muharram ||ashura|| imam hussain|| history of islam||in hindi

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मोहर्रम क्या है

muharram ‘इस्लामिक कैलेंडर के पहले महीने का नाम है। इसी महीने से इस्लाम का नया साल शुरू होता है। इस महिने की 10 तारीख को रोज-ए-आशुरा (Day Of Ashura) कहा जाता है, इसी दिन को अंग्रेजी कैलेंडर में मोहर्रम कहा गया है।

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1-आशूरा के दिन ही आदम अलैहिस्सलाम की तौबा कुबूल की गई थी

2-आशूरा के दिन हीं युसूफ अलेह सलाम को मछली के पेट से रिहा किया गया था

3- आशूरा के दिन ही नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती किनारे से लगी थी

4- आशूरा के दिन ही कयामत भी आएगी

 

Aishwarya Ke Din Aur Bhi bahut sari acchi baate hui thi इस्लाम में Aishwarya ka din bahut jyada Afzal Manaya jata hai और मुसलमान अपने घर की टीवी म्यूजिक सिस्टम इस टाइप की फालतू चीजें बंद कर देते हैं 10 दिनों के लिए और ज्यादा से ज्यादा इबादत में लग जाते हैं और इमाम हुसैन के वाक्यात सुनते हैं शियास पर मातम करते हैं और सुन्नी मुसलमान आंसू बहा कर अगम करते हैं जिक्रे शहादत n एंड करते हैं

 

और अपने प्यारे महबूब मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो ताला अलेही वसल्लम के सबसे प्यारे नवासे की कुर्बानी को याद करते हैं और उनके लिए दुआ ए मगफिरत करते हैं जबकि उनको हमारी दुआओं की जरूरत नहीं लेकिन उनके लिए की गई दुआ असल में हम खुद अपने लिए दुआ का सबब पैदा करते हैं aur Aur Is Tarah Dua karne se a Hamari bhi e Maqsood ho jaaye a ja Tamanna Karte Hain Kyunki Hussain Jannat ke Sardar Hain

 

aur Hamare aka Mohammed Mustafa Sallallahu Tala alayhi wa sallam ke sabse Pyare Nawaz Hain Huzoor ne farmaya Jisne Hussain Mohabbat Ki usne Mujhse Mohabbat Ki aur Jisne Hussain se bugaz Rakha उसने मुझसे बुक्स रखा isliye Hamein Hussain se बेइंतहा मोहब्बत करनी चाहिए

 

gami Hussain Mein Rona bhi chahiye Kyunki ega main Hussain Mein Rone wale K Ashu Jab Uske Chehre par Girte Hain Vasu Qayamat mein Hamari magfirat ka sab Ban sakte hain हुसैन आली मकाम में यजीद के आगे हार न मानी और अपनी गर्दन कलम कर वाली वैसे हुसैन पूरी हजूरी फौज पर अकेले ही भारी थे.

 

यजीद ने उन्हें धोखे से उस वक्त मारा जब हुसैन नमाज़ पढ़ कर रहे थे जैसे ही हुसैन सजदे में गए यजीद ने हुसैन का सर कलम कर दिया यजीद समझता है कि वह जीत गया जबकि हुसैन ने गर्दन कटवा कर भी जीत हासिल कर ली है आज कोई नहीं है यजीद को पूछने वाला और इस्लाम जिंदा होता है हर साल कर्बला के बाद करोड़ों है हुसैन के लिए आंसू बहाने वाले.

 

Qurbani ke tarike aur qurbani ki dua Hindi||English||or Arbic me

आशूरा के दिन की फजीलत

इस दिन खुदा की बड़ी-बड़ी नेमतों की निशानियां जाहिर हुईं और कर्बला की त्रासदी, ‘हजरते इमाम हुसैन की शहादत’ का भी यही दिन है।

यौमे आशुरा को सभी मस्जिदों में जुमे की नमाज के खुत्बे में इस दिन की फजीलत और हजरते इमाम हुसैन की शहादत पर विशेष तकरीरें होती हैं।

इस दिन ज्यादातर मुसलमान अपना कारोबार बंद रखते हैं।

इसलिए पूरे इस्लामी विश्व में इस दिन रोजे रखे जाते हैं, क्योंकि पैगंबर मोहम्मद ने भी इस दिन कर्बला की घटना से पहले भी रोजे रखे थे।

 

तैमूरी रिवायत को मानने वाले मुसलमान रोजा-नमाज के साथ इस दिन ताजियों-अखाड़ों को दफन या ठंडा कर शोक मनाते हैं।

मस्जिदों में नफिल नमाजें अदा कर रोजा रखकर शाम को इफ्तार किया जाता है।
घरों में किस्म-किस्म के खाने बनाए जाते हैं।

 

एक हजार मर्तबा कुल हुवल्लाह पढ़कर मुल्क और मिल्लत की सलामती की दुआएं की जाती हैं।

