पैदा होते, रिज़्क़ की फ़राखी होती, अम्न व सलामती रहती, आफ़तों से मेहफ़ूज रहते.

(10) अल्लाह के रसूलों को.

(11) और तरह तरह के अज़ाब में जकड़ा.

(12) काफ़िर, चाहे वो मक्कए मुर्कमा के रहने वाले हों या आस पास के, या कहीं और के.

(13) और अज़ाब आने से ग़ाफ़िल हों.

(14) और उसके ढील देने और दुनिया की नेअमत देने पर घमण्डी होकर, उसके अज़ाब से बे फ़िक़्र हो गए.

(15) और उसके सच्चे बन्दे उसका डर रखते है. रबीअ बिन ख़सीम की बेटी ने उनसे कहा, क्या कारण है, मैं देखती हूँ सब लोग सोते हैं और आप नहीं सोते. फ़रमाया, ऐ आँखों की रौशनी, तेरा बाप रात को सोने से डरता है, यानी यह कि ग़ाफ़िल होकर सोजाना कहीं अज़ाब का कारण न हो.

 

सूरए अअराफ़ – तेरहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और क्या वो जो ज़मीन के मालिको के बाद उसके वारिस हुए उन्हें हिदायत न मिली कि हम चाहें तो उन्हें उनके गुनाहों पर आफ़त पहुंचाए(1)
और हम उनके दिलों पर मोहर करते हैं कि वो कुछ नहीं सुनते(2){100}
ये बस्तियाँ हैं (3)
जिनके अहवाल हम तुम्हें सुनाते हैं (4)
और बेशक उनके पास उनके रसूल रौशन दलीलें (5)
लेकर आए तो वो (6)
इस क़ाबिल न हुए कि वो उसपर ईमान लाते जिसे पहले झुटला चुके थे(7)
अल्लाह यूं ही छाप लगा देता है काफ़िरों के दिलों पर (8){101}
और उनमें अक्सर को हमने क़ौल का सच्चा न पाया (9)
और ज़रूर उनमें अक्सर को बेहुक्म ही पाया {102} फिर उन (10)
के बाद हमने मूसा को अपनी निशानियों (11)
के साथ फ़िरऔन और उसके दरबारियों की तरफ़ भेजा तो उन्होंने उन निशानियों पर ज़ियादती की(12)
तो देखो कैसा अंजाम हुआ फ़साद फैलाने वालों का {103} और मूसा ने कहा ऐ फ़िरऔन मैं सारे जगत के रब का रसूल हूँ {104} मुझे सज़ावार (लाज़िम) है कि अल्लाह पर न कहूँ मगर सच्ची बात (13)
मैं तुम सबके पास तुम्हारे रब की तरफ़ से निशानी लेकर आया हूँ (14)
तो बनी इस्राईल को मेरे साथ छोड़ दे (15){105}
बोला अगर तुम कोई निशानी लेकर आए हो तो लाओ अगर सच्चे हो {106} तो मूसा ने अपना असा (लाठी) डाल दिया वह फ़ौरन एक अज़दहा (अजगर) हो गया (16){107}
और अपना हाथ गिरेबान में डाल कर निकाला तो वह देखने वालों के सामने जगमगाने लगा (17){108}

सूरए अअराफ़ – तेरहवाँ रूकू

(1) जैसा कि हमने उनके पूर्वजों को उनकी नाफ़रमानी के कारण हलाक किया.

(2) और कोई उपदेश व नसीहत नहीं मानते.

(3) हज़रत नूह की क़ौम और आद व समूद और हज़रत लूत की क़ौम और हज़रत शुऐब की क़ौम.

(4) ताकि मालूम हो कि हम अपने रसूलों की और उनपर ईमान लाने वालों की अपने दुश्मनों यानी काफ़िरों के मुक़ाबले में मदद किया करते हैं.

(5) यानी खुले चमत्कार.

(6) मरते दम तक.

(7) अपने कुफ़्र और झुटलाने पर जमे ही रहे.

(8) जिनकी निस्बत उसके इल्म में है कि कुफ़्र पर क़ायम रहेंगे और कभी ईमान न लाएंगे.

(9) उन्होंने अल्लाह के एहद पूरे न किये. उनपर जब भी कोई मुसीबत आती तो एहद करते कि यारब तू अगर हमें छुड़ा दे तो हम ज़रूर ईमान ले आएंगे. फिर जब छूट जाते तो एहद से फिर जाते. (मदारिक)

(10) जिनका बयान हुआ वो नबी.

(11) यानी खुले चमत्कार, जैसे कि चमकती हथैली और ज़िन्दा होती लाठी वग़ैरह.

(12) उन्हें झुटलाया और कुफ़्र किया.

(13) क्योंकि रसूल की यही शान है, वो कभी ग़लत बात नहीं कहते और अल्लाह का संदेश पहुंचाने में उनका झुट संभव नहीं.

(14) जिससे मेरा नबी होना साबित है और वह निशानी चमत्कार है.

(15) और अपनी क़ैद से आज़ाद कर दे ताकि वो मेरे साथ पाक सरज़मीन में चले जाएं जो उनका वतन है.

(16) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने असा डाला तो वह एक बड़ा अजगर बन गया, पीले रंग का. मुंह खोले हुए ज़मीन से एक मील ऊंचा अपनी दुम पर खड़ा हो गया और एक जबड़ा उसने ज़मीन पर रखा और एक शाही महल की दीवार पर. फिर उसने फ़िरऔन की तरफ़ रूख़ किया तो फ़िरऔन अपने तख़्त से कूद कर भागा और डर से उसकी हवा निकल गई और लोगों की तरफ़ रूख़ किया तो ऐसी भाग पड़ी कि हज़ारों आदमी आपस में कुचल कर मर गए. फ़िरऔन घर में जाकर चीख़ने लगा, ऐ मूसा, तुम्हें उसकी क़सम जिसने तुम्हें रसूल बनाया, इसको पकड़ लो, मैं तुमपर ईमान लाता हूँ और तुम्हारे साथ बनी इस्त्राईल को भेजे देता हूँ. हज़रत मूसा ने असा उठा लिया तो पहले की तरह लाठी ही था.

(17) और उसकी रौशनी और चमक सूरज के प्रकाश पर गालिब आ गई.

 

सूरए अअराफ़ – चौदहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

फ़िरऔन की क़ौम के सरदार बोले यह तो एक इल्म वाला जादूगर है(1){109}
तुम्हें तुम्हारे मुल्क(2)
से निकालना चाहता है, तो तुम्हारी क्या सलाह है{110} बोले इन्हें और इनके भाई (3)
को ठहरा और शहरों में लोग जमा करने वाले भेज दे {111} कि हर इल्म वाले जादूगर को तेरे पास ले आएं (4)
{112}
और जादूगर फ़िरऔन के पास आए बोले कुछ हमें इनाम मिलेगा अगर हम ग़ालिब (विजयी) आएं {113} बोला हाँ और उस वक़्त तुम मुक़र्रब (नज़दीकी) हो जाओगे {114} बोले ऐ मूसा या तो (5)
आप डालें या हम डालने वाले हों(6){115}
कहा तुम्ही डालो(7),
जब उन्होंने डाला (8)
लोगों की आँखों पर जादू कर दिया और उन्हें डराया और बड़ा जादू लाए {116} और हमने मूसा को वही फ़रमाई कि अपना असा (लाठी) डाल तो नागाह (अचानक) उनकी बनावटों को निगलने लगा (9){117}
तो हक़ (सत्य) साबित हुआ और उनका काम बातिल (निरस्त) हुआ {118} तो यहाँ वो मग़लूब (पराजित) पड़े और ज़लील होकर पलटे {119} और जादूगर सिजदे में गिरा दिये गए (10){120}
बोले हम ईमान लाए जगत के रब पर {121} जो रब है मूसा और हारून का {122} फ़िरऔन बोला तुम उसपर ईमान लाए पहले इसके कि मैं तुम्हें इजाज़त दूँ यह तो बड़ा जअल (धोखा) है जो तुम सबने (11)
शहर में फैलाया है कि शहर वालों को इससे निकाल दो (12)
तो अब जान जाओगे (13){123}
क़सम है कि मैं तुम्हारे एक तरफ़ के हाथ और दूसरी तरफ़ के पाँव काटूंगा फिर तुम सब को सूली दूंगा(14){124}
बोले हम अपने रब की तरफ़ फिरने वाले हैं (15) {125}
और तुझे हमारा क्या बुरा लगा यही ना कि हम अपने रब की निशानियों पर ईमान लाए जब वो हमारे पास आई, ऐ हमारे रब हमपर सब्र उंडेल दे (16)
और हमें मुसलमान उठा (17){126}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – चौदहवाँ रूकू

(1) जिसने जादू से नज़र बन्दी की और लोगों को लाठी अजगर नज़र आने लगी और गेहूवाँ रंग का हाथ सूरज से ज़्यादा चमकदार मालूम होने लगा.

(2) मिस्त्र.

(3) हज़रत हारून.

(4) जो जादू में माहिर हो और सबसे योग्य. चुनांचे लोग रवाना हुए और आसपास के क्षेत्रों में तलाश करके जादूगरों को ले आए.

(5) पहले अपनी लाठी.

(6) जादूगरों ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का यह अदब किया कि आपको पहल करने को कहा और आपकी इजाज़त के बिना अपने अमल या मंत्र तंत्र में मशग़ूल न हुए. इस अदब का बदला उन्हें यह मिला कि अल्लाह तआला ने उन्हें ईमान और हिदायत से पुरस्कृत किया.

(7) यह फ़रमाना हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का इसलिये था कि आप उनकी कुछ परवाह न करते थे और पक्का भरोसा रखते थे कि उनके चमत्कारों के सामने जादू नाकाम और परास्त होगा.

(8) अपना सामान, जिसमें बड़े बड़े रस्से और शहतीर थे. तो वो अजगर नज़र आने लगे और मैदान उनसे भरा मालूम होने लगा.

(9) जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी लाठी डाली तो वह एक बड़ा अजगर बन गई. इब्ने ज़ैद का कहना है कि यह सम्मेलन इस्कंदरिया में हुआ था और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के अजगर की दुम समन्दर के पार पहुंच गई थी. वह जादूगरों की सहरकारियों को एक एक करके निगल गया और तमाम रस्से लठ्ठे, जो उन्होंने जमा किये थे, जो तीन सौ ऊंटों का बोझा था, सब का अन्त कर दिया. जब मूसा अलैहिस्सलाम ने लाठी को अपने दस्ते मुबारक में लिया तो पहले की तरह लाठी हो गई और उसकी मोटाई और वज़न अपनी हालत पर रहा. यह देखकर जादूगरों ने पहचान लिया कि मूसा की लाठी जादू नहीं और इन्सान की क़ुदरत ऐसा चमत्कार नहीं दिखा सकती. ज़रूर यह आसमानी बात है. यह बात समझकर बोले, “आमन्ना बि रब्बिल आलमीन”यानी हम ईमान लाए जगत के रब पर, कहते हुए सज्दे में गिर गए.

(10) यानी यह चमत्कार देखकर उन पर ऐसा असर हुआ कि वो बेइख़्तियार सज्दे में गिर गए. मालूम होता था कि किसी ने माथे पकड़कर ज़मीन पर लगा दिये.

(11) यानी तुमने और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने, सब ने मिलकर.

(12) और ख़ुद इस पर क़ब्ज़ा कर लो.

(13) कि मैं तुम्हारे साथ किस तरह पेश आता हूँ.

(14) नील के किनारे. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि दुनिया में पहला सूली देने वाला, पहला हाथ पाँव काटने वाला, फ़िरऔन है. फ़िरऔन की इस बात पर जादूगरों ने यह जवाब दिया जो अगली आयत में आया है.

(15) तो हमें मौत का क्या ग़म, क्योंकि मर कर हमें अपने रब की मुलाक़ात और उसकी रहमत नसीब होगी. और जब सबको उसी की तरफ़ पलटना है तो वह ख़ुद हमारे तेरे बीच फ़ैसला फ़रमा देगा.

(16) यानी हमको भरपूर सब्र अता फ़रमा और इतना अधिक दे जैसे किसी पर पानी उंडेल दिया जाता है.

(17) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया, ये लोग दिन के पहले पहर में जादूगर थे और उसी रोज़ आख़िर पहर में शहीद.

 

सूरए अअराफ़ – पन्द्रहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और फ़िरऔन की क़ौम के सरदार बोले क्या तू मूसा और उसकी क़ौम को इसलिये छोड़ता है कि वो ज़मीन में फ़साद फैलाएं (1)
और मूसा तुझे और तेरे ठहराए हुए मअबूदों को छोड़ दे (2)
बोला अब हम उनके बेटों को क़त्ल करेंगे और उनकी बेटियों को ज़िन्दा रखेंगे और हम बेशक उनपर ग़ालिब (विजयी) हैं (3){127}
मूसा ने अपनी क़ौम से फ़रमाया अल्लाह की मदद चाहो (4)
और सब्र करो (5)
बेशक ज़मीन का मालिक अल्लाह है (6)
अपने बन्दों में जिसे चाहे वारिस बनाए (7)
और आख़िर मैदान परहेज़गारों के हाथ है (8){128}
बोले हम सताए गए आपके आने से पहले (9)
और आपके तशरीफ़ लाने के बाद (10)
कहा क़रीब है कि तुम्हारा रब तुम्हारे दुश्मन को हलाक करे और उसकी जगह ज़मीन का मालिक तुम्हें बनाए फिर देखें कैसे काम करते हो (11){129}

सूरए अअराफ़ – पन्द्रहवाँ रूकू

(1) यानी मिस्त्र में तेरा विरोध करे और वहाँ के निवासियों का दीन बदलें, और यह उन्होंने इसलिये कहा था कि जादूगरों के साथ छ: लाख आदमी ईमान ले आए थे. (मदारिक)

(2) कि न तेरी उपासना करें, न तेरे मुक़र्रर किये हुए देवी देवताओं की. सदी का कहना है कि फ़िरऔन ने अपनी क़ौम के लिये बुत बनवा दिये थे और उनकी पूजा का हुक्म देता था, और कहता था कि मैं तुम्हारा भी रब हूँ और इन बुतों का भी. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि फ़िरऔन दहरिया था, यानी दुनिया के पैदा करने वाले का इन्कार करने वाला. उसका ख़याल था कि आलमें सिफ़ली के चलाने वाले सितारे हैं. इसीलिये उसने सितारों की सूरतों पर मूर्तियाँ बनवाई थीं. उनकी ख़ुद भी इबादत करता था और दूसरों को भी उनकी इबादत का हुक्म देता था और अपने आपको ज़मीन का मालिक और स्वामी कहता था, इसीलिये “अना रब्बुकुमुल अअला” कहता था.

