Ramzan 2021 date in India: Ramzan 2021 start date. Ramzan

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Ramzan 2021 date in India

भारत में Ramzan 2021 शाम को शुरू होगा सोमवार, 12 अप्रैल और शाम को समाप्त होता है बुधवार, 12 मई
तिथियां अलग-अलग हो सकती हैं Ramzan 2021 date in India

When did Ramzan start in India?

रमजान 2021: तारीख के अनुसार calendardate.com, इस साल रमजान सोमवार, 12 अप्रैल की शाम से शुरू होने की उम्मीद है और 11 मई को मंगलवार को समाप्त होगा। रमजान के पवित्र महीने के करीब आने के बाद, ई-अल-फित्र लेता है स्थान। इस साल, त्योहार 13 मई 2021 गुरुवार को पड़ने की उम्मीद है।

रमज़ान या रमदान (उर्दू – अरबी – फ़ारसी : رمضان) इस्लामी कैलेण्डर का नवां महीना है। मुस्लिम समुदाय इस महीने को परम पवित्र मानता है।

इस मास की विशेषताएं
महीने भर के रोज़े रखना
रात में तरावीह की नमाज़ पढना
क़ुरान तिलावत करना
एतेकाफ़ बैठना, यानी गांव और लोगों की अभ्युन्नती व कल्याण के लिये अल्लाह से दुआ (प्रार्थना) करते हुवे मौन व्रत रखना
ज़कात देना
दान धर्म करना
अल्लाह का शुक्र अदा करना। अल्लाह का शुक्र अदा करते हुवे इस महीने के गुज़रने के बाद शव्वाल की पहली तारीख को ईद उल-फ़ित्र मनाते हैं।
इत्यादी को प्रमुख माना जाता है। कुल मिलाकार पुण्य कार्य करने को प्राधान्यता दी जाती है। इसी लिये इस मास को नेकियों और इबादतों का महीना यानी पुण्य और उपासना का मास माना जाता है।

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रमज़ान और कुरान का अवतरण


मुसलमानों के विश्वास के अनुसार इस महीने की २७वीं रात शब-ए-क़द्र को क़ुरान का नुज़ूल (अवतरण) हुआ। इसी लिये, इस महीने में क़ुरान ज़्यादा पढना पुण्यकार्य माना जाता है। तरावीह की नमाज़ में महीना भर कुरान का पठन किया जाता है। जिस से क़ुरान पढना न आने वालों को क़ुरान सुनने का अवसर ज़रूर मिलता है।

रमज़ान और (रोज़ा)


रमजान का महीना कभी 29 दिन का तो कभी 30 दिन का होता है। इस महीने में मुस्लिम समुदाय के लोग उपवास रखते हैं। उपवास को अरबी में “सौम” कहा जाता है, इसलिए इस मास को अरबी में माह-ए-सियाम भी कहते हैं। फ़ारसी में उपवास को रोज़ा कहते हैं। भारत के मुसलिम समुदाय पर फ़ारसी प्रभाव ज़्यादा होने के कारण उपवास को फ़ारसी शब्द ही उपयोग किया जाता है।

रोज़ा के दिन सूर्योदय से पहले कुछ खालेते हैं जिसे सहरी कहते हैं। दिन भर न कुछ खाते हैं न पीते हैं। शाम को सूर्यास्तमय के बाद रोज़ा खोल कर खाते हैं जिसे इफ़्तारी कहते हैं।
महत्वपूर्ण तिथियाँ

Ramzan 2021 date in India

ग्रेगोरियन कैलंडर अनुसार 1938 और 2038 के बीच रमज़ान की तारीख़.
रमजान की पहली और आखिरी तारीख चांद्रमान इस्लामी कैलेंडर द्वारा निर्धारित की जाती है।

आरंभ
हिलाल (वर्धमान चाँद), देख कर रमज़ान मास शुरू किया जाता है.