 

इस दिन को पूरे विश्व में बहुत अहमियत, अज्मत और फजीलत वाला दिन माना जाता है।

 

इस दिन को ‘यौमे आशुरा’ कहा जाता है।

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मोहर्रम क्यों मनाया जाता है

मोहर्रम के महीने में इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के छोटे नवासे इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों (अनुयाइयों) का कत्ल कर दिया गया था। हजरत हुसैन इराक के शहर करबला में यजीद की फौज से लड़ते हुए शहीद हुए थे।

 

इमाम हुसैन को इस वजह से थी यजीद से नाइत्तेफाकी
इस्लाम में सिर्फ एक ही खुदा की इबादत करने के लिए कहा गया है। Allah is the greatest of all Nahi Koi shivaay Allah Ke Ibadat ke layak.

 

isliye islame mein sirf ek hi Allah Ko Marne Ka hukm Diya gaya hai छल-कपट, झूठ, मक्कारी, जुआ, शराब, जैसी चीजें इस्लाम में हराम बताई गई हैं। हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो ताला वसल्लम ने इन्हीं निर्देशों का पालन किया और इन्हीं इस्लामिक सिद्घान्तों पर अमल करने की हिदायत सभी मुसलमानों और अपने परिवार को भी दी।

 

दूसरी तरफ इस्लाम का जहां से उदय हुआ, मदीना से कुछ दूर ‘शाम’ में मुआविया नामक शासक का दौर था। मुआविया की मृत्यु के बाद शाही वारिस के रूप में यजीद, जिसमें सभी अवगुण मौजूद थे, वह शाम की गद्दी पर बैठा।

 

यजीद चाहता था कि उसके गद्दी पर बैठने की पुष्टि इमाम हुसैन करें क्योंकि वह मोहम्मद साहब सल्लल्लाहो ताला वसल्लम के नवासे हैं और उनका वहां के लोगों पर उनका अच्छा (प्रभाव) है। कोई भी इमाम हुसैन की बात कभी नहीं डाल सकता था अगर इमाम हुसैन कह देते हैं .

 

क्या यजीद की बात मानो तो हर इंसान यदित की बात मानता वाला आज हम पता नहीं किन गुनाहगार bando में शुमार होते हैं इमाम हुसैन ने Yazeed Ke Samne Sar Na Jhuka Kar इस्लाम को जिंदा रखा है इमाम हुसैन की एक कुर्बानी खाली नहीं गई आज इमाम हुसैन के करोड़ों चाहने वाले हैं और कोई एक व्यतीत को पूछने वाला भी नहीं है.

 

यजीद जैसे शख्स को इस्लामी शासक मानने से हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो ताला वसल्लम के घराने ने साफ इन्कार कर दिया था क्योंकि यजीद के लिए इस्लामी मूल्यों की कोई कीमत नहीं थी। यजीद की बात मानने से इनकार करने के साथ ही उन्होंने यह भी फैसला लिया कि अब वह अपने नाना हजरत मोहम्मद सल्ला वाले वसल्लम का शहर मदीना छोड़ देंगे ताकि वहां अमन कायम रहे।

 

इस हाल में तय हुई थी जंग

इमाम हुसैन हमेशा के लिए मदीना छोड़कर परिवार और कुछ चाहने वालों के साथ इराक की तरफ जा रहे थे। लेकिन करबला के पास यजीद की फौज ने उनके काफिले को घेर लिया। यजीद ने उनके सामने शर्तें रखीं जिन्हें इमाम हुसैन ने मानने से साफ इनकार कर दिया। शर्त नहीं मानने के एवज में यजीद ने जंग करने की बात रखी।

 

यजीद से बात करने के दौरान इमाम हुसैन इराक के रास्ते में ही अपने काफिले के साथ फुरात नदी के किनारे तम्बू लगाकर ठहर गए। लेकिन यजीदी फौज ने इमाम हुसैन के तम्बुओं को फुरात नदी के किनारे से हटाने का आदेश दिया और उन्हें नदी से पानी लेने की इजाजत तक नहीं दी।

ऐसे शुरू हुई जंग

इमाम हुसैन जंग का इरादा नहीं रखते थे क्योंकि उनके काफिले में केवल 72 लोग शामिल थे। जिसमें छह माह का बेटा उनकी बहन-बेटियां, bv(पत्नी )और छोटे-छोटे बच्चे शामिल थे। यह तारीख एक मोहरर्म थी, और गर्मी का वक्त था। गौरतलब हो कि आज भी इराक में (मई) गर्मियों में दिन के वक्त सामान्य तापमान 50 डिग्री से ज्यादा होता है। सात मोहर्रम तक इमाम हुसैन के पास जितना खाना और खासकर पानी था वह खत्म हो चुका था।

 

इमाम सब्र से काम लेते हुए जंग को टालते रहे। 7 से 10 मुहर्रम तक इमाम हुसैन उनके परिवार के मेंबर और (अनुनायी Sathi खानदान वाले भूखे प्यासे रहे।

 

10 मुहर्रम को इमाम हुसैन की तरफ एक-एक करके गए हुए शख्स ने यजीद की फौज से जंग की। जब इमाम हुसैन के सारे साथी शहीद कर दिए गए तब असर (दोपहर) की नमाज के बाद इमाम हुसैन खुद गए और aur junkee । जब इमाम हुसैन की तलवार उठी तो दुश्मनों को सर से कलम करती चली जा रही थी.