(3) फ़िरऔनी क़ौम के सरदारों ने फ़िरऔन से यह जो कहा था कि क्या तू मूसा और उसकी क़ौम को इसलिये छोड़ता है कि वो ज़मीन में फ़साद फैलाएं. इससे उनका मतलब फ़िरऔन को हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और आपकी क़ौम के क़त्ल पर उभारना था. जब उन्होंने ऐसा किया तो मूसा अलैहिस्सलाम ने उनको अज़ाब उतरने का डर दिलाया और फ़िरऔन अपनी क़ौम की ख़्वाहिश पर क़ुदरत नहीं रखता था क्योंकि वह हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के चमत्कार की क़ुव्वत से प्रभावित हो चुका था. इसीलिये उसने अपनी क़ौम से यह कहा कि हम बनी इस्त्राईल के लड़को को क़त्ल करेंगे, लड़कियों को छोड़ देंगे. इससे उसका मतलब यह था कि इस तरह हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की क़ौम की संख्या घटाकर उनकी क़ुव्वत को कम करेंगे और जनता में अपनी बात रखने के लिये यह भी कह दिया कि हम बेशक उन पर ग़ालिब हैं. लेकिन फ़िरऔन के इस क़ौल से कि हम बनी इस्त्राईल के लड़कों को क़त्ल करेंगे, बनी इस्त्राईल में कुछ परेशानी पैदा हो गई. और उन्होंने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से इसकी शिकायत की. इसके जवाब में आपने यह फ़रमाया जो इसके बाद आता है.

(4) वह काफ़ी है.

(5) मुसीबतों और बलाओं पर, और घबराओ नहीं.

(6) और मिस्त्र प्रदेश भी इसमें दाख़िल है.

(7) यह फ़रमाकर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने बनी इस्त्राईल को आशा दिलाई कि फ़िरऔन और उसकी क़ौम हलाक होगी और बनी इस्त्राईल उनकी ज़मीनों और शहरों के मालिक होंगे.

(8) उन्हीं के लिये विजय और कामयाबी है, और उन्हीं के लिये बेहतर और उमदा अंजाम.

(9) कि फिरऔनियों ने तरह तरह की मुसीबतों में जकड़ रखा था और लड़कों को बहुत ज़्यादा क़त्ल किया था.

(10) कि अब वह फिर हमारी औलाद के क़त्ल का इरादा रखता है, तो हमारी मदद कब होगी और ये मुसीबतें कब दूर की जाएंगी.

(11) और किस तरह नेअमत का शुक्र अदा करते हो.

 

सूरए अअराफ़ – सोलहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और बेशक हमने फ़िरऔन वालों को बरसों के क़हत (अकाल) और फलों के घटाने से पकड़ा(1)
कि कहीं वो नसीहत मानें (2){130}
तो जब उन्हें भलाई मिलती (3)
कहते यह हमारे लिये है (4)
और जब बुराई पहुंचती तो मूसा और उसके साथ वालों से बदगुमानी लेते (5)
सुन लो उनके नसीबे की शामत तो अल्लाह के यहाँ है (6)
लेकिन उनमें अक्सर को ख़बर नहीं {131}  और बोले तुम कैसी भी निशानी लेकर हमारे पास आओ कि हमपर उससे जादू करो हम किसी तरह तुमपर ईमान लाने वाले नहीं (7){132}
तो भेजा हमने उनपर तूफ़ान (8)
और टिड्डी और घुन (या कलनी या जुएं)  और मेंडक  और ख़ून अलग अलग निशानियाँ(9)
तो उन्होंने घमण्ड किया (10)
और वो मुजरिम क़ौम थी{133} और जब उनपर अज़ाब पड़ता कहते ऐ मूसा हमारे लिये अपने रब से दुआ करो उस अहद के कारण जो उसका तुम्हारे पास है (11)
बेशक अगर तुम हमपर अज़ाब उठा दोगे तो हम ज़रूर तुम पर ईमान लाएंगे और बनी इस्राईल को तुम्हारे साथ कर देंगे{134} फिर जब हम उन से अज़ाब उठा लेते एक मुद्दत के लिये जिस तक उन्हें पहुंचना है जभी वो फिर जाते{135} तो हमने उनसे बदला लिया तो उन्हें दरिया में डूबो दिया (12)
इस लिये कि हमारी आयतें झुटलाते और उनसे बेख़बर थे (13){136}
और हमने उस क़ौम को (14)
जो दबाली गई थी उस ज़मीन (15)
के पूरब पश्चिम का वारिस किया जिसमें हमने बरकत रखी(16)
और तेरे रब का अच्छा वादा बनी इस्राईल पर पूरा हुआ, बदला उनके सब्र का और हमने बर्बाद कर दिया (17)
जो कुछ फ़िरऔन और उसकी क़ौम बनाती और जो चुनाइयाँ उठाते थे {137} और हमने (18)
बनी इस्राईल को दरिया पार उतारा तो उनका गुज़र एक ऐसी क़ौम पर हुआ कि अपने बुतों के आगे आसन मारे थे (19)
बोले ऐ मूसा हमें एक ख़ुदा बनादे जैसा इनके लिये इतने ख़ुदा हैं, बोला तुम ज़रूर जाहिल लोग हो(20){138}
यह हाल तो बर्बादी का है जिसमें ये (21)
लोग हैं और जो कुछ कर रहे हैं निरा बातिल (मिथ्या) है {139} कहा क्या अल्लाह के सिवा तुम्हारा और कोई ख़ुदा तलाश करूं हालांकि उसने तुम्हें ज़माने भर पर फ़ज़ीलत (बुज़ुर्गी) दी(22) {140}
और याद करो जब हमने तुम्हें फ़िरऔन वालों से छुटकारा दिलाया कि तुम्हें बुरी मार देते तुम्हारे बेटे ज़िब्ह करते और तुम्हारी बेटियाँ बाक़ी रखते, और इसमें रब का बड़ा फ़ज़्ल हुआ (23){141}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – सोलहवाँ रूकू

(1) और दरिद्रता और भुखमरी की मुसीबत में जकड़ा.

(2) और कुफ़्र और बुराइयों से बाज़ आएं. फ़िरऔन ने अपनी चार सौ बरस की उम्र में तीन सौ बीस साल तो इस आराम के साथ गुज़ारे थे कि इस मुद्दत में कभी दर्द या बुख़ार या भूख में नहीं पड़ा था. अब दुष्काल की सख़्ती उनपर इसलिये डाली गई कि वो इस सख़्ती ही से खुदा को याद करें और उसकी तरफ़ पलटें. लेकिन वो अपने कुफ़्र में इतने पक्के हो चुके थे कि इन तकलीफ़ों से भी उनकी सरकशी बढ़ती ही रही.

(3) और सस्ताई व बहुतात व अम्न और आफ़ियत होती.

(4) यानी हम इसके मुस्तहिक़ यानी हक़दार ही हैं, और इसको अल्लाह का फ़ज़्ल न मानते और अल्लाह का शुक्र न अदा करते.

(5) और कहते कि ये बलाएं इनकी वजह से पहुंचीं. अगर ये न होते तो ये मुसीबतें न आतीं.

(6) जो उसने लिख दिया है, वही पहुंचता है. और यह उनके कुफ़्र के कारण है. कुछ मुफ़्फसिरों का कहना है कि मानी ये हैं कि बड़ी शामत तो वह है जो उनके लिये अल्लाह के यहाँ है, यानी दोज़ख़ का अज़ाब.

(7) जब उनकी सरकशी यहाँ तक पहुंची तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उनके हक़ में बददुआ की आपकी दुआ क़ुबूल हुई.

(8) जब जादूगरों के ईमान लाने के बाद भी फ़िरऔनी अपने कुफ़्र और सरकशी पर जमे रहे, तो उन पर अल्लाह की निशानियाँ एक के बाद एक उतरने लगीं. क्योंकि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने दुआ की थी कि या रब, फ़िरऔन ज़मीन में बहुत सरकश हो गया है और उसकी क़ौम ने एहद तोड़ा है, उन्हें ऐसे अज़ाब में जकड़, जो उनके लिये सज़ा हो, और मेरी क़ौम और बाद वालों के लिये सबक़. तो अल्लाह तआला ने तूफ़ान भेजा, बादल आया, अन्धेरा हुआ, कसरत से बारिश होने लगी, फ़िरऔन के घरों में पानी भर गया, यहाँ तक कि वो उसमें खड़े रह गए और पानी उनकी गर्दन की हंसलियों तक आ गया. उनमें जो बैठा डूब गया, न हिल सकते थे, न कुछ काम कर सकते थे. सनीचर से सनीचर तक, सात रोज़ तक इसी मुसीबत में रहे. हालांकि बनी इस्त्राईल के घर उनके घरों से मिले हुए थे, उनके घरों में पानी न आया. जब ये लोग तंग आ गए तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से अर्ज़ किया, हमारे लिये दुआ फ़रमाइये कि यह मुसीबत दूर हो तो हम आप पर ईमान लाएं और बनी इस्त्राईल को आपके साथ भेज दें. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने दुआ फ़रमाई. तूफ़ान की मुसीबत दूर हुई. ज़मीन में वह हरियाली आई जो पहले कभी न देखी थी. खेतियाँ ख़ूब हुई, दरख़्त ख़ूब फले. तो फ़िरऔनी कहने लगे, यह पानी तो नेअमत था और ईमान न लाए. एक महीना तो ठीक से गुज़रा, फिर अल्लाह तआला ने टिड्डी भेजी. वह खेतियाँ और फल, दरख़्तों के पत्ते, मकानों के दरवाज़ें, छतें, तख़्ते, सामान, यहाँ तक कि लोहे की कीलें तक खा गई और फ़िरऔनियों के घरों में भर गई. अब मिस्त्रियों ने परेशान होकर फिर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से दुआ की दरख़्वास्त की और ईमान लाने का वादा किया. उस पर एहद लिया. सात दिन यानी सनीचर तक टिड्डी की मुसीबत में जकड़े रहे, फिर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की दुआ से छुटकारा पाया. खेतियाँ और फल जो बाक़ी रह गए थे, उन्हें देखकर कहने लगे, ये हमें काफ़ी हैं, हम अपना दीन नहीं छोड़ते, चुनांचे ईमान न लाए और एहद पूरा न किया और अपने बुरे कर्मों में लग गए. एक महीना ठीक से गुज़रा. फिर अल्लाह तआला ने जूंएं या घुन का अज़ाब उतारा. कुछ का कहना है कि जूंएं, कुछ कहते हैं घुन, कुछ कहते हैं एक और छोटा कीड़ा. इस कीड़े ने जो खेतियाँ और फल बाक़ी बचे थे वह खा लिये. कपड़ों में घुस जाता था और खाल को काटता था. खाने में भर जाता था. अगर कोई दस बोरी गेहूँ चक्की पर ले जाता तो तीन सेर वापस लाता, बाक़ी सब कीड़े खा जाते. ये कीड़े फ़िरऔनियों के बाल, पलकें, भौंवें चाट गए, जिस्म पर चेचक की तरह भर जाते. सोना दूभर कर दिया था. इस मुसीबत से फ़िरऔनी चीख़ पड़े और उन्होंने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से अर्ज़ किया हम तौबह करते हैं. आप इस बला के दूर होने की दुआ फ़रमाइये. चुनांचे सात रोज़ के बाद यह मुसीबत भी हज़रत की दुआ से दूर हुई, लेकिन फ़िरऔनियों ने फिर एहद तोड़ा और पहले से ज़्यादा बुरे काम करने लगे. एक महीना अम्न में गुज़रने के बाद फिर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने बद दुआ की तो अल्लाह तआला ने मैंडक भेजे और यह हाल हुआ कि आदमी बैठता था तो उसकी बैठक में मैंडक भर जाते थे. बात करने के लिये मुंह खोलता तो मैंडक कूद कर मुंह में पहुंचता. हांडियों में मेंडक, खानों में मेंडक, चूल्हों में मेंडक भर जाते थे, आग बुझ जाती थी. लेटते थे तो मैंडक ऊपर सवार होते थे. इस मुसीबत से फ़िरऔनी रो पड़े और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से अर्ज़ की, अबकी बार हम पक्की तौबह करते हैं. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उनसे एहद लिया और दुआ की तो सात दिन बाद यह मुसीबत भी दूर हुई. एक महीना आराम से गुज़रा, लेकिन फिर उन्होंने एहद तोड़ दिया और अपने कुफ़्र की तरफ़ लौटे. फिर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने बददुआ फ़रमाई तो तमाम कुंओं का पानी, नेहरों और चश्मों का पानी, नील नदी का पानी, यहाँ तक कि उनके लिये हर पानी ख़ून बन गया. उन्होंने फ़िरऔन से इसकी शिकायत की तो कहने लगा कि मूसा ने जादू से तुम्हारी नज़र बन्दी कर दी. उन्होंने कहा, कैसी नज़र बन्दी, हमारे बरतनों में ख़ून के सिवा पानी का नाम निशान ही नहीं. तो फ़िरऔन ने हुक्म दिया कि मिस्त्री बनी इस्त्राईल के साथ एक ही बर्तन से पानी लें. तो जब बनी इस्त्राईल निकालते तो पानी निकलता, मिस्त्री निकालते तो उसी बर्तन से खून निकलता, यहाँ तक कि फ़िरऔनी औरतें प्यास से आजिज़ होकर बनी इस्त्राईल की औरतों के पास आई, उनसे पानी मांगा तो वह पानी उनके बर्तन में आते ही ख़ून हो गया. तो फ़िरऔनी औरतें कहने लगीं कि तू अपने मुंह में पानी लेकर मेरे मुंह में कुल्ली कर दे. जब तक वह पानी इस्त्राईली औरत के मुंह में रहा, पानी था, जब फ़िरऔनी औरत के मुंह में पहुंचा, ख़ून हो गया. फ़िरऔन ख़ुद प्यास से परेशान हुआ तो उसने गीले दरख़्तों की नमी चूसी, वह नमी मुंह में पहुंचते ही ख़ून हो गई. सात रोज़ तक ख़ून के सिवा कोई चीज़ पीने को न मिली तो फिर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से दुआ की दरख़्वास्त की और ईमान लाने का वादा किया. हज़रत मूसा ने दुआ फ़रमाई. यह मुसीबत भी दूर हुई मगर ईमान फिर भी न लाए.