लैलतुल क़द्र
लैलतुल क़द्र को वर्ष की सबसे पवित्र रात माना जाता है। आम तौर पर माना जाता है कि रमजान के आखिरी दस दिनों के दौरान एक विषम संख्या वाली रात होती है; दाऊदी बोहरा का मानना है कि शब-ए-क़द्र रमजान के तेईस्वीँ रात है।

ईद
ईद उल-फ़ित्र (अरबी: عيد الفطر) है, जो रमज़ान मास के अंत और शव्वाल मास के पहले दिन मनाई जाती है. रमज़ान के आखरी दिन चांद (हिलाल) देख कर अगले दिन ईद घोषित किया जाता है. यानी नया चाँद देख कर किया जाता है. अगर अगर चंद्रमा का दर्शन नहीं हो पाया तो उपवास के तीस दिनों के पूरा होने के बाद घोशित किया जाता है।

रमज़ान और रोज़ा बातें


मुस्लिम समुदाय में रमजान को लेकर निम्न बातें अक्सर देखी जाती हैं।

रमजान को नेकियों या पुन्यकार्यों का मौसम-ए-बहार (बसंत) कहा गया है। रमजान को नेकियों का मौसम भी कहा जाता है। इस महीने में मुस्लमान अल्लाह की इबादत (उपासना) ज्यादा करता है। अपने परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए उपासना के साथ, कुरआन परायण, दान धर्म करता है।
यह महीना समाज के गरीब और जरूरतमंद बंदों के साथ हमदर्दी का है। इस महीने में रोजादार को इफ्तार कराने वाले के गुनाह माफ हो जाते हैं। पैगम्बर मोहम्मद सल्ल. से आपके किसीसहाबी (साथी) ने पूछा- अगर हममें से किसी के पास इतनी गुंजाइश न हो क्या करें। तो हज़रत मुहम्मद ने जवाब दिया कि एक खजूर या पानी से ही इफ्तार करा दिया जाए।
यह महीना मुस्तहिक लोगों की मदद करने का महीना है। रमजान के तअल्लुक से हमें बेशुमार हदीसें मिलती हैं और हम पढ़ते और सुनते रहते हैं लेकिन क्या हम इस पर अमल भी करते हैं। ईमानदारी के साथ हम अपना जायजा लें कि क्या वाकई हम लोग मोहताजों और नादार लोगों की वैसी ही मदद करते हैं जैसी करनी चाहिए? सिर्फ सदकए फित्र देकर हम यह समझते हैं कि हमने अपना हक अदा कर दिया है।
जब अल्लाह की राह में देने की बात आती है तो हमें कंजूसी नहीं करना चाहिए। अल्लाह की राह में खर्च करना अफज़ल है। ग़रीब चाहे वह अन्य धर्म के क्यों न हो, उनकी मदद करने की शिक्षा दीगयी है। दूसरों के काम आना भी एक इबादत समझी जाती है।
ज़कात, सदक़ा, फ़ित्रा, खैर ख़ैरात, ग़रीबों की मदद, दोस्त अहबाब में जो ज़रुरतमंद हैं उनकी मदद करना ज़रूरी समझा और माना जाता है।
अपनी ज़रूरीयात को कम करना और दूसरों की ज़रूरीयात को पूरा करना अपने गुनाहों को कम और नेकियों को ज़्यादा करदेता है।
मोहम्मद सल्ल ने फरमाया है जो शख्स नमाज के रोजे ईमान और एहतेसाब (अपने जायजे के साथ) रखे उसके सब पिछले गुनाह माफ कर दिए जाएँगे। रोजा हमें जब्ते नफ्स (खुद पर काबू रखने) की तरबियत देता है। हममें परहेजगारी पैदा करता है। लेकिन अब जैसे ही माहे रमजान आने वाला होता है, लोगों के जहन में तरह-तरह के चटपटे और मजेदार खाने का तसव्वुर आ जाता है।

Ramzan 2021 क्या हैं सहरी और इफ़्तार
सूर्योदय से पहले कुछ खान पान कर लेते हैं, खजूर या अन्य मनपसंद चीज खाई जाती है जिसे सहरी कहा जाता है. वहीं, इफ़तार सूर्य अस्त होने के बाद इफ्तार किया जाता है.

रमज़ान मुस्लिम कैलेंडर का नौवां महीना होता है. जो ईद-उल-फ़ित्र से ठीक पहले वाला महीना होता है. ये वही ईद है जिसपर सिवईं बनती हैं. रमजान में मुस्लिम रोज़ा रखते हैं. यानी जब सूरज निकलता है उस वक़्त से लेकर, जब तक सूरज छिपता है उस वक़्त तक कुछ नहीं खाते-पीते.