 

और इमाम हुसैन के जिस्म पर तीर लगते तब भी आप हिम्मत न हारते और जंग करते रहते जब यजीदी फौज अकेले इमाम हुसैन से हारने लगी तो यजीदी फौज ने एक मंसूबा मनाया के इमाम हुसैन हर हाल में नमाज पढ़ते हैं थोड़ी देर रुक जाते हैं और जब वह नमाज पढ़ेंगे तब उनको शहीद कर देंगे और ऐसा ही हुआ जब अजान हुई तो इमाम हुसैन ने नमाज पढ़नी शुरू कर दी उससे पहले एक यजीदी ने इमाम हुसैन को पानी दिया और कहा लो पानी पी लो तब इमाम हुसैन ने पानी पीने से इनकार कर दिया

 

और कहा अब तो नाना के हाथ से जा में कौसर पिएंगे (जा में Kausar wo Jaam hai jo Jannat mein Huzoor Sallallahu ta’ala Alaihi Wasallam ko Allah Tala Aata farmiga Jo doodh se jyada Safed aur Shahad Se Jyada Meetha hoga ) फिर नमाज पढ़ने लगे जब इमाम हुसैन नमाज पढ़ रहे हैं तो यजीदी फौज ने इमाम हुसैन का सर कलम कर दिया .

 

और उसके बाद जब इमाम हुसैन के सर को neze पर लगा कर शहर में घुमाया तब उस वक्त भी इमाम हुसैन के लb लिप्स चल रहे थे और आप कुरान की तिलावत कर रहे थे यह Manzar सभी ने देखा इस जंग में इमाम हुसैन का एक बेटे जैनुलआबेदीन जिंदा बचे क्योंकि 10 मोहर्रम को वह बीमार थे और बाद में उन्हीं से मुहमम्द सल्ला वाले वसल्लम की पीढ़ी चली।

 

इसी कुरबानी की याद में मोहर्रम मनाया जाता है। करबला का यह वाकया इस्लाम की हिफाजत के लिए हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो ताला वसल्लम के घराने की तरफ से दी गई कुर्बानी है। इमाम हुसैन और उनके पुरुष साथियों व परिजनों को कत्ल करने के बाद यजीद ने हजरत इमाम हुसैन के परिवार की औरतों को गिरफ्तार करने का हुक्म दिया।

 

इमाम हुसैन की शहादत के बाद

यजीद ने खुद को विजेता बताते हुए हुसैन के लुटे हुए काफिले को देखने वालों को यह बताया कि यह हश्र उन लोगों का किया गया है जो यजीद के शासन के खिलाफ गए। यजीद ने मुहमम्द सल्लल्लाहो ताला वसल्लम के घर की औरतों पर बेइंतहा जुल्म किए। उन्हें कैदखाने में रखा जहां हुसैन की मासूम बच्ची सकीना की (सीरिया) कैदखाने में ही मौत हो गई।

बहरहाल इस वाकये को 1400 से ज्यादा साल बीत चुके हैं। कत्ल-ए-हुसैन अस्ल में मर्ग-ए-यजीद है। इस्लाम जिंदा होता है हर करबला के बाद।

मोहर्रम में मुसलमान हज़रत इमाम हुसैन की इसी शहादत को याद करते हैं.

 

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हज़रत इमाम हुसैन का मक़बरा इराक़ के शहर कर्बला में उसी जगह है जहां ये जंग हुई थी. ये जगह इराक़ की राजधानी बग़दाद से क़रीब 120 किलोमीटर दूर है और बेहद सम्मानित स्थान है.

इमाम हुसैन के बारे में कुछ भी लिखने की मेरी औकात नहीं बस छोड़ की कोशिश की है आप लोगों को बताने की अगर लिखने में मेरी कोई खता हो तो अल्लाह मुझे माफ करें और आप लोग भी मुझे माफ कर दीजिएगा क्योंकि मुझे उससे इमाम हुसैन से बेइंतहा मोहब्बत है और उनके बारे में एक अल्फाज भी गलत बोलना लिखना नहीं चाहती अगर फिर भी दोगे तो कुछ बोला तो तो मुझे माफ कर देना

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