(9) एक के बाद दूसरी और हर अज़ाब एक हफ़्ता क़ायम रहता और दूसरे अज़ाब से एक माह का फ़ासला होता.

(10) और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर ईमान न लाए.

(11) कि वह आपकी दुआ क़ुबूल फ़रमाएगा.

(12) यानी नील नदी में. जब बार बार उन्हें अज़ाबों से निजात दी गई और वो किसी एहद पर क़ायम न रहे और ईमान न लाए और कुफ़्र न छोड़ा, तो वह मीआद पूरी होने के बाद, जो उनके लिये मुक़र्रर फ़रमाई गई थी, उन्हें अल्लाह तआला ने डुबो कर हलाक कर दिया.

(13) बिल्कुल भी ध्यान न देते और तवज्जह न करते थे.

(14) यानी बनी इस्त्राईल को.

(15) यानी मिस्त्र और शाम.

(16) नहरों, दरख़्तों, फलों, खेतियों और पैदावर की बहुतात से.

(17) इन तमाम इमारतों, महलों और बाग़ों को.

(18) फ़िरऔन और उसकी क़ौम को दसवीं मुहर्रम के डुबाने के बाद.

(19) और उनकी इबादत करते थे. इब्ने जरीह ने कहा कि ये बुत गाय की शक्ल के थे. उनको देखकर बनी इस्त्राईल.

(20) कि इतनी निशानियाँ देखकर भी न समझे कि अल्लाह एक है, उसका कोई शरीक नहीं. उसके सिवा कोई पूजनीय नहीं, और किसी की इबादत जायज़ नहीं.

(21) बुत परस्त, मूर्ति पूजक.

(22) यानी ख़ुदा वह नहीं होता जो तलाश करके बना लिया जाए, बल्कि ख़ुदा वह है जिसने तुम्हें बुज़ुर्गी दी क्योंकि वह बुज़ुर्गी देने और एहसान पर सक्षम है, तो वही इबादत के लायक़ है.

(23) यानी जब उसने तुम पर ऐसी अज़ीम नेअमतें फ़रमाई तो तुम्हें कब सजता है कि तुम उसके सिवा और किसी की इबादत करो.

 

सूरए अअराफ़ – सत्तरहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और हमने मूसा से (1)
तीस रात का वादा फ़रमाया और उनमें (2)
दस और बढ़ाकर पूरी कीं तो उसके रब का वादा पूरी चालीस रात का हुआ (3)
और मूसा ने (4)
अपने भाई हारून से कहा मेरी क़ौम पर मेरे नायब (सहायक) रहना और इस्लाह (सुधार) करना और फ़सादियों की राह को दख़ल न देना {142} और जब मूसा हमारे वादे पर हाज़िर हुआ और उससे उसके रब ने कलाम फ़रमाया (5)
अर्ज़ की ऐ रब मेरे मुझे अपना दीदार(दर्शन) दिखा कि मैं तुझे देखूं, फ़रमाया तू मुझे हरगिज़ न देख सकेगा (6)
हाँ इस पहाड़ की तरफ़ देख ये अगर अपनी जगह पर ठहरा रहा तो बहुत जल्द तू मुझे देख लेगा (7)
फिर जब उसके रब ने पहाड़ पर अपना नूर चमकाया उसे टुकड़े टुकड़े कर दिया और मूसा गिरा बेहोश, फिर जब होश हुआ बोला पाकी है तुझे मैं तेरी तरफ़ रूजू लाया (पलटा) और मैं सबसे पहला मुसलमान हूँ (8){143}
फ़रमाया ऐ मूसा मैं ने तुझे लोगों से चुन लिया अपनी रिसालतों (संदेश) और अपने कलाम से तो ले जो मैंने तुझे अता फ़रमाया और शुक्र वालों में हो {144} और हमने उसके लिये तख़्तियों में (9)
लिख दी हर चीज़ की नसीहत और हर चीज़ की तफ़सील, और फ़रमाया ऐ मूसा इसे मज़बूती से ले और अपनी क़ौम को हुक्म दे कि इसकी अच्छी बातें अपनाएं (10)
बहुत जल्द मैं तुम्हें दिखाऊंगा बेहुक्मों का घर (11){145}
और मैं अपनी आयतों से उन्हें फेर दूंगा जो ज़मीन में नाहक़ अपनी बड़ाई चाहते हैं (12)

और अगर सब निशानियाँ देखें उनपर ईमान न लाएं, और अगर हिदायत की राह देखें उसमें चलना पसन्द न करें (13)
और गुमराही का रास्ता नज़र पड़े तो उसमें चलने को मौजूद हो जाएं यह इसलिये कि उन्होंने हमारी आयतें झुठलाईं और उनसे बेख़बर बने {146} और जिन्होंने हमारी आयतें और आख़िरत के दरबार को झुटलाया उनका सब किया धरा अकारत गया उन्हें क्या बदला मिलेगा मगर वही जो वो करते थे {146}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – सत्तरहवाँ रूकू

(1) तौरात अता फ़रमानें के लिये ज़िलक़अदा महीने की.

(2) ज़िलहज की.

(3) हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का बनी इस्त्राईल से वादा था कि जब अल्लाह तआला उनके दुश्मन फ़िरऔन को हलाक फ़रमा देगा तो वह उनके पास अल्लाह तआला की तरफ़ से एक किताब लाएंगे जिसमें हलाल और हराम का बयान होगा. जब अल्लाह तआला ने फ़िरऔन को हलाक किया तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अपने रब से उस किताब के उतारने की दरख़्वास्त की. हुक्म हुआ कि तीस रोज़े रखो. जब वो रोज़े पूरे कर चुके तो आपको अपने मुंह मे एक तरह की बू मेहसूस हुई आपने मिसवाक की. फ़रिश्तों ने अर्ज़ किया कि हमें आपके मुबारक मुंह से बड़ी अच्छी ख़ुश्बू आया करती थी, आपने मिसवाक करके उसको ख़त्म कर दिया. अल्लाह तआला ने हुक्म फ़रमाया कि माहे ज़िलहज में दस रोज़े और रखें और फ़रमाया कि ऐ मूसा, क्या तुम्हें मालूम नहीं कि रोज़ेदार के मुंह की खुश्बू मेरे नज़दीक कस्तूरी की सुगंध से ज़्यादा अच्छी है.

(4) पहाड़ पर प्रार्थना के लिये जाते वक़्त.

(5) आयत से साबित हुआ कि अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से कलाम फ़रमाया. इस पर हमारा ईमान है. और हमारी क्या हक़ीक़त है कि हम इस कलाम की हक़ीक़त से बहस कर सकें. किताबों में आया है कि जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम कलाम सुनने के लिये हाज़िर हुए तो आपने तहारत की और पाकीज़ा लिबास पहना और रोज़ा रखकर तूर पहाड़ पर हाज़िर हुए. अल्लाह तआला ने एक बादल उतारा जिसने पहाड़ को हर तरफ़ से चार फ़रसंग के बराबर ढक लिया. शैतान और ज़मीन के जानवर, यहाँ तक कि साथ रहने वाले फ़रिश्ते तक वहाँ से अलग कर दिये गए और आपके लिये आसमान खोल दिया गया. आपने फ़रिश्तों को साफ़ देखा कि हवा में खड़े हैं. और आपने अल्लाह के अर्श को साफ़ देखा, यहाँ तक कि तख़्तियों पर क़लमों की आवाज़ सुनी और अल्लाह तआला ने आप से कलाम फ़रमाया. आपने उसकी बारगाह में अपनी बातें पेश कीं. उसने अपना कलामें करीम सुनाकर नवाज़ा. हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम आपके साथ थे लेकिन जो अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से फ़रमाया वह उन्हों ने कुछ न सुना. हज़रत मूसा को कलामे रब्बानी की लज़्ज़त ने उसके दीदार का आरज़ूमन्द बनाया. (ख़ाज़िन वग़ैरह)

(6) इन आँखों से सवाल करके, बल्कि अल्लाह का दीदार बिना सवाल के, केवल उसकी अता और मेहरबानी से हासिल होगा, वह भी इन फ़ानी यानी नश्वर आँखों से नहीं, बल्कि बाक़ी आँख से, यानी कोई इन्सान मुझे दुनिया में देखने की ताक़त नहीं रखता. अल्लाह तआला ने यह नहीं फ़रमाया कि मेरा देखना सम्भव नहीं. इससे साबित हुआ कि अल्लाह का दीदार सम्भव है, अगरचे दुनिया में न हो. क्योंकि सही हदीसों में है कि क़यामत के दिन ईमान वाले अपने रब के दीदार से फ़ैज़याब किये जाएंगे. इसके अलावा यह कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम आरिफ़ बिल्लाह यानी अल्लाह को पहचानने वाले हैं. अगर अल्लाह का दीदार सम्भव न होता तो आप हरगिज़ सवाल न फ़रमाते.

(7) और पहाड़ का साबित रहना सम्भावना की बात है, क्योंकि उसकी निस्बत फ़रमाया “जअलहू दक्कन” उसको पाश पाश कर दिया. तो जो चीज़ अल्लाह तआला की की हुई हो, और जिसको वह मौजूद फ़रमाए, मुमकिन है कि वह न मौजूद हो अगर उसको न मौजूद करे, क्योंकि वह अपने काम में मुख़्तार है. इससे साबित हुआ कि पहाड़ का ठहरा रहना सम्भव बात है, असम्भव नहीं और जो चीज़ सम्भव बात पर मुअल्लक़ की जाए, वह भी मुमकिन ही होती है, मुहाल नहीं होती. लिहाज़ा अल्लाह का दीदार, जिसको पहाड़ के साबित रहने पर मुअल्लक़ फ़रमाया गया, वह मुमकिन हुआ तो उनका क़ौल ग़लत है, जो अल्लाह का दीदार असम्भव बताते हैं.

(8) बनी इस्त्राईल में से.

(9) तौरात की, जो सात या दस थीं, ज़बरजद या ज़मर्रूद की.

(10) उसके आदेशों का अनुकरण करें.

(11) जो आख़िरत में उनका ठिकाना है. हसन और अता ने कहा कि बेहुक्मों के घर से जहन्नम मुराद है. क़तादा का क़ौल है कि मानी ये हैं कि मैं तुम्हें शाम में दाख़िल करूंगा और गुज़री हुई उम्मतों की मंज़िलें दिखाऊंगा जिन्हों ने अल्लाह तआला की मुख़ालिफ़त की, ताकि तुम्हें इससे सबक़ मिले. अतिया औफ़ी का क़ौल है कि “बेहुक्मों का घर” से फ़िरऔन और उसकी क़ौम के मकानात मुराद हैं, जो मिस्त्र में हैं. सदी का क़ौल है कि इससे काफ़िरों की मंज़िलें मुराद हैं. कलबी का कहना है कि आद व समूद और हलाक हुई उम्मतों की मंज़िलें मुराद हैं, जिन पर अरब के लोग अपने सफ़रों में होकर गुज़रा करते थे.

(12) जुन्नून रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला क़ुरआन की हिकमत से एहले बातिल के दिलों का सम्मान नहीं फ़रमाता. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया, मुराद यह है कि जो लोग मेरे बन्दों पर ज़ुल्म करते हैं और मेरे वलियों से लड़ते हैं, मैं उन्हें अपनी आयतों के क़ुबूल और तस्दीक़ से फेर दूंगा ताकि वो मुझपर ईमान न लाएं. यह उनकी दुश्मनी की सज़ा है कि उन्हें हिदायत से मेहरूम किया गया.

(13) यही घमण्ड का फल और घमण्डी का अंजाम है.