रमज़ान के बारे में सवाल तो बहुत होंगे, मगर यहां हम आपको मोटामाटी सवालों के जवाब दे रहे हैं जो किसी के भी मन में आ सकते हैं.

ये रमज़ान है या रमादान

रमादान और रमज़ान के पीछे की कहानी ये बताई जाती है कि अरबी भाषा में ‘ज़्वाद’ अक्षर का स्वर अंग्रेज़ी के ‘ज़ेड’ के बजाए ‘डीएच’ की संयुक्त ध्वनि होता है. इसीलिए अरबी में इसे रमादान कहते हैं. लेकिन इस तर्क से सभी मुस्लिम स्कॉलर इत्तेफाक नहीं रखते. वो कहते हैं जब रमज़ान, रमादान है तो फिर रोज़े को ‘रोदे’ और ज़मीन को दमीन कहा जाना चाहिए. और अगर ऐसा बोला गया तो कोई भी उसे तोतला समझ लेगा. खैर इस फेर में नहीं पड़ते. क्योंकि लोगों की भावनाएं आहत हो जाती हैं. ये सब उच्चारण का हेरफेर है. हम अगला सवाल करते हैं.

रमज़ान असल में है क्या? Ramzan 2021


रमज़ान मुस्लिमों का पूरे साल में सबसे पवित्र महीना है. पैगंबर मुहम्मद साहब (अल्लाह के दूत) के मुताबिक,

‘जब रमज़ान का महीना शुरू होता है तो जहन्नुम के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं और जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं.’

यानी ये महीना नेकियों का महीना है. जिसमें मुस्लिम रोज़ा रखने के अलावा कुरान की तिलावत (पढ़ते) पूरी कसरत से करते हैं. माना जाता है जितना कुरान पढ़ेंगे उतना सवाब होगा. गुनाह माफ़ होंगे और जन्नत के हकदार बनेंगे. रोज़े 30 दिन के भी हो सकते हैं और 29 दिन के भी. ये बात भी चांद पर ही डिपेंड करती है कि वो कब अपना दीदार कराता है. जिस रात को चांद दिखता है उससे अगली सुबह ईद का दिन होता है.

कुरान जो मुस्लिमों का धर्मग्रंथ है, वो भी इसी महीने में नाज़िल (दुनिया में आया) हुआ बताया जाता है. मुसलमानों के मुताबिक जिस रात कुरान की आयत आई उसे अरबी में ‘लैलातुल क़द्र’ यानी ‘द नाईट ऑफ़ पावर’ कहा जाता है. रमज़ान के महीने में रात कौन सी है इस बारे में शिया मुस्लिम और सुन्नी मुस्लिम में मतभेद है.

मुसलमानों के मुताबिक ये वो महीना जब इंसान अल्लाह के करीब आ जाता है क्योंकि वो नेक अमाल अंजाम देता है. गुनाहों से बचने की कोशिश करता है. क्योंकि झूठ बोलने से भी रोज़ा नहीं होता ऐसा माना जाता है. तो ऐसे में मुसलमान चाहता है कि जब वो पूरे दिन भूखा प्यासा रहा ही है तो क्यों न उसका रोज़ा भी पूरा हो जाए.

रोज़ा कैसे रखा जाता है?


रोज़ा इस्लाम के फाइव पिलर में से एक है. जो सभी बालिग़ पर वाजिब है. यानी उन्हें पूरे महीने के रोज़े रखने ही रखने हैं. फाइव पिलर हैं. कलमा (अल्लाह को एक मानना), नमाज़, ज़कात (दान), रोज़ा और हज (मक्का में काबा).

जो बीमार हैं. जो यात्रा पर हैं. जो औरतें प्रेग्नेंट हैं. जो बच्चे हैं. बस उन्हें ही रोज़ा रखने से छूट दी गई है. रोज़ा रखने वाले तड़के में सूरज के निकलने से पहले जो भी खाना पीना है, वो कर सकते हैं. इसके बाद पूरे दिन न तो कुछ खाना है और न पीना है. पीना मतलब सिगरेट, बीड़ी का धुआं भी नहीं. न ही बीवी शौहर से और न शौहर बीवी से सेक्स के बारे में सोच सकता है. खाने पीने के बारे में ये समझिए कि अगर रोज़ा है तो मुंह का थूक भी अंदर नहीं निगल सकते. यानी संतरे देखकर मुंह में पानी आया तो वो भी निषेध है.

