Sunnat : Karz ki Sunnate or Adab (कर्ज़ की सुन्नते और आदाब)

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Sunnat : Karz ki Sunnate or Adab (कर्ज़ की सुन्नते और आदाब)

Sunnat Karz ki Sunnate or Adab (कर्ज़ की सुन्नते और आदाब) को समझने के लिए Sunnat : सुन्नत पर अमल करने वाले बनिए सुन्नत पर अमल करने का बड़ा ही अजर और सवाब है।

Sunnat : Karz ki Sunnate or Adab (कर्ज़ की सुन्नते और आदाब)

इस पोस्ट में हमने

कुछ हदीसे जो फैजाने सुन्नत से ली गई है पोस्ट की है

जिसमें आप जानेंगे कि कर्ज़ लेने और देने के सुन्नत और आदाब तरीके क्या हैं।

आप पोस्ट को पूरा पढ़ें इंशा अल्लाह

आप अच्छी तरह सीख जाएंगे के कर्ज लेने की सुन्नत क्या है .

Tech Nelofar

और देने की सुन्नत किया है कर्जदार से कैसे पेश आना चाहिए सभी कुछ इस पोस्ट में मौजूद है।

Sunnat: कर्ज देने की फजीलत

हजरते अब्दुल्लाह बिन मसऊद

( सल्लल्लाहो ताला अलेही वसल्लम) से रिवायत है

कि ताजदारे मदीना (सल्लल्लाहो ताला अलेही वसल्लम ) ने फरमाया , ” हर कर्ज सदका है । ”

( अत – तरंगीन वत – तरहीन )

Islamic Nelofar Azhari

कितनी अच्छी बात है कि खुश हाल आदमी किसी गरीब को कर्ज दे

और ये सवाब का काम है ।

अल्लाह से इसका अज पाएगा ।

ये इस लिए कि उस गरीब की मुश्किल आसान कर दी ।

अल्लाह कर्ज देने वोले की मुश्किल को कियामत के दिन आसान करेगा ।

हुजूर ताजदारे मदीना का फरमाने आलीशान है ,

मैंने जन्नत के दरवाज़े पर लिखा हुआ देखा कि सदके का हर दिरहम दस दिरहम के बराबर है और कर्ज का हर दिरहम अठारा दिरहम के बराबर है ।

इस का मतलब ये है कि कर्ज सिर्फ हाजतमंद ही लेता है और सदके में ये वहम मौजूद है
कि शायद मोहताज के बजाए गैर मोहताज को पहुँच जाए ।

( कीमिया – ए – सआदत )

हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद से रिवायत कि हुजूर सय्यदे दो आलम ( s.a.w) ने इर्शाद रमाया ,

” जो मुसलमान किसी मुसलमान को एक बार कर्ज देगा । तो उसको इतना सवाब मिलेगा ।

गोया उसने दो मरतबा उतनी रकम अल्लाह की राह में दी ।

( इब्ने माजा )

Sunnat : Karz ki Sunnate or Adab (कर्ज़ की सुन्नते और आदाब)

Sunnat: कर्जदार का तोहफा न लो

हज़रते अनस से रिवायत है कि

Lरसूलुल्लाह ताला अलेही वसल्लम ) ने इर्शाद फरमाया ,

” जब एक शख़्स दूसरे को कर्ज़ की सुन्नतें और आदाब कर्ज दे तो उसका हदिया कबूल न करे ।

( बुखारी )

हज़रते अनस से रिवायत है कि ताजद मदीना

( सल्लल्लाहो ताला अलेही वसल्लम ) ने फरमाया ,

” जब कोई कर्ज दे इसके पास वो हदिया करे तो कबूल न करे और अपनी सुवा पर सुवार करे तो सुवार न हो । हाँ , अगर पहले से इन दोनों ( हदिया वगैरा ) जारी था तो अब हरज नहीं ।

( इब्ने माजा)

इमामे अज़म ( राज़ी अल्लाहू तला अन्हू ) का तकवा (sunnat)

हज़रते इमामे अअञ्जम (राज़ी अल्लाहु ताला अनु)

एक जनाज़ा पर तशरीफ ले गये

धूप की बड़ी शिद्दत थी और वहाँ कोई सान न था ।

साथ ही एक शख्स का मकान था ।

उस मकान दीवार का साया देखकर लोगों ने हज़रत इमामें आजम से अर्ज किया हुजूर ! आप इस साए में खड़े जाइए ।

हज़रत ने फरमाया कि इस मकान का मालिक है

वो मेरा मकरूज़ है और

अगर मैंने इसकी दीवार कुछ नफ्अ हासिल किया तो मैं डरता हूँ कि

( अल्लाह के नजदीक ) कहीं सूद लेने वालों में शुमार हो जाऊँ । क्योंकि सरवरे आलम ( सल्लल्लाहो ताला अलेही वसल्लम) ने फरमाया कि जिस कर्ज से नफा लिया जाए वो सूद है । चुनान्चे आ धूप में ही खड़े रहे ।
( तजकिरतुल अवलिया ) !