 

 

सूरए अअराफ़ – अठारहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और मूसा के (1)
बाद उसकी क़ौम अपने ज़ेवरों से (2)
एक बछड़ा बना बैठी बेजान का धड़ (3)
गाय की तरह आवाज़ करता क्या न देखा कि वह उनसे न बात करता है और न उन्हें कुछ राह बताए (4)
उसे लिया और वह ज़ालिम थे (5){148}
और जब पछताए और समझे कि हम बहके बोले अगर हमारा रब हमपर मेहर (मेहरबानी) न करे और हमें न बख़्शे तो हम तबाह हुए {149} और जब मूसा (6)
अपनी क़ौम की तरफ़ पलटा ग़ुस्से में भरा झुंझलाया हुआ (7)
कहा तुम ने क्या बुरी मेरी जानशीनी (उत्तराधिकार) की मेरे बाद (8)
क्या तुमने अपने रब के हुक्म से जल्दी की (9)
और तख़्तियाँ डालदीं (10)
और अपने भाई के सर के बाल पकड़ कर अपनी तरफ़ खींचने लगा (11)
कहा ऐ मेरे माँ जाए (12)
क़ौम ने मुझे कमज़ोर समझा और क़रीब था कि मुझे मार डालें तू मुझ पर दुश्मनों को न हँसा (13)
और मुझे ज़ालिमों में न मिला (14){150}
अर्ज़ की ऐ मेरे रब मुझे और मेरे भाई को बख़्श दे (15)
और हमें अपनी रहमत के अन्दर ले ले तू सब मेहर वालों से बढ़कर मेहर वाला {151}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – अठारहवाँ रूकू

(1) तूर की तरफ़ अपने रब की प्रार्थना के लिये जाने के.

(2) जो उन्होंने फ़िरऔन की क़ौम से अपनी ईद के लिये कुछ समय के लिये उधार लिये थे.

(3) और उसके मुंह में हज़रत जिब्रील की घोड़ी के क़दमों के नीचे की मिट्टी डाली जिसके असर से वह…..

(4) दूषित है, आजिज़ है, जमाद है या हैवान, दोनों तक़दीरों पर सलाहियत नहीं रखता कि पूजा जाए.

(5) कि उन्होंने अल्लाह तआला की इबादत से मुंह फेरा और ऐसे आजिज़ और नाक़िस बछड़े को पूजा.

(6) अपने रब की उपासना पूरी करके तूर पर्वत से…

(7) इसलिये कि अल्लाह तआला ने उनको ख़बर दे दी थी कि सामरी ने उनकी क़ौम को गुमराह कर दिया.

(8) कि लोगों को बछड़ा पूजने से न रोका.

(9) और मेरे तौरात लेकर आने का इन्तिज़ार न किया.

(10) तौरात की, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने.

(11) क्योंकि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को अपनी क़ौम का ऐसी बदतरीन बुराई में पड़ जाना बहुत बुरा लगा, तब हज़रत हारून अलैहिस्सलाम ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से.

(12) मैंने क़ौम को रोकने और उनको उपदेश और नसीहत करने में कोई कमी नहीं की, लेकिन.

(13) और मेरे साथ ऐसा सुलूक न करो जिससे वो ख़ुश हों.

(14) हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अपने भाई की बात क़ुबूल करके अल्लाह की बारगाह में.

(15) अगर हमें मे किसी से कोई कमी या ज़ियादती हो गई. यह दुआ आपने भाई को रोज़ी करने और दुश्मनों की जलन दूर करने के लिये फ़रमाई.

 

सूरए अअराफ़ – उन्नीसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

बेशक वो जो बछड़ा ले बैठे बहुत जल्द उन्हें उनके रब का ग़ज़ब (क्रोध) और ज़िल्लत पहुंचना है दुनिया की ज़िन्दगी में, और हम ऐसा ही बदला देते हैं बोहतान हायों (आरोपियों) को {152} और जिन्होंने बुराइयां कीं और  उनके बाद तौबा की और ईमान लाए तो उसके बाद तुम्हारा रब बख़्शने वाला मेहरबान है (1){153}
और जब मूसा का ग़ुस्सा थमा तख़्तियाँ उठालीं और उनकी तहरीर (लेख) मैं हिदायत और रहमत है उनके लिये जो अपने रब से डरते हैं {154} और मूसा ने अपनी क़ौम से सत्तर मर्द हमारे वादे के लिये चुने (2)
फिर जब उन्हें ज़लज़ले ने लिया (3)
मूसा ने अर्ज़ की ऐ मेरे रब तू चाहता तो पहले ही इन्हें और मुझे हलाक कर देता (4)
कया तू हमें उस काम पर हलाक फ़रमाएगा जो हमारे बेअक़लों ने किया (5)
वह नहीं मगर तेरा आज़माना, तू उससे बहकाए जिसे चाहे और राह दिखाए जिसे चाहे, तू हमारा मौला (मालिक) है तो हमें बख़्श दे और हम पर मेहर (कृपा) कर और तू सबसे बेहतर बख़्शने वाला है {155} और हमारे लिये इस दुनिया में भलाई लिख (6)
और आख़िरत में बेशक हम तेरी तरफ़ रूजू लाएं फ़रमाया (7)
मेरा अज़ाब जिसे चाहूँ दूँ और मेरी रहमत हर चीज़ को घेरे है (8)
तो बहुत जल्द मैं (9)
नेमतों को (10)
उनके लिये लिख दूंगा जो डरते और ज़कात देते हैं और वो हमारी आयतों पर ईमान लाते हैं {156} वो जो ग़ुलामी करेंगे उस रसूल बेपढ़े ग़ैब की ख़बरें देने वाले की (11)
जिसे लिखा हुआ पाएंगे अपने पास तौरात और इंजील में (12)
वो उन्हें भलाई का हुक्म देगा और बुराई से मना फ़रमाएगा और सुथरी चीज़ें उनके लिये हलाल फ़रमाएगा गन्दी चीज़ें उनपर हराम करेगा और उनपर से वो बोझ (13)
और गले के फंदे (14)
जो उनपर (15)
थे उतारेगा तो वो जो उसपर ईमान लाएं और उसकी ताज़ीम (आदर) करें और उसे मदद दें और उस नूर की पैरवी (अनुकरण) करें जो उसके साथ उतरा (16)
वही बामुराद हुए {157}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – उन्नीसवाँ रूकू

(1) इस आयत से साबित हुआ कि गुनाह, चाहे छोटे हों या बड़े. जब बन्दा उनसे तौबह करता है तो अल्लाह तबारक व तआला अपने फ़ज़्ल व रहमत से उन सबको माफ़ कर देता है.

(2) कि वो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के साथ अल्लाह के समक्ष हाज़िर होकर क़ौम की गौपूजा की ख़ता पर माफ़ी माँगें. चुनांचे हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम उन्हें लेकर हाज़िर हुए.

(3) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि भूकम्प में जकड़े जाने का कारण यह था कि क़ौम ने जब बछड़ा क़ायम किया था, ये उनसे अलग न हुए थे. (ख़ाज़िन)

(4) यानी मीक़ात में हाज़िर होने से पहले, ताकि बनी इस्त्राईल उन सबकी हलाकत अपनी आँखों से देख लेते और उन्हें मुझ पर क़त्ल की तोहमत लगाने का मौक़ा न मिलता.

(5) यानी हमें हलाक़ न कर, और अपनी मेहरबानी फ़रमा.

(6) और हमें फ़रमाँबरदारी की तौफ़ीक़ अता फ़रमा.

(7) अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से.

(8) मुझे इख़्तियार है, सब मेरे ममलूक और बन्दे हैं, किसी को ऐतिराज़ की मजाल नहीं.

(9) दुनिया में नेक और बद सब को पहुंचती है.

(10) आख़िरत की.

(11) यहाँ मुफ़स्सिरों की सहमति के अनुसार, रसूल से सैयदे आलम मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मुराद हैं. आपका ज़िक्र रिसालत के गुण से किया गया, क्योंकि आप अल्लाह और उसकी सृष्टि के बीच माध्यम हैं. रिसालत के कर्तव्य अदा करते हैं. अल्लाह तआला के आदेश, शरीअत और वैद्य-अवैद्य बातों के अहकाम बन्दों तक पहुंचाते हैं. इसके बाद आपकी प्रशंसा में नबी फ़रमाया गया. इसका अनुवाद आला हज़रत रहमतुल्लाह अलैहे ने अज्ञात की ख़बरें देने वाले किया है, और यह अत्यन्त दुरूस्त अनुवाद है, क्योंकि “नबा” ख़बर को कहते हैं, जो जानकारी की नज़र से मुफ़ीद हो और झूट से ख़ाली. क़ुरआन शरीफ़ में यह शब्द इस अर्थ में कसरत से इस्तेमाल हुआ है. एक जगह इरशाद हुआ “कुल हुवा नबऊन अज़ीमुन”  (तुम फ़रमाओ वह बड़ी ख़बर है – सूरए स्वॉद, आयत 67) एक जगह फ़रमाया“तिल्का मिन अम्बाइल ग़ैबे नूहीहा इलैक” (ये ग़ैब की ख़बरें हम तुम्हारी तरफ़ वही करते हैं- सूरए हूद, आयत 49) एक जगह फ़रमाया “फ़लम्मा अम्बाअहुम बि अस्माइहिम” (जब उसने यानी आदम ने उन्हें सबके नाम बता दिये – सूरए बक़रह – आयत 33) और कई आयतें हैं जिनमें यह शब्द इस मानी में आया है. फिर यह शब्द या कर्ता के मानी में होगा या कर्म के मानी में. पहली सूरत में इसके मानी ग़ैब की ख़बरें देने वाले और दूसरी सूरत में इसके मानी होंगे ग़ैब की ख़बरें दिये हुए, और दोनों मानी को क़ुरआन शरीफ़ से पुष्टि मिलती है. पहले अर्थ की पुष्टि इस आयत से होती है “नब्बिअ इबादी” (यानी ख़बर दो मेरे बन्दों को  – सूरए हिजर, आयत 49). दूसरी आयत में फ़रमाया “क़ुल अउ नब्बिउकुम” (तुम फ़रमाओ क्या मैं तुम्हें उस से बेहतर चीज़ बता दूं – सूरए आले इमरान, आयत 15). और इसी प्रकार का है हज़रत मसीह अलैहिस्सलाम का इरशाद जो क़ुरआन शरीफ़ में आया “उनब्बिउकुम बिमा ताकुलूना वमा तद्दख़िरून” (और तुम्हें बताता हूं जो तुम खाते हो और जो अपने घरों में जमा कर रखते हो – सूरए आले इमरान, आयत 49). और दूसरी सूरत की ताईद इस आयत से होती है “नब्बानियल अलीमुल ख़बीर” (मुझे इल्म वाले ख़बरदार ने बताया – सूरए तहरीम, आयत 3). और हक़ीक़त में नबी ग़ैब की ख़बरें देने वाले ही होते हैं. तफ़सीरे ख़ाज़िन में है कि आपके गुण में नबी फ़रमाया क्योंकि नबी होना महान और उत्तम दर्जों में से है और यह इसका प्रमाण है कि आप अल्लाह के नज़दीक बहुत बलन्द दर्जा रखने वाले और उसकी तरफ़ से ख़बर देने वाले हैं. उम्मी का अनुवाद आला हज़रत रहमतुल्लाह अलैह ने बे पढ़े फ़रमाया. यह अनुवाद बिल्कुल हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा के इरशाद के मुताबिक है और यक़ीनन उम्मी होना आपके चमत्कारों में से एक चमत्कार है कि दुनिया में किसी से पढ़े नहीं और किताब वह लाए जिसमें पिछलों और आने वालों और अज्ञात की जानकारी है. (ख़ाज़िन)

(12) यानी तौरात व इंजील में आपकी नात और प्रशंसा और आपका नबी होना लिखा पाएंगे. हज़रत अता इब्ने यसार ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र रदियल्लाहो अन्हो से सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के वो गुण दरियाफ़्त किये जो तौरात में बयान किये गए हैं. उन्होंने फ़रमाया कि हुज़ूर के जो औसाफ़ अर्थात गुण और विशेषताएं क़ुरआन शरीफ़ में आए हैं उन्हीं में की कुछ विशेषताएं तौरात में बयान की गई है.

 

इसके बाद उन्होंने पढ़ना शुरू किया ” ऐ नबी हमने तुम्हें भेजा गवाह और ख़ुशख़बरी देने और डराने वाला और उम्मतों का निगहबान बनाकर. तुम मेरे बन्दे और मेरे रसूल हो. मैं ने तुम्हारा नाम मुतवक्कल रखा, न बुरे व्यवहार वाले हो, न सख़्त मिज़ाज, न बाज़ारों में आवाज़ बलन्द करने वाले, न बुराई से बुराई को दूर करो, लेकिन ख़ताकारों को माफ़ करते हो और उनपर एहसान फ़रमाते हो. अल्लाह तआला तुम्हें न उठाएगा जबतक कि तुम्हारी बरकत से ग़ैर मुस्तक़ीम मिल्लत को इस तरह रास्त न फ़रमादे कि लोग सच्चाई और विशवास के साथ

 

“लाइलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” पुकारने लगें और तुम्हारी बदौलत अंधी आँखें देखने वाली और बेहरे कान सुनने वाले और पर्दों में लिपटे हुए दिल कुशादा हो जाएंगे.” हज़रत कअब अहबार से हुज़ूर की विशेषताओं में तौरात शरीफ़ का यह मज़मून भी नक़्ल हुआ कि अल्लाह तआला ने आपकी प्रशंसा में फ़रमाया कि मैं उन्हें हर ख़ूबी के क़ाबिल करूंगा और हर अच्छी सिफ़त और आदत अता फ़रमाऊंगा और दिल के इत्मीनान और प्रतिष्ठा को उनका लिबास बनाऊंगा और ताअतों व एहसान को उनका तरीक़ा करूंगा

 

और तक़वा को उनका ज़मीर और हिकमत को उनका राज़दार और सच्चाई और निष्ठा को उनकी तबीअत और माफ़ करने तथा मेहरबान होने को उनकी आदत और इन्साफ़ को उनकी प्रकृति और हक़ के इज़हार को उनकी शरीअत और हिदायत को उनका इमाम और इस्लाम को उनकी मिल्लत बनाऊंगा. अहमद उनका नाम है. सृष्टि को उनके सदक़े में गुमराही के बाद हिदायत और जिहालत के बाद इल्म व मअरिफ़त और गुमनामी के बाद बलन्दी और इज़्ज़त अता करूंगा और उन्हीं की बरकत से क़िल्लत के बाद महब्बत इनायत करूंगा.