ये वो महीना है जब मुस्लिम किसी से जलने. किसी की चुगली करने, गुस्सा करने से परहेज़ करते हैं. पूरी तरह से खुद को संयम में रखने का महीना है. तभी रोज़ा पूरा होता है.

शाम को सूरज छिपता है. खाने पकाने के इंतजाम सवेरे से ही होने लगते हैं. चाट-पकौड़ियां. तरह तरह के लज़ीज़ खाने. शाम को अगर दस्तरख्वान देखा जाए तो दिल ललचा जाए. तड़के में जब खाते हैं तो उसे ‘सहरी’ और जब शाम को खाया जाता है तो उसे ‘इफ्तार’ कहा जाता है. यानी ये पूरा महीने का उत्सव भी है.

कितना मुश्किल होता है रोज़ा?


गार्मियों में दिन करीब 15 से 17 घंटे तक का होता है. और जब जून के महीने में रोज़े आते हैं तो ये और भी मुश्किल होते हैं. क्योंकि सूरज महाराज अपनी तपिश से ज़मीन को भी शोला बनाने की चाहत रखते हैं. और रोज़ेदार पानी भी नहीं पीते. ऐसे में बॉडी में पानी की कमी होने लगती है. और जिस्म टूटकर चूर हो जाता है.

सुबह में सहरी के लिए जल्दी उठना पड़ता है. नमाज़ पढ़नी होती है. कुरान की तिलावत करनी होती है. फिर शाम को तरावीह पढ़नी होती हैं. तरावीह में कुरान ही पढ़ा जाता है, मगर वो नमाज़ की तरह पढ़ा जाता है. इसको पढ़ने में कम से कम एक घंटा तो लगता ही है. ऐसे में देर से सोना भी होता है. जल्दी उठना, देर से सोने की वजह से नींद भी पूरी नहीं होती.

क्या रमज़ान में वज़न घट जाता है?


रोज़ेदार पूरा दिन कुछ नहीं खाते. ऐसे में ये सवाल उठना लाज़िमी है कि जब कुछ नहीं खाते तो वज़न घट जाता होगा. कुछ तो कहते हुए भी मिल जाएंगे कि रमजान में वज़न घट जाता है. लेकिन ऐसा है नहीं. रमज़ान में वज़न घटता नहीं बढ़ जाता है, क्योंकि सहरी और इफ्तार में खाना खाया जाता है, वो इतना हैवी होता है कि उनमें खूब प्रोटीन, वसा होता है. जो वज़न नहीं घटने देता. दूसरा पूरे दिन के इतने थके होते हैं कि सहरी और इफ्तार में खाने के बाद टहला नहीं जाता. जिस वजह से वो खाना हज़म नही हो पाता.

हर साल रमज़ान की तारीख क्यों बदल जाती है


इसकी वजह है इस्लामिक कैलेंडर, जो चांद के मुताबिक होता है. जिसके साल में 354 दिन होते हैं. अंग्रेजी कैलेंडर की तरह 365 दिन नहीं. इसलिए हर साल 13 दिन कम हो जाते हैं. और इस तरह हर त्योहार मुस्लिमों का 11 दिन पहले आ जाता है. ये ही वजह है कि रोज़े जो कुछ साल पहले सर्दियों में आते थे वो अब गर्मियों में आने लगे. इस चांद की हेरा फेरी में ही गूगल देवता भी रमज़ान की डेट बताने के धोखा खा जाते हैं.

क्या शिया मुस्लिम और सुन्नी मुस्लिम के रोज़े अलग होते हैं.


रोज़ा रखने में कोई फर्क नहीं होता. हां, सहरी करने और इफ्तार करने के वक़्त में थोड़ा फर्क ज़रूर होता है. मिसाल के तौर पर सुन्नी मुसलमान अपना रोजा सूरज छिपने पर खोलते हैं. मतलब उस वक्त सूरज बिल्कुल दिखना नहीं चाहिए. वहीं शिया मुस्लिम आसमान में पूरी तरह अंधेरा होने तक इंतजार करते हैं. ऐसे ही तड़के में सुन्नी मुस्लिम से 10 मिनट पहले ही शिया मुस्लिम के खाने का वक़्त ख़त्म हो जाता है.

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