हमारे इमामे अअज़म का तकवा था ।

बुजुर्गाने दीन के दिल में अल्लाह का खौफ कूट कूटकर भरा होता है ।

इसी लिए ये हज़राते मुक़द्दस कदम कदम पर अल्लाह से डरते हैं ।

मक़रूज़ से हदिया क़बूल करने की तफ़सील

जिस पर कर्ज है उसने कर्ज देने वाले को कुछ हत्या किया तो लेने से हर्ज नहीं जबकि हत्यादेना कर्ज की वजह से ना हो बल्कि इस वजह से हो कि दोनों में काबत था दोस्ती है ।

या उसकी आदत ही जूद सखावत है कि लोगों को हदिया किया करता है

और अगर कर्ज की वजह से हदिया देता है तो इसके लेने से बचना चाहिए और अगर ये पता न चले कि कर्ज की वजह से है या परहेज करना चाहिए ।

हाँ जब तक ये बात जाहिर न हो जाए कि कर्ज की वजह से है

उस वक्त तक कबूल करने में कोई हरज नहीं और अगर कर्ज की वजह से है या पता न चले तो बचना चाहिए । इसको यूँ समझना चाहिए कि कर्ज नहीं दिया था ।

जब भी दवत करता था तो मालूम हुआ कि ये दावत कर्ज की वजह से नहीं

और अगर पहले नहीं करता था और अब करता है या पहले महीने में एक बार करता था और अब दो बार करने लगा या अब सामाने जियाफत ज्यादा करता है तो मालूम हुआ कि ये कर्ज की वजह से है इस से इज्तिनाब करना चाहिए ।

( आलमगिरी )

Sunnat: कर्जा अदा कर के शुक्रिया भी अदा करो

Sunnat : Karz ki Sunnate or Adab (कर्ज़ की सुन्नते और आदाब)

हज़रते अब्दुल्लाह बिन रबीआ फरमाते हैं .

मुझ से हुज़ूरे अकदस ( सल्लल्लाहो ताला अलेही वसल्लम ) ने कर्ज लिया था ।

जब हुज़ूर ( सल्लल्लाहो ताला अलेही वसल्लम) के पास माल आया . अदा फरमाया और दुआ दी कि अल्लाह तआला तेरे अहल_ एयाल में बरकत दे और फरमाया , ‘ कर्ज का बदला शुक्रिया है और अदा कर देना । “

( नसाई )

इसी तरह जब भी कोई एहसान करे तो उसका शुक्रिया अदा करना चाहिए ।

सरकारे मदीना छोटी छोटी बातों पर लोगों का शुक्रिया अदा फरमाते थे । बञ्ज रिवायतों में ये भी है कि जब आप पर कोई एहसान करता , ( बल्कि ये सरकार का एहसान है अगर किसी को खिदमत का मौकअ इनायत फरमाएँ ) तो आप उसे इस तरह दुआ देते( जजाकल्लाहू खेयर) अल्लाह तुझे बेहतरीन जगा दे।

Sunnat: कियामत के ग़म से बचनेके लिए

हुजूर ताजदारे दो आलम ( सल्लल्लाहो ताला अलेही वसल्लम) का फरमान आलीशान है ,

” जिस शख्स को ये बात पसन्द हो कि अल्लाह | तआला इसे कियामत के दिन गम और घुटन से बचाए तो उसे चाहिए कि तंगदस्त कर्जदार को मोहलत दे या कर्ज उतार दे ।( यानी मुआफ कर दे )

( मुस्लिम )

Sunnat: इमामे आज़म का करम

हज़रते इमामे अअजम (रजि अल्लाह ताला अनु ) की आदते करीमा थी

कि हुसूले सवाब के लिए कसरत से लोगों को कर्ज दिया करते थे ।

और अपने मक़रूजों के साथ आप का हुस्ने सुलूक भी वे – मिसाल था ।

इस हुस्ने सुलूक की एक रौशन दास्तान मुलाहूजा फरमाईए

वकीअ

मक्का हज़रते शफीक फरमाते हैं कि

मैं हज़रते इमामे अअजम के साथ जा रहा था कि एक शख्स ने आप को देखा और छुप गया और दूसरा रास्ता इख्तियार किया ।

आप को मालूम हुआ तो आप ने उसे पुकारा ।

वो आया तो आप ने उससे पूछा , कि तुम ने रास्ता क्यों बदल दिया ? और क्यों छुप गए ? उसने कहा , मैं आप का मक़रूज़ हूँ ।