 

उन्हीं की बदौलत विभिन्न क़बीलों, अलग अलग ख़्वाहिशों और विरोध रखने वाले दिलों में उल्फ़त पैदा करूंगा और उनकी उम्मत को सारी उम्मतों से बेहतर करूंगा. एक और हदीस में तौरात शरीफ़ से हुज़ूर की ये विशेषताएं नक़्ल की गई हैं. मेरे बन्दे अहमदे मुख़्तार, उनका जन्मस्थान मक्कए मुकर्रमा और हिजरत स्थल मदीनए तैय्यिबह है, उनकी उम्मत हर हाल में अल्लाह की बहुत प्रशंसा करने वाली है. ये कुछ नक़्ले अहादीस से पेश की गई. आसमानी किताबे हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की प्रशंसा और गुणगान से भरी हुई थीं. किताब वाले हर ज़माने में अपनी किताबों में काट छाँट करते रहे और उनकी बड़ी कोशिश इसी में रही कि हुज़ूर का ज़िक्र अपनी किताबों में नाम को न छोड़ें. तौरात व इंजील वग़ैरह उनके हाथ में थीं इसलिये उन्हें इसमें कुछ मुश्किल न थी, लेकिन हज़ारों परिवर्तन करने के बाद भी मौजूदा ज़माने की बायबल में हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की बशारत का कुछ न कुछ निशान बाक़ी रह ही गया. चुनांचे ब्रिटिश एन्ड फॉरेन बायबल सोसायटी लाहौर 1931 ई. की छपी हुई बायबल में यूहन्ना को इंजील के बाब चौदह की सोलहवीं आयत में है : और मैं बाप से दरख़्वास्त करूंगा तो वह तुम्हें दूसरा मददगार बख़्शेगा कि अबद तक तुम्हारे साथ रहे.” “मददगार” शब्द पर टिप्पणी है उसमें इसके मानी वकील या शफ़ीअ लिखे तो अब हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बाद ऐसा आने वाला जो शफ़ीअ हो, और अबदुल आबाद तक रहे यानी उसका दीन कभी स्थगित न हो, सिवाय सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के कौन है.
फिर उन्तीसवीं और तीसवीं आयत में है : “और अब मैंने तुमसे उसके होने से पहले कह दिया है ताकि जब हो जाए तो तुम यक़ीन करो इसके बाद मैं तुमसे बहुत सी बातें नहीं करूंगा क्योंकि दुनिया का सरदार आता है और मुझ में उसका कुछ नहीं”. कैसी साफ़ बशारत है और हज़रत मसीह अलैहिस्सलाम ने अपनी उम्मत को हुज़ूर की विलादत का कैसा मुन्तज़िर बनाया और शौक़ दिलाया है, और दुनिया का सरदार ख़ास सैयदे आलम का अनुवाद है और यह फ़रमाना कि मुझ में उसका कुछ नहीं, हुज़ूर की महानता का इज़हार और उनके हुज़ूर अपना भरपूर अदब और विनम्रता है. फिर इसी किताब के अध्याय सोलह की सातवीं आयत में है : “लेकिन मैं तुमसे सच कहता हूँ कि मेरा जाना तुम्हारे लिये फ़ायदेमन्द है क्योंकि अगर मैं न जाऊं तो वह मददगार तुम्हारे पास न आएगा लेकिन अगर जाऊं तो उसे तुम्हारे पास भेज दूंगा”. इसमें हुज़ूर की बशारत के साथ इसका भी साफ़ इज़हार है कि हुज़ूर ख़ातीमुल अम्बिया हैं. आपका ज़ुहूर जब ही होगा जब हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम भी तशरीफ़ ले जाएं.
इसकी तेरहवीं आयत में है : लेकिन जब वह यानी सच्चाई की रूह आएगा तो तुमको सारी सच्चाई की राह दिखाएगा, इसलिये कि वह अपनी तरफ़ से न कहेगा. लेकिन जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा और तुम्हें आयन्दा की ख़बरें देगा. “ इस आयत में बताया गया कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के आगमन पर दीने इलाही की तकमील हो जाएगी और आप सच्चाई की राह यानी सच्चे दीन को पूरा कर देंगे. इससे यही नतीजा निकलता है कि उनके बाद कोई नबी न होगा और ये कलिमे कि अपनी तरफ़ से न कहेगा जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, ख़ास “मा यन्तिक़ो अनिल हवा इन हुवा इल्ला वहयुंय यूहा “  (और वह कोई बात अपनी ख़्वाहिश से नहीं करते, वह तो नहीं मगर वही जो उन्हें की जाती है – सूरए नज्म, आयत 3) का अनुवाद है, और यह जुमला कि तुम्हें आयंदा की ख़बर देगा, इसमें साफ़ बयान है कि वह नबीये अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ग़ैबी उलूम तालीम फ़रमाएंगे जैसा कि क़ुरआन शरीफ़ में फ़रमाया : युअल्लिमुकुम मालम तकूनू तअलमून (और तुम्हें वो सिखाया जो तुम नहीं जानते थे) और “मा हुवा अलल ग़ैबे बिदनीन” (और यह नबी ग़ैब बताने में कंजूस नहीं – सूरए तकवीर, आयत 24).

(13) यानी सख़्त तकलीफ़ें जैसे कि तौबह में अपने आप को क़त्ल करना और शरीर के जिन अंगों से गुनाह हुए हों, उनको काट डालना.

(14) यानी मुश्किल आदेश जैसे कि बदन और कपड़े के जिस स्थान को नापाकी लगे उसको कैंची से काट डालना और गुनीमतों का जलाना और गुनाहों का मकानों के दरवाज़ों पर ज़ाहिर होना वग़ैरह.

(15) यानी मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर.

(16) इस नूर से क़ुरआन शरीफ़ मुराद है, जिससे मूमिन का दिल रौशन होता है और शक व जिहालत की अंधेरियाँ दूर होती हैं और शक व यक़ीन का प्रकाश फैलता है.

 

सूरए अअराफ़ – बीसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

तुम फ़रमाओ ऐ लोगो मैं तुम सबकी तरफ़ उस अल्लाह का रसूल हूँ(1)
कि आसमानों और ज़मीन की बादशाही उसी को है, उसके सिवा कोई मअबूद नहीं, जिलाए और मारे, तो ईमान लाओ अल्लाह और उसके रसूल बेपढ़े ग़ैब बताने वाले पर कि अल्लाह और उसकी बातों पर ईमान लाते हैं और उनकी गुलामी करो कि तुम राह पाओ {158} और मूसा की क़ौम से एक गिरोह है कि हक़ की राह बताता और उसी से (2)
इन्साफ़ करता {159} और हमने उन्हें बाँट दिया बारह क़बीले गिरोह गिरोह और हमने वही भेजी मूसा को जब उससे उसकी क़ौम ने (3)
पानी मांगा कि उस पत्थर पर अपना असा (लाठी) मारो तो उसमें से बारह चश्में फूट निकले(4)
हर गिरोह ने अपना घाट पहचान लिया और हमने उन पर  अब्र(बादल) सायबान किया (5)
और उनपर मन्नो सलवा उतारा, खाओ हमारी दी हुई पाक चीज़ें और उन्होंने(6)
हमारा कुछ नुक़सान न किया लेकिन अपनी ही जानों का बुरा करते थे {160}  और याद करो जब उन (7)
से फ़रमाया गया इस शहर में बसो(8)
और इसमें जो चाहो खाओ और कहो गुनाह उतरे और दर्वाज़े में सिजदा करते दाख़िल हो हम तुम्हारे गुनाह बख़्श देंगे, बहुत जल्द नेकों को ज़्यादा अता फ़रमाएंगे {161} तो उनमे के ज़ालिमों ने बात बदल दी उसके ख़िलाफ़ जिसका उन्हें हुक्म था (9)
तो हमने उनपर आसमान से अज़ाब भेजा बदला उनके जुल्म का (10) {162}


तफ़सीर सूरए अअराफ़ -बीसवाँ रूकू

(1) यह आयत सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की आम नबुव्वत की दलील है कि आप सारे जगत के रसूल है और कुल सृष्टि आपकी उम्मत. बुख़ारी व मुस्लिम की हदीस है, हुज़ूर फ़रमाते है, पाँच चीज़ें मुझे ऐसी अता हुई जो मुझसे पहले किसी को न मिली (1) हर नबी ख़ास क़ौम की तरफ़ भेजा जाता था, और मैं लाल और काले की तरफ़ भेजा गया. (2) मेरे लिये ग़नीमतें हलाल की गई और मुझसे पहले किसी के लिये नहीं हुई थीं. (3) मेरे लिये ज़मीन पाक और पाक करने वाली (तयम्मुम के क़ाबिल) और मस्जिद की गई, जिस किसी को कहीं नमाज़ का वक़्त आए वहीं पढ़ ले. (4) दुश्मन पर एक महीने की मुसाफ़त तक मेरा रोब डाल कर मेरी मदद फ़रमाई गई. (5) और मुझे शफ़ाअत अता फ़रमाई गई. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में यह भी है कि मैं तमाम सृष्टि की तरफ़ रसूल बनाकर भेजा गया और मेरे साथ अम्बिया ख़त्म किये गए.

(2) यानी सच्चाई से.

(3) तेह में.

(4) हर गिरोह के लिये एक चश्मा.

(5) ताकि धूप से अम्न में रहें.

(6) नाशुक्री करके.

(7) बनी इस्त्राईल

(8) यानी बैतुल मक़दिस में.

(9) यानी हुक्म तो यह था कि “हित्ततुन” कहते हुए दरवाज़े में दाख़िल हों. हित्तत तौबह और इस्तग़फ़ार का कलिमा है, लेकिन वो बजाय इसके हंसी से “हिन्तत फ़ी शईरा” कहते हुए दाख़िल हुए.

(10) यानी अज़ाब भेजने का कारण उनका ज़ुल्म और अल्लाह के अहकाम का विरोध करना है.

 

सूरए अअराफ़ – इक्कीसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और उनसे हाल पूछो उस बस्ती का कि दरिया किनारे थी (1)
जब वो हफ़्ते के बारे मे हद से बढ़ते (2)
जब हफ़्ते के दिन उनकी मछलियां पानी पर तैरती उनके सामने आती और जो दिन हफ़्ते का न होता, न आतीं, इस तरह हम उन्हें आज़माते थे उनकी बेहुक्मी के कारण{163} और जब उनमें से एक गिरोह ने कहा क्यों नसीहत करते हो उन लोगों को जिन्हें अल्लाह हलाक करने वाला है या उन्हें सख़्त अज़ाब देने वाला, बोले तुम्हारे रब के हुज़ूर माज़िरत (क्षमा याचना) को (3)
और शायद उन्हें डर हो (4){164}
फिर जब भूला बैठे जो नसीहत उन्हें हुई थी हमने बचा लिये वो जो बुराई से मना करते थे और ज़ालिमों को बुरे अज़ाब में पकड़ा बदला उनकी नाफ़रमानी का {165} फिर जब उन्हों ने मुमानिअत (निषेध) के हुक्म से सरकशी (बग़ावत) की हमने उनसे फ़रमाया हो जाओ बन्दर धुतकारे हुए (5){166}
और जब तुम्हारे रब ने हुक्म सुना दिया कि ज़रूर क़यामत के दिन तक उन (6)
पर ऐसे को भेजता रहूंगा जो उन्हें बुरी मार चखाए(7)
बेशक तुम्हारा रब ज़रूर ज़ल्द अज़ाब वाला है (8)
और बेशक वह बख़्शने वाला मेहरबान है(9){167}
और उन्हें हमने ज़मीन में बिखेर दिया गिरोह गिरोह, उनमें कुछ नेक हैं (10)
और कुछ और तरह के(11)
और हमने उन्हें भलाईयों और बुराईयों से आज़माया कि कहीं वो रूजू लाएं (12){168}
फिर उनकी जगह उनके बाद वो (13)
नाख़लफ़ आए कि किताब के वारिस हुए (14)
इस दुनिया का माल लेते हैं (15)
और कहते अब हमारी बख़्शिश होगी (16)
और अगर वैसा ही माल उनके पास और आए तो ले लें (17)
क्या उनपर किताब में अहद न लिया गया कि अल्लाह की तरफ़ निस्बत न करें मगर हक़ और उन्होंने इसे पढ़ा (18)
और बेशक पिछला घर बेहतर है परहेज़गारों को (19)
तो क्या तुम्हें अक़्ल नहीं {169} और वो जो किताब को मज़बूत थामते हैं (20)
और उन्होंने नमाज़ क़ायम रखी, और हम नेको का नेग नहीं गंवाते {170}
और जब हमने पहाड़ उनपर उठाया मानो वह सायबान (छप्पर) है और समझो कि वह उनपर गिर पड़ेगा (21)
लो जो हमने तुम्हें दिया ज़ोर से (22)
और याद करो जो उसमें है कि कहीं परहेज़गार हो {171}

सूरए अअराफ़ – इक्कीसवाँ रूकू

(1)  हज़रत नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को ख़िताब है कि आप अपने क़रीब रहने वाले यहूदियों से इस बस्ती वालों का हाल पूछें. इस सवाल का मकसद यह था कि क़ाफ़िरों पर ज़ाहिर कर दिया जाय कि कुफ़्र और बुराई उनका पुराना तरीका है. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत और हुज़ूर के चमत्कारों का इन्कार करना, यह उनके लिये कोई नई बात नहीं है. उनके पहले भी कुफ़्र पर अड़े रहे हैं. इसके बाद उनके पूर्वजों का हाल बयान फ़रमाया, कि वो अल्लाह के हुक्म के विरोध के कारण बन्दरों और सुअरों की शक्ल में बिगाड़ दिये गए. इस बस्ती में इख़्तिलाफ़ है कि वह कौन सी थी, हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि वह एक गाँव मिस्र और मदीना के बीच है. एक क़ौल है कि मदयन व तूर के बीच. ज़हरी ने कहा कि वह गाँव तबर्रियए शाम है ओर हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा की एक रिवायत में है कि वह मदयन है. कुछ ने कहा ईला है. हक़ीक़त का इल्म अल्लाह तआला को है.

