Hazrat jibreel Ali Salam ka waqia: Hazrat Jibrail Alaihissalam Aur Ek Noorani Tara

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Hazrat jibreel Ali Salam ka waqia: Hazrat Jibrail Alaihissalam Aur Ek Noorani Tara

Hazrat jibreel Ali Salam ka waqia janna ho to aap is post ko poora padehe isme Hazrat jibreel Ali Salam ka waqia likha hua hai.

दूसरा बाब

सय्यदुल – अंबिया हुजूर अहमद – ए – मुज्तबा मुहम्मद – ए – मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम वमा अरसलना क इल्ला रहमतल लिल – आलमीन

हिकायत ४.(Hazrat jibreel Ali Salam ka waqia :Hazrat Jibrail Alaihissalam Aur Ek Noorani Tara)

रजवी किताब घर सच्ची हिकायात हिस्सा अव्वल जिब्रईल अमीन और एक नूरानी तारा एक मर्तबा हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत जिब्रईल अमीन अलैहिस्सलाम से दर्याफ्त फरमाया कि ऐ जिब्रईल ! तुम्हारी उम्र कितनी है ? तो जिब्रईल ने अर्ज़ किया हुजूर ! मुझे कुछ ख़बर नहीं । हां , इतना जानता हूं कि चौथे हिजाब में एक नूरानी तारा सत्तर हजार बरस के बाद चमकता था । मैंने उसे बहत्तर हज़ार मर्तबा चमकते देखा है । हुजूर अलैहिस्सलाम ने यह सुनकर फ्रमाया : ” मेरे रब की इज्जत की कसम ! मैं ही वह नूरानी तारा हूं ।

” ( रूहुल ब्यान जिल्द १ , सफा ६७४ )

सबक : हमारे हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम काइनात की हर चीज़ से पहले पैदा फ़रमाए गए हैं । आपका नूर – ए – पाक उस वक्त भी था जबकि न कोई फ़रिश्ता था , न कोई बशर न ज़मीन थी , न आसमान और न कोई शय फसल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम |

हिकायत ५

यमन का बादशाह किताबुल – मुस्तज़रिफ और हुज्जतुल्लाहि अलल – आलमीन और तारीखे इब्ने आसकिर में है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से एक हजार साल पेशतर यमन का बादशाह तुब्बा अव्वल हिमयरी था । एक मर्तबा वह अपनी सलतनत के दौरे को निकला । बारह हज़ार आलिम और हकीम और एक लाख बत्तीस हजार सवार और एक लाख तेरह हजार प्यादह अपने हमराह लिए और इस शान से निकला कि जहां भी पहुंचता उसकी शान व शौकते शाही देखकर मखलूके खुदा चारों तरफ से नज़ारा को जमा हो जाती थी ।

यह बादशाह जब दौरा करता हुआ मक्का मोअज्जमा पहुंचा तो अहले मक्का से कोई उसे देखने न आया । बादशाह हैरान हुआ और उसने अपने वज़ीरे आज़म से इसकी वजह पूछी तो उसने बताया कि इस शहर में एक घर है जिसे बैतुल्लाह कहते हैं ।

उसकी और उसके खादिमों की जो यहां के बाशिंदे हैं तमाम लोग बेहद ताज़ीम करते हैं और जितना आपका लशकर है , इससे कहीं ज्यादा दूर और नज़दीक के लोग इस घर की ज़्यारत को आते हैं और यहां के बाशिंदों की खिदमत करके चले जाते हैं । फिर आपका लशकर इनके ख्याल में क्यों आए ? यह सुनकर बादशाह को गुस्सा आया और क़सम खाकर कहने लगा कि मैं इस घर को खुदवा दूंगा और यहां के बाशिन्दों को कत्ल कराऊंगा । यह कहना था कि बादशाह के नाक , मुंह और आंखों से खून बहना शुरू हो गया ।

ऐसा बदबूदार माद्दा बहने लगा कि उसके पास बैठने की भी किसी को ताक़त न रही । इस मर्ज का इलाज किया गया मगर अच्छा नहीं हुआ । शाम के वक्त बादशाह के साथी आलिमों में से एक आलिमे रब्बानी तशरीफ़ लाए और नब्ज़ देखकर फरमाया- कि मर्ज़ आसमानी है और इलाज ज़मीन का हो रहा है । ऐ बादशाह ! आपने अगर कोई बुरी नीयत की है तो फ़ौरन उससे तौबा कीजिए ।

बादशाह ने दिल – ही – दिल में बैतुल्लाह शरीफ़ और खुद्दामे काबा के मुतअल्लिक अपने इरादे से तौबा की । तौबा करते ही उसका वह ख़ून और माद्दा बहना बंद हो गया और फिर सेहत की खुशी में उसने बैतुल्लाह शरीफ को रेशमी गिलाफ चढ़ाया और शहर के हर बाशिन्दे को सात – सात अशर्फी और सात – सात रेशमी जोड़े नज़ किए । फिर यहां से चलकर जब मदीना मुनव्वरा पहुंचा तो हमराही आलिमों ने ( जो आसमानी किताबों के आलिम थे ) वहां की मिट्टी को सूंघा और कंकरियों को देखा और नबी आख़िरुज्जमां की हिजरतगाह की जो अलामतें उन्होंने पढ़ी थीं उनके मुताबिक उस सरज़मीन को पाया तो आपस में अहद कर लिया कि हम यहां ही मर जाएंगे ।