दस हजार दिरहम मैंने आप को देने हैं ।

जिसको काफी अर्सा गुजर चुका है और मैं तंगदस्त हूँ ,

आप ने फरमाया , ( ! मैं शर्माता हूँ । मेरी वजह से तुम्हारी ये हालत है ? जाओ ! मैंने सब रुपिया तुमको बख्श दिया और मैंने अपने आपको अपने नफ्स पर गवाह किया ।

अब आइन्दा मुझसे न छुपना और जो खौफ तुम्हारे दिल में से पैदा हुआ , मुझे माफ़ कर दो

(जहरूल बयान )

कर्ज़ बहुत ही बड़ा बोझ है !

हजरत अबू सईद खुदरी फरमाते हैं कि नबी – ए – करीम )

की खिदमत में नमाज पढ़ाने के लिए जनाजा लाया गया तो हुजूर सरियदे दो आलम ने पूछा , इस मारने वाले पर कोई कर्ज तो नहीं है ?

अर्ज किया गया , हाँ इस पर कर्ज है । हुजूर ने पूछा , इसने कुछ माल भी छोड़ा है कि जिससे ये कर्ज अदा किया सके ।

अर्ज किया गया नहीं तो हुजूर सध्यिदे दो आलम ने फरमाया ,

तुम लोग इसकी नमाजे जनाजा पढ़लो ( मैं नहीं पढूँगा ) हज़रते मौला अली ने देखकर अर्ज किया ऐ अल्लाह के रसूल !

मैं इसके कर्ज को अदा करने की जिम्मेदारी लेता हूँ । हुजूर आगे बढ़े और नमाज़े जनाजा पढ़ाई और फरमाया , ” ऐ अली ( अल्लाह तआला ) तुझे आग से बचाए ।

और तेरी जाँ बख्शी हो जैसे कि तूने अपने इस मुसलमान भाई के कर्ज की जिम्मेदारी लेकर इसकी जान छुड़ाई । कोई भी मुसलमान ऐसा नहीं है जो अपने मुसलमान भाई की तरफ से उसका कर्जा अदा करे मगर ये कि अल्लाह तआला क़ियामत के दिन उसको रिहाई बख्शेगा । “

( शरहुस सुन्तह )

हुजूर ताजदारे मदीना का फरमाने आलीशान है ,

” वो शख्स जिसने अल्लाह की राह में जान दी है ( यानी शहीद हुआ है ) उसका हर गुनाह मुआफ हो जब आएगा सिवाए कर्ज के । “


( मुस्लिम )

हुज़ूर ताजदारे मदीना का फरमाने आलीशान है ,

जो लोगों का माल बतौरे कर्ज ले और वो निय्यत इसके अदा करने की रखता है तो अल्लाह उस की तरफ से अदा कर देगा ।

और जिस शख्स ने माल बतौरे कर्ज लिया और निय्यत अदा करने की नहीं रखता तो अल्लाह तआला उस शख्स को इसकी वजह से तबाह कर देगा । ”

( बुखारी )

ऊपर की तीनों हदीसें कर्ज अदा करने की अहमियत को खूब वाजेह करती हैं ।

जिस शख्स ने अपनी जान तक अल्लाह की राह में कुरबान कर दी उस के ऊपर भी अगर कर्जा है और वो अदा करके नहीं आया है

तो वो मुआफ नहीं होगा क्योंकि ये बंदों के हुकूक से तअल्लुक रखता है जब तक कर्ज ख्वाह मुआफ न करे उस वक्त तक अल्लाह तआला भी मुआफ नहीं करेगा ।

अगर आदमी देने की निय्यत रखता हो ।

मगर अदा न कर सके और मर जाए तो क़ियामत के दिन अल्लाह साहिबे हक को बुलाएगा और मुआफ़ करने के लिए उसे कहेगा और इसके बदले इसे जन्नत की नेअमतें देने का वअदा फरमाएगा तो साहिबे हक अपने हक को मुआफ़ कर देगा ।

लेकिन अगर किसी ने कुदरत रखने के बावजूद अदा नहीं किया और साहिबे हक को उसका हक नहीं लौटाया , या दुनिया में उस से मुआफ नहीं कराया तो साहिये हक को मकरूज की नेकियाँ दिलाई जाएंगी ।

अअला हज़रत (अल्लाह ताला अनु) फतावा रजविया शरीफ में फरमाते हैं

कि जिसने दुनिया में किसी के तीन पैसे कर्जा दबा लिया । कल बरोजे कियामत उन तीन पैसों के इवज सात सौ बा जमाअत नमाज़े देनी पड़ जाएंगी ।

तीन पैसों का ये हाल है तो यहाँ हज़ारों बल्कि लाखों रुपये लोगों के दबा • लिए जाते हैं ।

हश्र में क्या बनेगा ?