(2) कि पाबन्दी के बावुजूद शनिवार के रोज़ शिकार करते. इस बस्ती के लोग तीन गिरोहों में बंट गए थे. एक तिहाई ऐसे लोग थे जो शिकार से बाज़ रहे और शिकार करने वालों को मना करते थे और एक तिहाई ख़ामोश थे,  दूसरों को मना न करते थे, और मना करने वालों से कहते थे, ऐसी क़ौम को क्यों, नसीहत करते हो जिन्हें अल्लाह हलाक करने वाला है. और एक गिरोह वो ख़ताकार लोग थे जिन्हों ने अल्लाह के हुक्म का विरोध किया और शिकार किया और खाया और बेचा और जब वो इस बुराई से बाज़ न आए तो मना करने वाले गिरोह ने कहा कि हम तुम्हारे साथ रहन सहन न रखेंगे और गांव को तक़सीम करके बीच में एक दीवार खींच दी. मना करने वालों का एक दरवाज़ा अलग था, जिससे आते जाते थे. हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने ख़ताकारों पर लअनत की. एक रोज़ मना करने वालों ने देखा कि ख़ताकारों में से कोई न निकला, तो उन्होंने ख़्याल किया कि शायद आज शराब के नशे में मदहोश हो गए होंगे. उन्हें देखने के लिये दीवार पर चढ़े तो देखा कि वो बन्दरों की शक्ल कर दिये गए थे.  अब ये लोग दरवाज़ा खोल कर दाख़िल हुए तो वो बन्दर अपने रिश्तेदारों को पहचानते थे, और उनके पास आकर कपड़े सूंघते थे और ये लोग इन बन्दर हो जाने वालों को नहीं पहचानते थे. इन लोगों ने उनसे कहा, क्या हम लोगों ने तुम से मना नहीं किया था, उन्होंने सर के इशारे से कहा हाँ. और वो सब हलाक हो गए और मना करने वाले सलामत रहे.

(3) ताकि हमपर बुरी बातों से रोकना छोड़ने का इल्ज़ाम न रहे.

(4) और वो नसीहत से नफ़ा उठा सके.

(5) वो बन्दर हो गए और तीन रोज़ इसी हाल में रहकर हलाक हो गए.

(6)  यहूदी लोग.
(7) चुनांचे उनपर अल्लाह तआला ने बख़्त नस्सर और संजारेब और रोम के बादशाहों को भेजा जिन्होंने उन्हें सख़्त तकलीफ़ें दीं और क़यामत तक के लिये उनपर जिज़िया और ज़िल्लत लाज़िम हुई.

(8) उनके लिये, जो कुफ़्र पर क़ायम रहे. इस आयत से साबित हुआ कि उनपर अज़ाब हमेशा रहेगा, दूनिया में भी और आख़िरत में भी.

(9) उनको, जो अल्लाह की फ़रमाँबरदारी करें और ईमान लाएं.

(10) जो अल्लाह और रसूल पर ईमान लाए और दीन पर जमे रहे.

(11) जिन्हों ने नाफ़रमानी की और जिन्हों ने कुफ़्र किया और दीन को बदला.

(12) भलाइयों से नेअमत व राहत, और बुराइयों से सख़्ती और तकलीफ़ मुराद है.

(13) जिनकी दो क़िस्में बयान फ़रमाई गई.

(14) यानी तौरात के, जो उन्होंने अपने पूर्वजों से पाई और इसके हलाल व हराम से सम्बन्धित आदेशों को जाना. मदारिक में है कि ये लोग हैं जो रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ज़माने में थे उनकी हालत यह है कि…

(15) अहकाम में हेर फेर और कलाम में रद्दोबदल के लिये रिश्वत के तौर पर. और वो जानते भी हैं कि यह हराम है, फिर भी  इस महापाप पर डटे हैं.

(16) और इन गुनाहों पर हम से कुछ हिसाब न लिया जाएगा.

(17) और आयन्दा भी गुनाह करते चले जाएं. सदी ने कहा कि बनी इस्राईल में कोई क़ाज़ी ऐसा न था जो रिश्वत न ले. जब उससे कहा जाता था कि तुम रिश्वत लेते हो तो कहता था कि यह गुनाह बख़्श दिया जाएगा. उसके ज़माने में दूसरे उसको ताना देते बुरा भला कहते, लेकिन जब वह मर जाता या ओहदे से हटा दिया और वही बुरा भला कहने वाले उसकी जगह हाकिम या काज़ी बनते तो वो भी उसी तरह रिश्वत लेते.

(18) लेकिन इसके बावुज़ूद उन्होंने इसके ख़िलाफ़ किया. तौरात में गुनाह पर जमने वालों के लिये माफ़ी का वादा न था. तो उनका गुनाह किये जाना, तौबह न करना और उसपर यह कहना कि हमारी पकड़ न होगी, यह अल्लाह पर झूट बांधना है.

(19) जो अल्लाह के अज़ाब से डरें और रिश्वत व हराम से बचें और उसकी फ़रमाँबरदारी करें.

(20) और उसके अनुसार अमल करते हैं और उसके सारे आदेशों को मानते हैं और उसमें परिवर्तन और तबदीली रवा नहीं रखते. यह आयत एहले किताब में से हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम वग़ैरह ऐसे लोगों के हक़ में नाज़िल हुई जिन्होंने पहली किताब का अनुकरण किया, उसमें फेर बदल न किया. उसकी विषय सामग्री को यानी मज़मून को न छुपाया और उस किताब के अनुकरण की बदौलत उन्हें क़ुरआन शरीफ़ पर ईमान नसीब हुआ. (ख़ाज़िन व मदारिक)

(21) जब बनी इस्राईल ने सख़्त तक़लीफ़ों की वजह से तौरात के अहक़ाम के क़ुबूल करने से इन्कार किया तो हज़रत जिब्रील ने अल्लाह के हुक्म से एक पहाड़ जिसका आकार उनके लश्कर के बराबर यानी एक फ़रसंग लम्बाई और एक फ़रसंग चौड़ाई थी, उठाकर सायबान की तरह उनके सरों के क़रीब कर दिया और उनसे कहा गया कि तौरात के आदेश क़ुबूल करो वरना यह पहाड़ तुम पर गिरा दिया जाएगा, पहाड़ को सरों पर देखकर सब सिज्दे में गिर गए मगर इस तरह कि बायाँ गाल और भौं तो उन्हें सिज्दे में रख दी और दाईं आँख से पहाड़ को देखते रहे कि कहीं गिर न पड़े. चुनांचे अब तक यहूदियों के सज्दे की यही शान है.

(22) इरादे और कोशिश से.

 

सूरए अअराफ़ – बाईसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और ऐ मेहबूब याद करो जब तुम्हारे रब ने आदम की औलाद की पीठ से उनकी नस्ल निकाली और उन्हें ख़ुद उनपर गवाह किया, क्या मैं तुम्हारा रब नहीं (1)
सब बोले क्यों नहीं हम गवाह हुए (2)
कि कहीं क़यामत के दिन कहो कि हमें इसकी ख़बर न थी (3){172}
या कहो कि शिर्क तो पहले हमारे बाप दादा ने किया और हम उनके बाद बचे हुए (4)
तो क्या तू हमें उसपर हलाक फ़रमाएगा जो बातिल वालों ने किया (5){173}
और हम इसी तरह आयतें रंग रंग से बयान करते हैं (6)
और इसलिये कि कहीं वो फिर आएं (7){174}
और ऐ मेहबूब उन्हें उसका अहवाल सुनाओ जिसे हमने अपनी आयतें दीं (8)
तो वह उनसे साफ़ निकल गया(9){175}
और हम चाहते तो आयतों के कारण उसे उठा लेते (10)
मगर वह तो ज़मीन पकड़ गया (11)
और अपनी ख़्वाहिश का ताबे (अधीन) हुआ, तो उसका हाल कुत्ते की तरह है तू उसपर हमला करे तो ज़बान निकाले और छोड़ दे तो ज़बान निकाले (12)
यह हाल है उनका जिन्होंने हमारी आयतें झुटलाईं तो तुम नसीहत सुनाओ कि कहीं वो ध्यान करें {176} क्या बुरी कहावत है उनकी जिन्होंने हमारी आयतें झुटलाई और अपनी ही जान का बुरा करते थे{177} जिसे अल्लाह राह दिखाए तो वही राह पर है और जिसे गुमराह करे तो वही नुक़सान में रहे {178} और बेशक हमने जहन्नम के लिये पैदा किये बहुत जिन्न और आदमी (13)
वो दिल रखते हैं जिन में समझ नहीं (14)
और वो आँखें जिन से देखते नहीं (15)
और वो कान जिन से सुनते नहीं (16)
वो चौपायों की तरह है (17)
बल्कि उनसे बढ़कर गुमराह (18)
वही ग़फ़लत में पड़े हैं {179} और अल्लाह ही के हैं बहुत अच्छे नाम(19)
तो उसे उनसे पुकारो और उन्हें छोड़ दो जो उसके नामों में हक़ से निकलते हैं (20)
वो जल्द अपना किया पाएंगे {180} और हमारे बनाए हुओ में एक गिरोह वह है कि हक़ बताएं और उसपर इन्साफ़ करें (21) {181}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – बाईसवाँ रूकू

(1) हदीस शरीफ़ में है कि अल्लाह तआला ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की पीठ से उनकी सन्तान निकाली और उनसे एहद लिया. आयतों और हदीसों दोनों पर नज़र करने से यह मालूम होता है कि सन्तान का निकालना इस सिलसिले के साथ था जिस तरह कि दुनिया में एक दूसरे से पैदा होंगे और उनके लिये रबूबियत और वहदानियत की दलीलें क़ायम फ़रमा कर और अक्ल देकर उनसे अपनी रबूबियत की शहादत तलब फ़रमाई.

(2) अपने ऊपर, और हमने तेरी रबूबियत और वहदानियत का इक़रार किया. यह गवाह होना इसलिये है…

(3) हमें कोई चेतावनी नहीं दी गई थी.

(4) जैसा उन्हें देखा, उनके अनुकरण और शासन में वैसा ही करते रहे.

(5) यह उज़्र करने का मौक़ा न रहा, जब कि उनसे एहद ले लिया गया और उनके पास रसूल आए और उन्होंने उस एहद को याद दिलाया और तौहीद पर प्रमाण क़ायम हुए.

(6) ताकि बन्दे समझ से काम लेकर और विचार करके सत्य और ईमान क़ुबूल करें.

(7) शिर्क व कुफ़्र से तौहीद व ईमान की तरफ़ और चमत्कार वाले नबी के बताने से अपने एहदे मीसाक़ को याद करें और उसके अनुसार अमल करें.

(8) यानी बलअम बाऊर जिसका वाक़िआ मुफ़स्सिरों ने इस तरह बयान किया है कि जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने जब्बारीन से जंग करने का इरादा किया और साम प्रदेश में तशरीफ़ लाए तो बलअम बाऊर की क़ौम उसके पास आई और उससे कहने लगी कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम बहुत तेज़ मिज़ाज हैं और उनके साथ बड़ा लश्कर है. वो यहाँ आए हैं, हमें हमारे क्षेत्र से निकाल देंगे और क़त्ल करेंगे और हमारी जगह बनी इस्राईल को इस प्रदेश में आबाद करेंगे, तेरे पास इस्मे आज़म है और तेरी दुआ क़ुबूल होती है तो निकल और अल्लाह तआला से दुआ कर कि अल्लाह तआला उन्हें यहाँ से हटा दे. बलअम बाऊर ने कहा, तुम्हारा बुरा हो, हज़रत मूसा नबी हैं और उनके साथ फ़रिश्ते हैं और ईमानदार लोग हैं, मैं कैसे उनपर दुआ करूं. मैं जानता हूँ, जो अल्लाह तआला के नज़दीक उनका दर्जा है, अगर मैं ऐसा करूं तो मेरी दुनिया और आख़िरत बर्बाद हो जाएगी. मगर क़ौम उसपर ज़ोर देती रही और बहुत रोई पीटी. बलअम बाऊर ने कहा कि मैं अपने रब की मर्ज़ी मालूम कर लूं और उसका यही तरीक़ा था कि जब कोई दुआ करता, पहले अल्लाह की मर्ज़ी मालूम कर लेता और ख़्वाब में उसका जवाब मिल जाता. चुनांचे इस बार भी उसको यही जवाब मिला कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और उनके साथियों के ख़िलाफ़ दुआ न करना. उसने क़ौम से कह दिया कि मैंने अपने रब से इजाज़त चाही थी मगर मेरे रब ने उनपर दुआ करने की मुमानिअत फ़रमा दी. तब क़ौम ने उसको तोहफ़े और नज़राने दिये जो उसने क़ुबूल किये. और क़ौम ने अपना सवाल जारी रखा तो फिर दूसरी बार बलअम बाऊर ने रब तबारक व तआला से इजाज़त चाही. उसका कुछ जवाब न मिला. उसने क़ौम से कह दिया कि मुझे इस बार कुछ जवाब ही न मिला. क़ौम के लोग कहने लगे कि अगर अल्लाह को मंजूर न होता तो वह पहले की तरह दोबारा भी मना फ़रमाता और क़ौम का जोर और भी ज़्यादा हुआ. यहाँ तक कि उन्होंने उसको फ़ितने में डाल दिया और आख़िरकार वह बददुआ करने के लिये पहाड़ पर चढ़ा तो जो बददुआ करता था, अल्लाह तआला उसकी ज़बान उसकी क़ौम की तरफ़ फेर देता था और अपनी क़ौम के लिये जो भलाई की दुआ करता था, बजाय क़ौम के बनी इस्राईल का नाम उसकी ज़बान पर आता था. क़ौम ने कहा ऐ बलअम यह क्या कर रहा है, बनी इस्राईल के लिये दुआ कर रहा है और हमारे लिये बददुआ. कहा यह मेरे इख़्तियार की बात नहीं, मेरी ज़बान मेरे क़ाबू में नहीं है. और उसकी ज़बान बाहर निकल पड़ी तो उसने अपनी क़ौम से कहा, मेरी दुनिया और आख़िरत दोनो बर्बाद हो गई. इस आयत में उसका बयान है.