मगर इस रारज़मीन को न छोड़ेंगे । अगर हमारी किस्मत ने साथ दिया तो कभी – न – कभी जब नबी आखिरुज्जमां ( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) यहां तशरीफ लाएंगे , हमें भी ज़्यारत का श हासिल हो जाएगा , वरना हमारी कब्रों पर तो ज़रूर ही कभी – न – कभी उनकी जूतियों की मुकद्दस ख़ाक उड़कर पड़ जाएगी जो हमारी निजात के लिए काफी है । यह सुनकर बादशाह ने उन आलिमों के वास्ते चार सौ मकान बनवाए और उस बड़े आलिमे रब्बानी के मकान के पास हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़ातिर एक दो मंजिला उमदा मकान तैयार कराया और वसीयत कर दी कि जब आप तशरीफ़ लाएं तो यह मकान आपकी आरामगाह होगी और उन चार सौ उलमा की काफी इमदाद भी की । कहा , तुम हमेशा यहीं रहो ।

फिर बड़े आलिमे रब्बानी को एक खत लिख कर दिया और कहा कि मेरा यह ख़त उस नबी आखिरुज्जमां सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़िदमते अकदस में पेश कर देना और अगर ज़िन्दगी भर तुम्हें हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज्यारत का मौका न मिले तो अपनी औलाद को वसीयत कर देना कि नसलन बाद नस्लिन मेरा यह ख़त महफूज़ रखें । हत्ता कि सरकारे अकदस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में पेश किया जाए ।

यह कहकर बादशाह वहां से चल दिया । वह ख़त नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में एक हजार साल बाद पेश हुआ कैसे हुआ ? और ख़त में क्या लिखा था ? सुनिए और अजमते मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का एतराफ फरमाइए । त का मजमून यह था : कमतरीन मखलूक तुब्बा अव्वल हिमयरी की तरफ से शफी – उल – मुज़मबीन सय्यदुल- मुरसलीन मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अम्मा बाद ऐ अल्लाह के हबीब मैं आप पर ईमान लाता हूं और जो किताब आप पर नाज़िल होगी उस पर भी ईमान लाता हूं और मैं आपके दीन पर हूं । पस अगर मुझे आपकी ज़्यारत का मौका मिल गया तो बहुत अच्छा व गनीमत और अगर मैं आपकी ज़्यारत न कर सका तो मेरी शफाअत फरमाना और क्यामत के रोज़ मुझे फ़ामोश न करना

मैं आपकी पहली उम्मत में से हूं और आपके साथ आपकी आमद से पहले ही बैअत करता हूं । मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह एक है और आप उसके सच्चे रसूल हैं । शाहे यमन का यह ख़त उन चार सौ आलिमों की नस्ल – दर – नस्ल द्वारा जान की तरह हिफाज़त की जाती रही । यहां तक कि एक हज़ार साल का वक़्त गुज़र गया । उन आलिमों की औलाद इस कसरत से बढ़ी की मदीने की आबादी में कई गुना इज़ाफ़ा हो गया और यह ख़त दस्त – ब – दस्त म वसीयत के उस बड़े आलिमे रब्बानी की औलाद में से हज़रत अबू ऐय्यूब अंसारी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के पास पहुंचा और आपने वह ख़त गुलाभ | ख़ास अबू – लैला की हिफ़ाज़त में रखा । जब हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मक्का मोअज्जमा से हिजरत फरमा कर मदीना मुनव्वरा पहुंचे और मदीना की अलवदाई घाटी सनीयात की घाटियों से आपकी ऊंटनी नमूदार हुई और मदीने के खुशनसीब लोग महबूबे ख़ुदा का इस्तिकबाल करने को जूक दर जूक ( भीड़ – की – भीड़ ) आ रहे थे । कोई अपने मकानों को सजा रहा था , कोई दावत का इंतजाम कर रहा था और सब यही इसरार कर रहे थे कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मेरे घर तशरीफ फरमा हों ।

हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि मेरी ऊंटनी की नकील छोड़ दो । जिस घर में यह ठहरेगी और बैठ जाएगी , वही मेरी क्यामगाह ( रहने ) की जगह ) होगी । चुनांचे जो दो मंजिला मकान शाहे यमन तुब्बा की खातिर बनवाया था , वह उस वक्त हज़रत अबू ऐय्यूब अंसारी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के पास था । उसी में हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ऊंटनी जाकर ठहर गई । लोगों ने अबू – लैला को भेजा कि जाओ हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को शाहे यमन तुब्बा का ख़त दे आओ ।

जब अबू – लैला हाज़िर हुआ तो हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसे देखते ही फ्रमाया : तू अबू – लैला है ? यह सुनकर अबू – लैला हैरान हो गया । हुजूर ने फिर फ़रमाया : मैं मुहम्मद रसूलुल्लाह ( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) हूं , शाहे यमन का जो मेरा ख़त तुम्हारे पास है , लाओ । वह मुझे दो । चुनांचे अबू – लैला ने वह ख़त दिया और हुजूर ने पढ़कर फ़रमाया नेक भाई तुब्बा को आफ़री व शाबाश है ।

( मीज़ानुल अद्यान सफा १७७ )

Hazrat jibreel Ali Salam ka waqia :
Hazrat Jibrail Alaihissalam Aur Ek Noorani Tara

सबक़ : हमारे हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का हर ज़माने में चर्चा रहा है । खुशकिस्मत अफ़राद ने हर दौर में हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से फ़ैज़ पाया । हमारे हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अगली पिछली तमाम बातें जानते हैं । यह भी मालूम हुआ कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की आमद- आमद की खुशी में मकानों और बाज़ारों को सजाना और सजावट करना सहाबाए किराम की सुन्नत है । फिर आज अगर हुजूर सल्लल्लाहु अलैि वसल्लम की आमद की खुशी में बाज़ारों को सजाया जाए , घरों की सजावट की जाए और जुलूस निकाला जाए तो उसे बिद्भुत कहने वाला खुद क्यों बिदअती न होगा ?

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