अगर नेकियाँ देकर हक पूरा ना हुआ तो कर्ज़ ख़्वाह ( जिसका कर्जा दबा लिया गया था ) के गुनाह मज़ को दे दिए जाएंगे ।

इसी तरह तमाम हुकूकुल अंबाद के मुआमले में होगा । मगर अल्लाह जिस पर चाहेगा अपना फ़ज़्ल- करम फ़रमाएगा और ज़ालिम व मज़लूम के दरमियान सुलह करा देगा ।

कर्ज़ की अदाएगी में बिला वजह ताख़ीर गुनाह है

हुज्जतुल इस्लाम हज़रते सय्येदुना इमाम गज़ाली फरमाते हैं मदीना -हदीस शरीफ में है , ” जो शख़्स कर्ज लेता है और ये निय्यत करता है मैं अच्छी तरह अदा कर दूँगा । तो अल्लाह तआला उस पर चन्द फिरिश्ते मुकरर्र फरमाता है जो उसकी हिफाजत करते रहते हैं । और दुआ करते हैं कि इस का कर्ज अदा हो जाए । और अगर कर्जदार कर्ज अदा कर सकता हो तो कर्जख्वाह की मर्जी के बिगैर एक घड़ी भर भी अगर देर करेगा तो गुनाहगार होगा और ज़ालिम क़रार पाएगा ।

चाहे रोज़े की हालत में हो या नमाज़ की हालत में या नींद कर रहा हो ।

उसके जिम्मे गुनाह लिखा जाता रहेगा । और बहर सूरत अल्लाह तआला की लअनत उसपर पड़ती रहेगी ।

और ये ऐसा गुनाह है कि नींद की हालत में भी उसके साथ रहता है और अदा करने की ताकत की ये शर्त नहीं कि नकद रुपिया हो । बल्कि कोई चीज़ अगर फरोख़्त कर सकता है मगर फरोख्त कर के अदा नहीं करता तो गुनाहगार होगा और अगर ख़राब रुपिया पैसा या कर्ज़ के बदले ऐसी चीज़ दे जो कर्ज ख़्वाह को ना पसंद हो तब भी देने वाला गुनाहगार होगा और जब तक उसे राजी नहीं करेगा इस ज्यादती से नजात न पायेगा । क्योंकि इसका ये फअल कबीरा गुनाहों में से है। लोग इसे मअमूली ख़याल करते हैं “


( कीमिया – ए – सआदत )

अफ़सोस !

आज कल लोगों को जब क़र्ज़ लेना होता है ।

तो खुशामद करके , झूटे वअदे करके कर्जा हासिल कर लेते हैं मगर फिर देने का नाम नहीं लेते ।

चाहिए तो ये था कि शुक्रिया के साथ जल्द कर्जा अदा कर दिया जाता । इसकी बजाए कर्ज ख़्वाह को खूब धक्के खिलाए जाते हैं , ये बहुत ही बुरी बात है ।

अदाए कर्ज़ में टाल मटोल है ! ज़ुल्म ताजदारे मदीना का फरमाने आलीशान है , मालदार कर्जदार ( यानी जो अदा करने की ताकत रखता है ) का कर्जा अदा करने में टाल मटोल करना ज़ुल्म है और अगर कर्जदार कहे कि तुम अपना कर्जा फुलाँ खुशहाल आदमी से ले लो , तो ख़्वाह मख्वाह कर्जदार के सर पर सुवार न रहना चाहिए ।
उसकी ये बात मान ले और जिसका उसने हवाला दिया है उससे जाकर लेले ।

( बुखारी व मुस्लिम )

अगर किसी आदमी के पास कर्ज अदा करने के लिए कुछ नहीं है और वो ये कहता है कि जाओ ,

फुलाँ शख्स से ले लो । मेरे और उसके दरमियान बात चीत हो चुकी है वो अदा करने पर राजी है तो कर्ज ख्वाह को चाहिए कि वो ये कहे कि मैं तो तुझी से लूँगा मैं किसी और को क्या जानूँ बल्कि उसके साथ नर्मी का मुआमला करे ।

जिसका वो हवाला दे रहा है उससे वसूल कर ले । ऐ हमारे प्यारे अल्लाह हमें फ़राख़ दिली के साथ ब निय्यते सवाब हाजतमंदों को कर्ज़ देने और कर्जदार के साथ नर्मी और अपने ऊपर आता हुआ कर्ज दियानतदारी से अदा करने की तौफीक अता फरमा ।
आमीन या रब्बुल आलमीन

Sunnat : Karz ki Sunnate or Adab (कर्ज़ की सुन्नते और आदाब)

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