(9) और उनका अनुकरण न किया.

(10) और ऊंचा दर्जा अता फ़रमा कर नेकों की मंजिल में पहुंचाते.

(11) और दुनिया के जादू में आ गया.

(12) यह एक ज़लील जानवर के साथ तशबीह है कि दुनिया का लालच रखने वाला अगर उसको नसीहत करो तो मुफ़ीद नहीं, वह लालच में जकड़ा रहता है, छोड़ दो तो उसी लालच मे गिरफ़्तार. जिस तरह ज़बान निकालना कुत्ते की लाज़मी तबीअत है, ऐसे ही लालच उनके लिये लाज़िम हो गया.

(13) यानी काफ़िर जो अल्लाह की निशानियों को अच्छी तरह जान कर उनसे मुंह फेरते हैं और उनका काफ़िर होना अल्लाह के इल्मे अज़ली में है.

(14) यानी सच्चाई से मुंह फेर के अल्लाह की निशानियों के देखने समझने से मेहरूम हो गए और यही दिल का ख़ास काम था.

(15) सच्चाई और हिदायत की राह और अल्लाह की निशानियाँ और उसके एक होने के प्रमाण.

(16) उपदेश और नसीहत को मानने वाले कानों से सुनने और दिल व हवास रखने के बावूजूद वो दीन की बातों में उनसे नफ़ा नहीं उठाते, लिहाज़ा.

(17) कि अपने दिल और सोचने, देखने, समझने की शक्तियों से अल्लाह तआला की पहचान नहीं करते है. खाने पीने के दुनियावी कामों में सारे हैवानात भी अपने हवास से काम लेते हैं. इन्सान भी इतना ही करता रहा तो उसको जानवरों पर क्या बरतरी और बुज़ुर्गी.

(18) क्योंकि चौपाया भी अपने फ़ायदे की तरफ़ बढ़ता है और नुक़सान से बचता और उससे पीछे हटता है. और काफ़िर जहन्नम की राह चलकर अपना नुक़सान इख़्तियार करता है, तो उससे बदतर हुआ. जब आदमी की रूह शहवात यानी वासनाओ पर ग़ालिब आ जाती है तो वह फ़रिश्तों से बढ़ जाता है, और जब वासनाएं रूह पर ग़ालिब आ जाती है तो ज़मीन के जानवरों से बदतर हो जाता है.

(19) हदीस शरीफ़ में है, अल्लाह तआला के निनानवे नाम जिस किसी ने याद कर लिये, जन्नती हुआ. उलमा की इसपर सहमित है कि अल्लाह के नाम निनानवे की संख्या में घिरे नहीं हैं, हदीस का मतलब सिर्फ़ यह है कि इतने नामों के याद करने से इन्सान जन्नती हो जाता है. अबू जहल ने कहा था कि मुहम्मद का दावा तो यह है कि यह एक परवर्दिगार की इबादत करते हैं फिर वह अल्लाह और रहमान दो को क्यों पुकारते हैं. इस पर यह आयत उतरी और उस कम अक्ल़ जाहिल को बताया गया कि मअबूद तो एक ही है, नाम उसके बहुत है.

(20) उसके नामों में हक़ और इस्तिक़ामत से निकलना कई तरह पर है. एक तो यह है कि उसके नामों को कुछ बिगाड़ कर ग़ैरों पर लागू करना, जैसे कि मुश्रिकों ने इलाह का लात, और अज़ीज़ का उज्ज़ा, और मन्नान का मनात करके अपने बुतों के नाम रखे थे, यह नामों में सच्चाई से मुंह फेरना और नाजायज़ है. दूसरे यह कि अल्लाह तआला के लिये ऐसा नाम मुक़र्रर किया जाए जो क़ुरआन व हदीस में न आया हो, यह भी जायज़ नहीं. जैसे कि सख़ी या रफ़ीक़ कहना. तीसरे हुस्ने अदब की रिआयत करना, तो फ़क़त या-दारों, या-मानिओ कहना जायज़ नहीं. बल्कि दूसरे नामों के साथ मिलाकर कहा जाएगा, या दारों, या नाफ़िओ, या मुअतियो, या ख़ालिक़ुल ख़ल्क़. चौथे यह कि अल्लाह तआला के लिये कोई ऐसा नाम मुक़र्रर किया जाए, जिसके मानी ग़लत हों, यह भी सख़्त नाजायज़ है. पाँचवें, ऐसे नाम रखना जिनका मतलब मालूम नहीं, और यह नहीं जाना जा सकता कि वो अल्लाह तआला की शान के लायक़ हैं या नहीं.

(21) यह गिरोह सच्चाई की राह दिखाने वाले उलमा का है. इस आयत से मसअला साबित हुआ कि हर ज़माने के एहले हक़ की सहमति हुज्जत है. और यह भी साबित हुआ कि कोई ज़माना हक़ परस्तों और दीन की हिदायत देने वालों से ख़ाली न होगा, जैसा कि हदीस शरीफ़ में है कि मेरी उम्मत का एक गिरोह क़यामत तक सच्चे दीन पर क़ायम रहेगा, उसको किसी की दुश्मनी और विरोध नुक़सान न पहुंचा सकेगी.

सूरए अअराफ़ – तेईसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और जिन्होंने हमारी आयतें झुटलाईं जल्द हम उन्हें आहिस्ता आहिस्ता(1)
अज़ाब की तरफ़ ले जाएंगे जहाँ से उन्हें ख़बर न होगी {182} और में उन्हें ढील दूंगा(2)
बेशक मेरी छुपवाँ तदबीर (युक्ति) बहुत पक्की है(3){183}
क्या सोचते नहीं कि उनके साहब को जुनून से कोई इलाक़ा नहीं, वो तो साफ़ डर सुनाने वाले हैं (3){184}
क्या उन्होंने निगाह की आसमानों और ज़मीन की सल्तनत में और जो चीज़ अल्लाह ने बनाई (5)
और यह कि शायद उनका वादा नज़दीक आ गया हो (6)
तो इसके बाद और कौन सी बात पर यक़ीन लाएंगे(7){185}
जिसे अल्लाह गुमराह करे उसे कोई राह दिखाने वाला नहीं और उन्हें छोड़ता है कि अपनी सरकशी में भटका करें{186} तुम से क़यामत को पूछते हैं (8)
कि वह कब को ठहरी है, तुम फ़रमाओ इसका इल्म तो मेरे रब के पास है उसे वही उसके वक़्त पर ज़ाहिर करेगा (9)
भारी पड़ रही है आसमानों और ज़मीन में, तुम पर न आएगी मगर अचानक, तुम से ऐसा पूछते हैं मानो तुमने उसे ख़ूब तहक़ीक़ कर (खोज) रखा है तुम फ़रमाओ इसका इल्म तो अल्लाह ही के पास है लेकिन बहुत लोग जानते नहीं(10){187}
तुम फ़रमाओ मैं अपनी जान के भले बुरे का ख़ुद मुख़्तार नहीं (11)
मगर जो अल्लाह चाहे (12)
और अगर मैं ग़ैब जान लिया करता तो यूं होता कि मैंने बहुत भलाई जमा करली और मुझे कोई बुराई न पहुंची(13)
मैं तो यही डर (14)
और ख़ुशी सुनाने वाला हूँ उन्हें जो ईमान रखते हैं {188}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – तेईसवाँ रूकू

(1)  यानी एक के बाद एक, दर्जा ब दर्जा.

(2) उनकी उम्रें लम्बी करके.

(3) जब नबीये अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने सफ़ा पहाड़ी पर चढ़ कर रात के वक़्त एक एक क़बीले को पुकारा  और फ़रमाया कि मैं तुम्हें अल्लाह के अज़ाब से डराने वाला हूँ और आपने उन्हें अल्लाह का ख़ौफ़ दिलाया और पेश आने वाले वाक़िआत और घटनाऔ का ज़िक्र किया तो उनमें से किसी ने आपकी तरफ़ जुनून की निस्बत की. इसपर यह आयत उतरी और फ़रमाया गया क्या उन्हों ने सोच और समझदारी से काम न लिया और आक़िबत अन्देशी और दूरदर्शता बिल्कुल छोड़ दी और यह देखकर कि नबियों के सरदार मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम बातों और कामों में उनके विपरीत हैं और दुनिया और इसकी लज़्ज़तों से आपने मुंह फेर लिया है और आख़िरत की तरफ़ ध्यान लगा दिया है और अल्लाह तआला की तरफ़ बुलाने और उसका ख़ौफ़ दिलाने में रात दिन मशग़ूल हैं, उन लोगों ने आपकी तरफ़ जुनून की निस्बत करदी, यह उनकी ग़लती है.

(5) इन सब में उसकी वहदानियत और भरपूर हिकमत और क़ुदरत की रौशन दलीलें हैं.

(6) और वो कुफ़्र पर मर जाएं और हमेशा के लिये जहन्नमी हो जाएं, ऐसे हाल में समझ वाले पर ज़रूरी है कि वह सोचे समझे, दलीलों पर नज़र करे.

(7) यानी क़ुरआन शरीफ़ के बाद और कोई रसूल आने वाला नहीं जिसका इन्तिज़ार हो, क्योंकि आप पर नबियों का सिलसिला ख़त्म हो गया.

(8) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि यहूदियों ने नबिये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा था कि अगर आप नबी हैं तो हमें बताईये कि क़यामत कब क़ायम होगी, क्योंकि हमें उसका वक़्त मालूम है. इसपर यह आयत उतरी.

(9) क़यामत के वक़्त का बताना रिसालत के लवाज़िम से नहीं है जैसा कि तुमने क़रार दिया और ऐ यहूदियों तुम ने जो उसका वक़्त जानने का दावा किया, ये भी ग़लत है. अल्लाह तआला ने इसको छुपा कर रखा है, और इसमें उसकी हिकमत है.

(10) इसके छुपा कर रखे जाने की हिकमत तफ़सीरे रूहुल बयान में है कि कुछ बुज़ुर्ग इस तरफ़ गए हैं कि नबिये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को अल्लाह तआला के बताए से क़यामत का वक़्त मालूम है और ये इस आयत के विषय के विरूध्द नहीं.

(11) ग़ज़वए बनी मुस्तलक़ से वापसी के वक़्त राह में तेज़ हवा चली. चौपाए भागे तो नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ख़बर दी कि मदीनए तैय्यिबह में रिफ़ाआ का इन्तिक़ाल हो गया और यह भी फ़रमाया कि देखो मेरी ऊंटनी कहाँ है. अब्दुल्लाह बिन उबई मुनाफ़िक़ अपनी क़ौम से कहने लगा इनका कैसा अजब हाल है कि मदीने में मरने वाले की ख़बर तो दे रहे हैं और अपनी ऊंटनी का पता नहीं मालूम कि कहाँ है. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर उसका यह क़ौल भी छुपा न रहा. हुज़ूर ने फ़रमाया मुनाफ़िक़ लोग ऐसा ऐसा कहते हैं और मेरी ऊंटनी उस घाटी में है और उसकी नकेल एक दरख़्त में उलझ गई है. चुनांचे जैसा फ़रमाया था उसी शान से ऊंटनी पाई गई. इस पर यह आयत उतरी. ऐसा (तफ़सीरे कबीर)

(12) वह हक़ीक़ी मालिक है, जो कुछ है उसकी अता से है.

(13) यह कलाम अदब और विनम्रता के तौर पर है. मानी ये हैं कि मैं अपनी ज़ात से ग़ैब नहीं जानता. जो जानता हूँ वह अल्लाह तआला के बताए से और उसकी अता से. (ख़ाज़िन). आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया, भलाई जमा करना और बुराई न पहुंचना उसी के इख़्तियार में हो सकता है जो ज़ाती क़ुदरत रखे और ज़ाती क़ुदरत वही रखेगा जिसका इल्म भी ज़ाती हो, क्योंकि जिसकी एक सिफ़त ज़ाती है, उसकी सारी सिफ़ात ज़ाती. तो मानी ये हुए कि अगर मुझे ग़ैब का इल्म ज़ाती होता तो क़ुदरत भी ज़ाती होती और मैं भलाई जमा कर लेता और बुराई न पहुंचने देता. भलाई से मुराद राहतें और कामयाबियाँ और दुश्मनों पर ग़ल्बा है. यह भी हो सकता है कि भलाई से मुराद सरकशों का मुतीअ, और नाफ़रमानों का फ़रमाँबरदार, और काफ़िरों का मूमिन कर लेना हो और बुराई से बदबख़्त लोगों का बावुजूद दावत के मेहरूम रह जाना. तो हासिले कलाम यह होगा कि अगर मैं नफ़ा नुक़सान का ज़ाती इख़्तियार रखता तो ऐ मुनाफ़िकों  और काफ़िरों, तुम सबको मूमिन कर डालता और तुम्हारी कुफ़्र की हालत देखने की तकलीफ़ मुझे न पहुंचती.

(14) सुनाने वाला हूँ काफ़िरों को.

सूरए अअराफ़ – चौबीसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
वही है जिसने तुम्हें एक जान से पैदा किया(1)
और उसी में से उसका जोड़ा बनाया(2)
कि उससे चैन पाए, फिर जब मर्द उसपर छाया उसे एक हलका सा पेट रह गया (3)
तो उसे लिये फिरा कि, फिर जब बोझल पड़ी, दोनो ने अपने रब से दुआ की – ज़रूर अगर तू हमें जैसा चाहे बच्चा देगा तो बेशक हम शुक्रगुजार होंगे {189} फिर जब उसने उन्हें जैसा चाहिये बच्चा अता फ़रमाया, उन्होंने उसकी अता में उसके साझी ठहराए, तो अल्लाह बरतरी है उनके शिर्क से (4){190}
क्या उसे शरीक करते हैं जो कुछ न बनाए(5)
और वो ख़ुद बनाए हुए हैं {191} और न उनको कोई मदद पहुंचा सकें और न अपनी जानों की मदद करें (6){192}और अगर तुम उन्हें (7)
राह की तरफ़ बुलाओ तो तुम्हारे पीछे न आए (8)
तुमपर एक सा है चाहे उन्हें पुकारो या चुप रहो (9){193}
बेशक वो जिनको तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो तुम्हारी तरह बन्दे हैं (10)
तो उन्हें पुकारो फिर वो तुम्हें जवाब दें अगर तुम सच्चे हो {194} क्या उनके पाँव हैं जिनसे चलें या उनके हाथ हैं जिनसे गिरफ़तार (पकड़) करें या उनकी आँखें हैं जिनसे देखें या उनके कान हैं जिनसे सुनें (11)
तुम फ़रमाओ कि अपने शरीकों को पुकारो और मुझपर दाव चलो और मुझे मोहलत न दो (12){195}
बेशक मेरा वाली अल्लाह है जिसने किताब उतारी (13)
और वह नेको को दोस्त रखता है (14){196}
और जिन्हें उसके सिवा पूजते हो वो तुम्हारी मदद नहीं कर सकते और न ख़ुद अपनी मदद करें (15){197}
और अगर तुम उन्हें राह की तरफ़ बुलाओ तो न सुनें और तू उन्हें देखे कि वो तेरी तरफ़ देख रहे हैं (16)
और उन्हें कुछ भी नहीं सूझता{198} ऐ मेहबूब माफ़ करना इख़्तियार करो और भलाई का हुक्म दो और जाहिलों से मुंह फेर लो {199} और ऐ सुनने वाले अगर शैतान तुझे कोई कौंचा (17)
दे तो अल्लाह की पनाह मांग बेशक वही सुनता जानता है {200} बेशक वो जो डर वाले हैं जब उन्हें किसी शैतानी ख़याल की ठेस लगती है होशियार हो जाते हैं उसी वक़्त उनकी आँखें खुल जाती हैं (18){201}
और वो जो शैतानों के भाई हैं (19)
शैतान उन्हें गुमराही में खींचते हैं फिर कमी नहीं करते {202} और ऐ मेहबूब जब तुम उनके पास कोई आयत न लाओ तो कहते हैं तुमने दिल से क्यों न बनाई तुम फ़रमाओ मैं तो उसी की पैरवी करता हूँ जो मेरी तरफ़ मेरे रब से वही (देववाणी) होती है, यह तुम्हारे रब की तरफ़ से आँखें खोलना है और हिदायत और रहमत मुसलमानों के लिये {203} और जब क़ुरआन पढ़ा जाए तो उसे कान लगाकर सुनो और ख़ामोश रहो कि तुम पर रहम हो (20){204}
और अपने रब को अपने दिल मे याद करो (21)
ज़ारी (विलाप) और डर से और बे आवाज़ निकले ज़बान से सुबह और शाम (22)
और ग़ाफ़िलों मे न होना {205} बेशक वो जो तेरे रब के पास हैं (23)
उसकी इबादत से घमण्ड नहीं करते और उसकी पाकी बोलते और उसी को सज्दा करते हैं (24){206}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ चौबीसवाँ रूकू

(1) अकरमा का क़ौल है कि इस आयत में आम ख़िताब है हर एक शख़्स को, और मानी ये हैं कि अल्लाह वही है जिसने तुममें से हर एक को एक जान से यानी उसके बाप से पैदा किया और उसकी जिन्स से उसकी बीवी को बनाया, फिर जब वो दोनो जमा हुए और गर्भ ज़ाहिर हुआ और इन दोनों ने तन्दुरूस्त बच्चे की दुआ की और ऐसा बच्चा मिलने पर शुक्र अदा करने का एहद किया फिर अल्लाह तआला ने उन्हें वैसा ही बच्चा इनायत फ़रमाया, उनकी हालत यह हुई कि कभी तो वो उस बच्चे की निस्बत प्राकृतिक तत्वों की तरफ़ करते जैसा कि दहरियों का हाल है. कभी सितारों की तरफ़, जैसे सितारों की पूजा करने वालों का हाल है, कभी बुतों की तरफ़, जैसा कि बुत परस्तों का तरीक़ा है. अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि वह उनके शिर्क से बरतर है. (तफ़सीरे कबीर)

(2) यानी उसके बाप की जिन्स से उसकी बीवी बनाई.

(3) मर्द का छाना इशारा है हमबिस्तर होने से और हलका सा पेट रहना, गर्भ के शुरू की हालत का बयान है.

(4) कुछ मुफ़स्सिरों का क़ौल है कि इस आयत में क़ुरैश को ख़िताब है जो क़ुसई की औलाद हैं उनसे फ़रमाया गया कि तुम्हें एक शख़्स क़ुसई से पैदा किया और उसकी बीबी उसी की जिन्स से अरबी क़र्शी की, ताकि उससे चैन व आराम पाए, फिर जब उनकी दरख़्वास्त के मुताबिक उन्हें तन्दुरूस्त बच्चा इनायत किया तो उन्होंने अल्लाह की इस अता में दूसरों को शरीक बनाया और अपने चारों बेटों का नाम अबदे मनाफ़, अब्दुल उज़्ज़ा, अब्दे क़ुसई और अब्दुद दार रखा.

(5) यानी बुतों को, जिन्हों ने कुछ नहीं बनाया.

(6) इसमें बुतों की बेक़ुदरती, शिर्क के ग़लत होने का बयान और मुश्रिकों की भरपूर जिहालत का इज़हार है, और बताया गया है कि इबादत का मुस्तहक़ वही हो सकता है जो इबादत करने वाले को नफ़ा पहुंचाए और उसका नुक़सान दूर करने की क़ुदरत रखता हो, मुश्रिक जिन बुतों को पूजते हैं उनकी बेक़ुदरती इस दर्जें की है कि वो किसी चीज़ के बनाने वाले नहीं, किसी चीज़ के बनाने वाले तो क्या होते, ख़ुद अपनी ज़ात में दूसरे से बेनियाज़ नहीं, आप मख़लूक़ है, बनाने वाले के मोहताज हैं. इससे बढ़कर बेइख़्तियारी यह है कि वो किसी की मदद नहीं कर सकते और किसी की क्या मदद करें, खुद उन्हें नुक़सान पहुंचे तो दूर नहीं कर सकते. कोई उन्हों तोड़ दे, गिरा दे, जो चाहे करे, वो उससे अपनी हिफ़ाज़त नहीं कर सकते, ऐसे मजबूर, बेइख़्तियार को पूजना इन्तिहा दर्जे की जिहालत है.

(7) यानी बुतों को .

(8) क्योंकि वो न सुन सकते हैं, न समझ सकते हैं.

(9) वो हर हाल में मजबूर व बेबस हैं. ऐसे को पूजना और मअबूद बनाना बड़ी कम अक़्ली है.

(10) और अल्लाह के बन्दे और मख़लुक़ किसी तरह पूजने के क़ाबिल नहीं, इसपर भी अगर तुम उन्हें मअबूद कहते हो.

(11) यह कुछ भी नहीं, तो फिर अपने से कमतर को पूजकर क्यों ज़लील होते हो.

(12) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने जब बुत परस्ती की आलोचना और त्रस्कार किया और बुतों की बेइख़्तियारी का बयान फ़रमाया, तो मुश्रिकों ने धमकाया और कहा कि बुतों को बुरा कहने वाले तबाह हो जाते हैं, बर्बाद हो जाते हैं, ये बूत उन्हें हलाक कर देते हैं. इसपर यह आयत उतरी कि अगर बुतों में कुछ क़ुदरत समझते हो तो उन्हें पुकारो और मुझे नुक़सान पहुंचाने में उनसे मदद लो. और तुम भी जो धोखा धड़ी कर सकते हो, वह मेरे मुक़ाबले में करो और उसमें देर न करो मुझे तुम्हारी और तुम्हारे मअबूदों की कुछ भी परवाह नहीं. और तुम मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते.

(13) और मेरी तरफ़ वही भेजी, और मेरी इज़्ज़त की.

(14) और उनकी रक्षा और सहायता करने वाला है. उसपर भरोसा रखने वालों को मुश्रिकों वग़ैरह का क्या डर. तुम और तुम्हारे मअबूद मुझे कुछ नुक़सान नहीं पहुंचा सकते.

(15) तो मेरा क्या बिगाड़ सकेंगे.

(16) क्योंकि बुतों की तस्वीरें इस शक्ल की बनाई जाती थीं जैसे कोई देख रहा है.

(17) कोई वसवसा डाले.

(18) और वो इस वसवसे को दूर कर देते हैं और अल्लाह तआला की तरफ़ रूजू करते हैं.

(19) यानी काफ़िर लोग.

(20) इस आयत से साबित हुआ कि जिस वक़्त क़ुरआन शरीफ़ पढ़ा जाए, चाहे नमाज़ में या नमाज़ से बाहर, उस वक़्त सुनना और ख़ामोश रहना वाजिब है. सारे सहाबए किराम इस तरफ़ हैं कि यह आयत मुक़तदी के सुनने और  ख़ामोश रहने के बारे में है. और एक क़ौल यह भी है कि इस से नमाज़ व ख़ुत्बा दोनों में ग़ौर से सुनना और ख़ामोश रहना वाजिब साबित होता है. हज़रत इब्ने मसऊद रदियल्लाहो अन्हो की हदीस में है, आपने कुछ लोगों को सुना कि वो नमाज़ में इमाम के साथ क़िरअत करते हैं तो नमाज़ से फ़ारिग़ होकर फ़रमाया, क्या अभी वक़्त नहीं आया कि तुम इस आयत के मानी समझो. ग़रज़ इस आयत से इमाम के पीछे क़िरअत करने की मुमानियत साबित होती है. और कोई हदीस ऐसी नहीं है जिसको इसके मु्क़ाबले में तर्क क़रार दिया जा सके. इमाम के पीछे क़िरअत की ताईद में सबसे ज़्यादा भरोसा जिस हदीस पर किया जाता है वह है “ला सलाता इल्ला बि फ़ातिहतल किताब” मगर इस हदीस से इमाम के पीछे क़िरअत वाजिब होना तो साबित नहीं होता सिर्फ़ इतना साबित होता है कि बिना फ़ातिहा नमाज़ कामिल नहीं होती. तो जबकि हदीस “क़िरअतुल इमाम लहू क़िरअतुन” से साबित है कि इमाम का क़िरअत करना ही मुक़्तदी का क़िरअत करना है तो जब इमाम ने क़िरअत की और मुक़्तदी ख़ामोश रहा तो उसकी क़िरअत हुक्मिया हुई, उसकी नमाज़ बे क़िरअत कहाँ रही. यह क़िरअते  हुक्मिया है तो इमाम के पीछे क़िरअत न करने से क़ुरआन व हदीस दोनों पर अमल हो जाता है. और क़िरअत करने से आयत के अनुकरण से दूरी होती है लिहाज़ा ज़रूरी है कि इमाम के पीछे फ़ातिहा वग़ैरह कुछ न पढ़े.

(21) ऊपर की आयत के बाद इस आयत के देखने से मालूम होता है कि क़ुरआन शरीफ़ सुनने वाले को ख़ामोश रहना और आवाज़ निकाले बिना दिल में ज़िक्र करना लाज़िम है. (तफ़सीरे इब्ने जरीर). इससे इमाम के पीछे ऊंची या नीची आवाज़ से क़िरअत की मुमानिअत साबित होती है. और दिल में अल्लाह की अज़मत और जलाल का तसव्वुर ज़िक्रे क़ल्बी है. ज़िक्र-बिल-जहर और ज़िक्र -बिल-इख़्फ़ा दोनों के खुले प्रमाण हैं. जिस शख़्स को जिस क़िस्म के ज़िक्र में ज़ौक़-शौक़ और भरपूर एकाग्रता मिले, उसके लिये वही अफ़ज़ल है.   (रहुल मोहतार वग़ैरह)

(22) शाम, अस्र और मग़रिब के बीच का वक़्त है. इन दोनो वक़्तों में ज़िक्र अफ़ज़ल है, क्योंकि फ़ज्र की नमाज़ के बाद सूरज निकलने तक, इसी तरह अस्र नमाज़ के बाद सूरज डूबने तक, नमाज़ मना है. इसलिये इन वक़्तों में ज़िक्र मुस्तहब हुआ, ताकि बन्दे के तमाम औक़ात क़ुर्बत और ताअत में मश्ग़ूल रहें.

(23) यानी मलायकए मुक़र्रबीन. बुज़ुर्गी वाले फ़रिश्ते.

(24) यह आयत सज्दे वाली आयतों में से है जिनके पढ़ने और सुनने से सज्दा लाज़िम आता है. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है, जब आदमी सज्दे की आयत पढ़कर सज्दा करत है तो शैतान रोता है और कहता है, अफ़सोस, बनी आदम को सज्दे का हुक्म दिया गया. इस सज्दा करके जन्नती हो गया और मुझे सज्दे का हुक्म दिया गया तो मैं इन्कार करके जहन्नमीहो गया.

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